राजस्थान के धोरों के बीच मौजूद है 'ज्ञान का भंडार' एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी भादरिया में - News On Radar India

राजस्थान के धोरों के बीच मौजूद है ‘ज्ञान का भंडार’ एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी भादरिया में

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री त्रिलोक दीप का अविभाजित गुजरात एवं रावलपिंडी से लोकसभा सचिवालय होते हुए जोधपुर एवं राजस्थान का सफरनामा…भाग-1

92

               है न कमाल की बात:   भारत के सबसे बड़े थार मरुस्थल में एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी है. हमारा देश लाजवाब है. बेमिसाल है. यहां कुछ भी असंभव नहीं. मैं पिछले लगभग छह दशक से राजस्थान जा रहा था. कह सकते हैं 1967 से लेकर 2017 तक. उसके बाद नहीं जा पाया. कई दायित्व सौंपे गए थे मुझे. इसी दौर में पहले मैं ‘दिनमान’ के लिए बहुत कुछ कवर किया करता था राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रों से जुड़ी गतिविधियां. खादी ग्रामोद्योग जैसे प्रायोजित दौरे भी हो जाते थे. ‘दिनमान’ के बाद ‘संडे मेल’ की संपादकी और डालमिया सेवा ट्रस्ट से जुड़े सामाजिक सरोकार भी मुझे बराबर राजस्थान ले जाते रहे. कह सकते हैं कि मैंने राजस्थान के सभी शहर और काफ़ी तादाद में गांव, धोर और ढांणीयां देखी हैं और वहां का जनजीवन भी नज़दीक से. सामाजिक सरोकारों में डालमिया सेवा ट्रस्ट के तत्वावधान में चिकित्सा शिविर आयोजित होते थे. ट्रस्ट के प्रमुख समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया के प्रतिनिधि के तौर पर मैं राजस्थान के तमाम नगरों और गाँवों में शिविरों का निरीक्षण करने के लिए जाया करता था. इस दौरान मैंने पोखरण के वे दोनों स्थल भी देखे जहां परमाणु परीक्षण किए गए थे. वहां से थोड़ी दूर पर स्थित रामदेवरा मंदिर भी. वहां से मैं सीधे जैसलमेर निकल जाया करता था.

चिकित्सा शिविरों संबंधी एक प्रेस रिलीज़ तैयार की जाती थी जिसे शिविर से जुड़ी टीम विभिन्न समाचारपत्रों में दे आया करती थी. आम तौर पर जोधपुर में मेरा  ठिकाना रहता था और यहीं से मैं शिविरों के निरीक्षण के लिया जाता था. एक दिन न जाने मुझे क्या सूझी कि मैं अपनी टीम के एक सदस्य के साथ ‘दैनिक भास्कर’ के स्थानीय संपादक से मिलने के लिए चला गया. मुझे देख वह संपादक कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और बोला कि ‘मैं ओम गौड़ हूं और पाली से ‘दिनमान’ के लिए खबरें भेजा करता था’. शिविर की प्रेस रिलीज़ देखकर उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि आपके शिविरों से जुड़ी न केवल खबरें ही छपेंगी बल्कि हम अपने ऑफिस में एक शिविर भी लगाएंगे. उन्होंने अपनी विशेष संवाददाता श्रीमती संगीता शर्मा से मेरा परिचय कराते हुए कहा कि यदि किसी कारण मैं ऑफिस में न हुआ तो आप इन्हें खबर दे सकते हैं. क्या संयोग है कि ओम जी के पास बैठे बैठे संगीता जी के पति मुकेशदत्त शर्मा से भी भेंट हो गयी जो अपनी विज्ञापन एजेंसी चलाते हैं. आज यही पति पत्नी मिलकर सांयकालीन ‘परिक्रमा’ अख़बार निकालते हैं. बेशक मेरे लिए यह एक उपलब्धि थी.

राजस्थान देश के सुंदर और संपन्न राज्यों में है ।यहां का इतिहास शौर्य के पन्नों से पटा हुआ है, कला-संस्कृति-साहित्य यहां की बेमिसाल है,यहां के रजवाड़ों की ख्याति सर्वव्यापी है और यहां की लोक संस्कृति के तो क्या कहने ।मोटे तौर पर राजस्थान को तीन भागों में बांटा जाता है-मारवाड़, मेवाड़ और शेखावाटी ।इन तीनों क्षेत्रों की पेंटिंग्स लाजवाब हैं ।राजस्थान धार्मिक एवं आध्यात्मिक राज्य के रूप में भी प्रसिद्ध है जहां किसी न किसी त्योहार पर मेले लगते रहते हैं जैसे हनुमान जी के जन्मदिन पर सालासर में मेला तो कृष्ण जी से जुड़ी तिथियों पर खाटू शयाम जी और नाथद्वारे में मेले तो पोखरण के समीप रामदेवरा का मेला। आज हम इन मेलों से हट कर एक अलग प्रसंग पर चर्चा करेंगे जिसने देश में ही नहीं पूरे एशिया महाद्वीप में कीर्तिमान स्थापित किया है । वह है एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत (अंडरग्राउंड) भादरिया लाइब्रेरी जो पोखरण और जैसलमेर के बीच में स्थित भादरिया गांव में भादरिया राय माता मंदिर के परिसर में स्थित है.

जोधपुर से जैसलमेर की तरफ जाते हुए रास्ते में दो प्रमुख पड़ाव पड़ते हैं ।एक है पोखरण जहां दो बार परमाणु परीक्षण हुए थे-पहला 1974 में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं और दूसरा मई,1998 में अटलबिहारी वाजपेयी के शासनकाल में । इन परमाणु परीक्षणों से देश और विदेश में भारत की साख और धाक काफी बढ़ गयी थी ।दूसरा पड़ाव भी पोखरण में है बाबा रामदेवरा मंदिर के रूप में । लोक देवता बाबा रामदेवरा की आस्था में हर साल यहां मेला भरता है जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. लोग अपने घरों को खुला छोड़ कर, बिना ताला लगाए, पैदल चलते हुए तो कुछ रेंगते हुए भी यहां पहुँचते हैं बाबा रामदेवरा के दर्शन करने के लिए. रामदेवरा का मंदिर पोखरण से 12 किलोमीटर उत्तर में स्थित है. रामदेवरा को भगवान कृष्ण (द्वारकाधीश) का अवतार माना जाता है. उन्होंने छुआछूत का विरोध किया. समाज में समानता, भाईचारा और मानव सेवा का संदेश दिया. बाबा रामदेवरा के इस धार्मिक और ऐतिहासिक तीर्थ स्थल को मुसलमान ‘रामसा पीर’ का स्थल मानते हैं. मैंने भी इस मंदिर के दर्शन किए हैं महंत प्रेमनाथ जी के सौजन्य से.

पोखरणसे जब जैसलमेर की तरफ़ बढ़ते हैं तो रास्ते में  भादरिया गांव पड़ता है । मुख्य सड़क पर दाईं ओर साहित्य की कुछ दुकानों को देखकर लगता है कि यह कोई महत्वपूर्ण स्थान है ।मैं गाड़ी रुकवाता हूं ।साहित्य बेचने वाला दुकानदार बताता है कि यह बाबा हरबंससिंह ‘निर्मल’ का डेरा है जिन्हें भादरिया महाराज के नाम से जाना जाता है ।थोड़ा सा आगे बढ़ने पर पता चलता कि यहां बहुत बड़ी गौशाला है ।यह सीमवर्ती इलाका है ।अक्सर गायें भटक कर भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर की तरफ चली जाती हैं । ऐसी गायों को पकड़ कर यहां के गौशाला में लाया जाता है और उनकी पूरी देखभाल और सेवा की जाती है ।2009 में मैं यहां गया था ।तब इस गौशाला में दस हज़ार से अधिक गायें थीं जिनकी देखभाल का बहुत बेहतरीन प्रबंध था । दूसरी बार 2017 में यहां आने पर सभी कुछ बदला बदला सा लग रहा था । सामान्य-सा दीखने वाला शक्तिपीठ भादरिया राय मंदिर अब भव्य भवन बन गया था और श्रद्धालुओं की संख्या भी सत्तर हज़ार से एक लाख के बीच बताई गयी थी ।यह भी पता चला कि गौवंश का आंकड़ा दस हज़ार से बढ़कर 44 हज़ार पार कर गया है. जैसलमेर की तरफ जाने वाले लोग इस मंदिर में माथा टेकना नहीं भूलते । इसे आप तीसरा और महत्वपूर्ण पड़ाव कह सकते हैं ।यह भी बताया गया कि स्वयं बाबा जी पूरे गौशाला के कई चक्कर लगाते हैं ताकि उनकी देखभाल और सेवा में किसी तरह की कोताही न बरती जाए। इन गायों के दूध का पूरा सदुपयोग होता है।

बाबा का आदेश है कि जो भी व्यक्ति यहां आये उसे लस्सी पिए बिना न जाने दिया जाये ।उन्हें लोग ‘लस्सी वाला बाबा’ भी कहते हैं ।इस बाबत एक प्रसंग सुनने को भी मिला। एक बार भादरिया महाराज से भेंट करने के लिए कुछ लोग आये ।बाबा से मिलने के बाद यह कह कर कि वह बहुत व्यस्त हैं, बिना लस्सी पिये ही वहां से निकल गये ।थोड़ी दूर जाने पर उनकी कार यकायक बंद हो गयी । बहुत कोशिश करने पर भी जब कार स्टार्ट नहीं हुई तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया ।वह उल्टे पांव दौड़ते-हांफते भादरिया महाराज के पास गये और उनके चरणों पर गिर पड़े ।बाबा ने उन्हें उठाते हुए कहा कि यह लस्सी यहां का ‘प्रशाद’ है,आपने उसका अपमान किया तो इसका खामियाजा तो आपको भुगतना ही था. अब बाबा ने उन्हें एक की जगह दो गिलास लस्सी पीने के लिए कहा। लस्सी जब खत्म हुई तो भादरिया महाराज ने आदेश दिया कि जाइये,आपकी कार भी स्टार्ट हो जायेगी और जिस काम के लिए आप हड़बड़ी मचा रहे थे,वह भी हो जायेगा ।और बाबा कीTrilok Deep वाणी सच साबित हुई।।यह भी पता चला कि बाबा बहुत पढ़े लिखे हैं और काफी देर तक समाधि में रहते हैं । मंदिर के पास एक गुफा में नौ साल तक तपस्या की थी.                                                             (….अगले अंक में जारी)

Advertisements
You might also like

Leave A Reply

Your email address will not be published.

Join WhatsApp Group