राजस्थान के धोरों के बीच मौजूद है ‘ज्ञान का भंडार’ एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी भादरिया में - News On Radar India

राजस्थान के धोरों के बीच मौजूद है ‘ज्ञान का भंडार’ एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी भादरिया में

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री त्रिलोक दीप का अविभाजित गुजरात एवं रावलपिंडी से लोकसभा सचिवालय होते हुए जोधपुर एवं राजस्थान का सफरनामा…भाग-4

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            भादरिया महाराज  मुझसे पंजाबी में बात करते थे. एक बार उन्होंने मुझ बताया था कि माता ने चाहा तो लाइब्रेरी का और विस्तार करेंगे, स्थान का कोई अभाव नहीं है. वास्तव में उनके ज़ेहन में नालंदा और तक्षिला के समकक्ष एक विश्वविद्यालय बनाने की चाह थी. उनकी यह योजना फिलवक्त तो खटाई में पड़ती ही नज़र आ रही है. मैंने उनसे पूछा था कि क्या आप नालंदा और *तक्षिला के समक्ष कोई विश्वविद्यालय स्थापित करने बाबत सोच रहे हैं? उन्होंने बताया था कि पहले एक कॉलेज की योजना है और उसके बाद विश्वविद्यालय बनाने की इच्छा है. मुझसे उलटे उन्होंने सवाल करते हुए पूछा कि आप तो रावलपिंडी में रहते थे. वहां से पंजा साहब तो जाते ही होंगे. वहीं पास ही तो है तक्षिला. मैंने भादरिया महाराज को बताया कि मैं दो-तीन बार तक्षिला देख चुका हूं. लेकिन केवल वही स्थान जहां खुदाई से प्राप्त कुछ पुरानी वस्तुएँ मिली थीं. तब मेरी उम्र 10-12 बरस थी. उसके महत्त्व की कोई जानकारी नहीं थी. तक्षिला के महत्त्व के बारे में तो मुझे पत्रकारिता में मेरे गुरु  सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय  ने बताया था कि तक्षिला को समझने के लिए वहां कई दिनों तक रहना पड़ता है क्योंकि वह बहुत दूर दूर तक फैला हुआ था. आज भी विदेशी शोधकर्ता महीनों वहां रहकर तक्षिला के महत्त्व का गहराई से अध्ययन करते हैं. इस पर भादरिया महाराज ने कहा था कि ठीक हमारी सोच भी तक्षिला के समक्ष विश्वविद्यालय निर्माण की है. ऐसा हो जाने से केवल भारत के ही नहीं दूरदराज के जिज्ञासु इसका लाभ उठाने के लिए आएंगे. देखिए हमारे मन की मुराद कब पूरी होती है. बेशक इस लाइब्रेरी में उपलब्ध किताबें और ग्रंथ ज्ञान पिपासुओं को संतुष्टि प्रदान कर सकेंगे.भादरिया लाइब्रेरी में मैंने भी अपनी पुस्तकें भेजी हैं.

क्योंकि मुझे स्कूल के दिनों से पाठ्यक्रम के अतिरिक्त किताबें पढ़ने का शौक था लिहाज़ा मैंने अपने घर में एक छोटी सी लाइब्रेरी बना रखी थी. यह शौक मुझ में हमारे माधवराव सप्रे स्कूल के हिंदी टीचर पंडित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने लाइब्रेरी से किताबें ला लाकर देने से पैदा किया था, इसलिए मैंने अपनी मनपसंद कुछ किताबें खरीद कर लाइब्रेरी बना ली थी. इस लाइब्रेरी में मुंशी प्रेमचंद की वरदान, गोदान, गबन, प्रतिज्ञा, निर्मला, कर्मभूमि जैसी किताबें थीं तो अज्ञेय की शेखर एक जीवनी के दोनों भाग, नदी के द्वीप, अरे यायावर, रहेगा याद?, यशपाल की झूठा सच, तुमने क्यों कहा था मैं सुंदर हूं, *धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता, शरत चंद्र चट्टोंपाध्याय के देवदास, बिराज बहु, परिणिता, बंकिम चंद्र चटर्जी की आनंद मठ आदि शामिल थीं. राजनीतिशास्त्र की कुछ कोर्स की पुस्तकें भी थीं. हां मैं भार्गव की छोटी डिक्शनरी भी रखा करता था. यह बात 1953-54 की है.

रायपुर छोड़ने के बाद वह लाइब्रेरी भी पीछे छूट गयी थी लेकिन लाइब्रेरी का शौक नहीं मरा था. लोकसभा सचिवालय में पब्लिकेशन काउंटर था जहां सांसदों को रोज़ बहुत सा साहित्य वितरित किया जाता था. वहां पर मेरे एक मित्र थे कैलाश डंडोना. उनके माध्यम से मैं उस काउंटर से अपने मतलब की किताबें ले आया करता था. इनमें मुख्यतया विभिन्न मंत्रालयों के शब्दकोष, ग्लासरी ऑफ़ पार्लियामेंटरी टर्म्स आदि होती थीं. कुछ विषयों और घटनाओं पर श्वेतपत्र आदि भी रख लिया करता था. पब्लिकेशन काउंटर पर अक्सर सांसदों से भेंट हो जाया करती थी. लोकसभा सचिवालय से एकत्र यह सामग्री ‘दिनमान’ में मेरे बहुत काम आयी. उन दिनों गूगल, इंटरनेट आदि तो होते नहीं थे, पीटीआई और यूएनआई एजेंसियों के टेलीप्रिंटर ही थे. अपने संवादों को अपडेट करने के लिए कुछ मदद तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया की लाइब्रेरी से मिल जाती थी, फिर भी अधिसंख्य संवादों के लिए साहित्य अकादेमी, अमेरिकन लाइब्रेरी, ब्रिटिश काउंसिल आदि का सहारा लेना पड़ता था. कभी कभी हमारे संपादक अज्ञेय जी अपनी निजी लाइब्रेरी से कुछ किताबें ला दिया करते थे. उनका मानना था कि हर पत्रकार/लेखक की अपनी एक निजी लाइब्रेरी होनी चाहिए.

इसके चलते मैंने अपने घर में एक अच्छी खासी निजी लाइब्रेरी बना ली थी. इसमें रायपुर से लायी किताबें थीं, लोकसभा सचिवालय से प्राप्त शब्दकोष, पुस्तकें आदि और स्वयं खरीदी गयी पुस्तकें. वर्ल्ड अलमनक जैसी संदर्भ पुस्तकें मुझे अमेरिकन लाइब्रेरी से मिल जाती थीं, कुछ सोवियत संघ के सूचना केंद्र से और कुछ ब्रितानी उच्चायोग से भी. मैंने अच्छी खासी लाइब्रेरी बना ली थी. ‘संसदीय प्रणाली और व्यवहार’ जैसी दर्जनों पुस्तकें मुझे लोकसभा सचिवालय के तत्कालीन सेक्रेटरी जनरल सी.के. जैन ने मुझे भेंट की थीं. लोकसभा में वह मेरे सहयोगी-मित्र थे. हम लोग एक ही शाखा में काम करते थे. मेरे लिए वह चक्रेश थे. इनके अतिरिक्त मेरे पास ‘दिनमान’ और ‘संडे मेल’ के जिल्दबंद अंक और पत्रिकाएं थीं. बढ़ती उम्र को ध्यान में रखते हुए मैं उन्हें किसी अच्छी जगह डोनेट करना चाहता था.

एक दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ पल्लव ने सलाह दी कि रेख्ता फाउंडेशन अपना हिंदी अनुभाग खोलने जा रहा है आप अपनी लाइब्रेरी उन्हें डोनेट कर सकते हैं. सलाह अच्छी थी उर्दू के क्षेत्र में उनका बड़ा नाम था.इस काम के लिए उन्होंने पीयूष दईया को यह ज़िम्मेदारी सौंपते हुए कहा कि वह आपके घर से जिल्दबंद पत्र-पत्रिकाएं ले जाएंगे. और भी जो कुछ देना चाहें उन्हें दे सकते हैं, क्योंकि रेख्ता फाउंडेशन का हिंदी अनुभाग वही संभालने वाले हैं.पीयूष दईया आए और दो तीन खेपों में यह कहकर सारा सामान ले गए कि रेख्ता फाउंडेशन में आपके नाम का एक कक्ष बनेगा. इन पत्र- पत्रिकाओं के अलावा मैंने उन्हें सभी प्रकाशित लेखन की फ़ाइलें सौंप दी और सौ से अधिक टेप जिनमें बहुत महत्वपूर्ण लोगों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये हुए थे. टेप सुनने के लिए मैंने उन्हें टेप रिकॉर्डर भी दिया था. लेकिन कुछ दिनों के बाद पता चला कि रेख्ता फाउंडेशन ने हिंदी अनुभाग का विचार छोड़ दिया है. वह सारा सामान उनके वैशाली स्थित घर में रखा है. मन बहुत मायूस हो गया. मैंने अशोक वाजपई  से भी बात की. वह भी इस बाबत लाचार थे.  .….(अगले अंक में जारी)     

*(pics  credit-cart.worldofsecrets.org &  ar.inspiredpencil.com)

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