राजस्थान के धोरों के बीच मौजूद है ‘ज्ञान का भंडार’ एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी भादरिया में
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री त्रिलोक दीप का अविभाजित गुजरात एवं रावलपिंडी से लोकसभा सचिवालय होते हुए जोधपुर एवं राजस्थान का सफरनामा…भाग-5
खैर पीयूष दईया ने बताया कि वह सारा सामान उनके घर पर सुरक्षित है. अब मैं बेबस था. उसी दौरान मैंने फेसबुक पर अपने संस्मरण लिखने शुरू किये जिन्हें बहुत सराहा गया. इस बीच अभिषेक कश्यप मेरे फेसबुक मित्र बन गए थे. मेरे संस्मरण शायद उन्हें रुचे. उन्होंने लिखा कि वह मेरे संस्मरणों की फ़ाइल बना रहे हैं और उन्हें प्रकाशित करवाना चाहते हैं. मैंने उन्हें अपनी अनुमति दे दी. हम दोनों ने अपने अपने फोन भी साझा कर लिए थे. उन्होंने बताया कि ‘ इंडिया टेलिंग’ नाम से एक प्रकाशन शुरू किया है. इन संस्मरणों को वह स्वयं छापेंगे. उन्होंने न केवल मेरे संस्मरणों की पुस्तक ‘संस्मरणनामा’ छापी बल्कि ‘त्रिलोक दीप का सफर’ नामक एक किताब भी
प्रकाशित की जिसमें बहुत से लोगों ने मेरे बारे में लिखा है.एक दिन दिल्ली के प्रेस क्लब में किसी प्रसंग में ‘दिनमान’ का ज़िक्र हुआ. मैंने उन्हें ‘*दिनमान’ और ‘संडे मेल’ के जिल्दबंद अंकों की कहानी सुनाई तो उन्होंने पीयूष दईया को वहीं से फोन करते हुए कहा कि वह सारा सामान धनबाद ले जाना चाहते हैं. वहां वह अपनी लाइब्रेरी में एक पृथक कक्ष में इस ‘नायाब’ सामग्री को रखेंगे. 2021 से यह सारी सामग्री धनबाद में अभिषेक कश्यप के पास है. वह किस हालत में है मैं नहीं जानता. इसमें 1965 से 1989 तक के ‘दिनमान’ हैं और 1989 से 1995 तक ‘संडे मेल’और उससे जुड़ी पत्रिका.
जब तक ये फ़ाइलें मेरे पास थीं तो कई साथियों और मित्रगणों ने उसका लाभ उठाया. ‘हिंदी जगत’ के संपादक
डॉ सुरेश ऋतुपर्ण ने घर आकर सर्वेश्वरदयाल सक्सेना द्वारा डॉ कामिल बुल्के पर लिखे लेख की फोटोकॉपी ली. तब वह जापान में रहते थे. विष्णु नागर ने रघुवीर सहाय पर लिखी अपनी पुस्तक की काफ़ी कुछ सामग्री ‘दिनमान’ के पुराने अंकों से ली. वह कई दिनों तक हमारे घर आए. असगर वजाहत भी पुराने ‘दिनमान’ देखना चाहते थे. तब तक वह धनबाद पहुंच चुके थे. मैंने उन्हें अभिषेक कश्यप का फोन
नंबर दे दिया. ऐसे ही और अनेक लोगों को अभिषेक कश्यप से संपर्क करने के लिए उनका फोन नंबर दे दिया करता था. मुझे नहीं पता कि अभिषेक कश्यप ने उन अंकों को रखने के लिए कोई विशेष कक्ष बनाया कि नहीं. वादा तो उन्होंने यह भी किया था कि इन पत्रिकाओं में प्रकाशित मेरे आलेखों की वह पुस्तकें तैयार करेंगे. अभी तक मुझे ऐसी कोई पुस्तक देखने को नहीं मिली. अफ़सोस कि बरसों से अभिषेक कश्यप ने मुझसे संपर्क भी नहीं साधा.
बरसों से मैं पुस्तकें एकत्र कर रहा था. हिंदी के अलावा अंग्रेज़ी, पंजाबी और उर्दू की भी थी. जिन दिनों संजय द्विवेदी भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक थे वह अक्सर किसी न किसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए मुझे आमंत्रित करते रहते थे. एक दिन मैंने उनसे अपनी निजी लाइब्रेरी डोनेट करने की जब चर्चा की तो वह तुरंत तैयार हो गए. उन्होंने कुछ दिनों के बाद अपनी लाइब्रेरी से सुनीता सभ्भरवाल को मेरी निजी लाइब्रेरी की पुस्तकें लेने के लिए मेरे यहां भेजा. सुनीता जी ‘संडे मेल’ में मेरी सहयोगी थीं, परिवार से भी परिचित हैं. उन्होंने स्वयं और अपने साथियों की मदद से मेरी लाइब्रेरी से आधी से अधिक अपने मतलब की पुस्तकें छांट लीं. पंजाबी, अंग्रेज़ी और हिंदी की कुछ पुस्तकें हाल में गुरुद्वारा राकाबगंज परिसर में अस्तित्व में आयी लाइब्रेरी को डोनेट की हैं. यह लाइब्रेरी पंजाबी के साहित्यकार तथा पंजाबी अकादमी के पूर्व सचिव डॉ रवेल सिंह के मार्गदर्शन में काम करती है. कुछ पुस्तकें मैंने
साहित्यकार-प्रकाशक सुधेन्दु ओझा को भेंट कीं.अब बची पुस्तकें तथा हिंदी और अंग्रेज़ी के टाइपराइटर भोपाल स्थित माधवराव सप्रे संग्रहालय की अमानत हैं. इससे मेरा भावनात्मक लगाव है. माध्यमिक तक मेरी शिक्षा माधवराव सप्रे स्कूल, रायपुर में हुई थी.
उन दिनों मुझे विदेश जाने के कई अवसर मिले. वहां भी प्रमुख लाइब्रेरियों में जाना मेरे शेडूले में रहता था. मैंने 1975 से 1987 तक अमेरिका, कनाडा, सोवियत रूस सहित अनेक यूरोपीय देशों की यात्राएं कीं. 1975, 1980 और 1983 में मैंने पश्चिमी जर्मनी ( उन दिनों दो
जर्मनी थे पूर्व और पश्चिम. दोनों का विलय 3 अक्टूबर, 1990 को हुआ) की यात्रा की. इस दौरान मुझे फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेला देखने का अवसर मिला. वहां विश्व की विभिन्न भाषाओं के अलावा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की सैकड़ों पुस्तकें देखने को मिलीं. इसके अलावा मैंने फ्रैंकफर्ट सेंट्रल लाइब्रेरी भी देखी. वहां पर भी कुछ चुनिंदा शाखाओं में भारतीय संस्कृति, दर्शन, योग और हिंदी व संस्कृत साहित्य से जुड़ी बहुत पुस्तकें देखीं और वहां पर उपस्थित व्यक्ति ने मुझसे हिंदी में ही बातचीत की. फ्रैंकफर्ट में एक बार विश्व पुस्तक मेला देखा और दूसरी बार सेंट्रल लाइब्रेरी.
तत्कालीन सोवियत संघ की मैंने 1977 और 1987 में दो बार यात्रा की. सेंट पीटर्सबर्ग स्थित यह पुस्तकालय रूस के सबसे पुराने सार्वजनिक पुस्तकालयों में से है. इसे दुनिया के सबसे बड़े पुस्तकालयों में गिना जाता है. यहां पर साढ़े तीन करोड़ से अधिक किताबें, दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ, नक्शे और समाचारपत्र हैं. यहां हिंदी, संस्कृत, बंगला, तमिल और ते
लुगु सहित कई भारतीय भाषाओं की दुर्लभ पुस्तकें, पाण्डुलिपियाँ और साहित्य का समृद्ध संग्रह मौजूद है. सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी को भारतीय अध्ययन का पालना माना जाता है जहां दशकों से भारतीय भाषाओं और संस्कृति पर अध्ययन अध्यापन होता आ रहा है. यहां एक विशेष इंडियन कार्नर है जिसमें भारत सरकार द्वारा भेंट की गयी भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, रामायण, महाभारत और विभिन्न भाषाओं की किताबें शामिल हैं. इस ऐतिहासिक और विशाल पुस्तकालय में प्राच्य पाण्डुलिपि विभाग में प्राचीन भारतीय और एशियाई भाषाओं के अमूल्य ग्रंथ तथा दस्तावेज संरक्षित हैं. .….(अगले अंक में जारी)
*(pics credit-Asia Art Archives, ibgnews.com and amarujala.com)
