भारत के विभाजन की घटनाओं को देखने का नया नज़रिया है ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’
राजधानी दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार विवेक शुक्ला की नवीनतम पुस्तक ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ की समीक्षा (6 भाग में) के साथ दिनमान पत्रिका एवं संडे मेल के भूतपूर्व कार्यकारी संपादक त्रिलोक दीप. (भाग 3)
जैसे मैंने कहा कि इस किताब में कई ऐसे प्रसंग हैं जिनमें मेरा भी ज़िक्र है. खान अब्दुल गफ्फार खान ऐसे ही
प्रसंगों में आते हैं. पुस्तक में खान अब्दुल गफ्फार खान का विस्तृत उल्लेख है. मैंने उन्हें मई 1947 में गांधी जी के साथ रावलपिंडी में देखा था. दिल्ली आने पर उनसे मेरी लंबी बातचीत हुई थी. तब उन्होंने बड़े ही दर्द भरे लहज़े में बताया था कि हम पठान ठगे गए थे.गांधी जी के आग्रह पर हमारे खुदाई खिदमतकारों ने (स्वयंसेवक) आजादी के अहिंसक आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था . लेकिन बदले में हमें क्या मिला ज़िल्लत! जब मुल्क आज़ाद हुआ तो हमारी किस्मत पाकिस्तान के साथ जोड़ हमें ‘भेड़ियों’ के सामने फेंक दिया गया जबकि हम पठानों का अपना अल्हदा वजूद है. कसूर हमारा यह था कि हम लोगों ने मुस्लिम लीग का साथ नहीं दिया. पंद्रह साल तक मैं अंग्रेजों की जेल में रहा और इतने वक़्त ही पाकिस्तान की जेलों में. अंग्रेज़ों में थोड़ा बहुत ‘रहम’ था लेकिन पाकिस्तानी बेरहम और ज़ालिम थे.यह पूछे जाने पर कि पठान प्रेजिडेंट अयूब खान का रवैया तो आपके प्रति नरमी का रहा होगा,
सरहदी गांधी ने दुखी स्वर में कहा कि वह ‘चचा चचा’ ज़रूर कहता था लेकिन उसके कारकून जुर्म ढहाने में कोई कसर उठा नहीं रखते थे.
एक चैप्टर मोहम्मद अली जिन्ना को समर्पित है. उनके चरित्र को बड़ी बारीकी से इस पुस्तक में पेश किया गया है. पुस्तक के मुताबिक वह किसी के सगे नहीं थे, न दोस्तों के और न ही राजनीतिक साथियों के. दार्जिलिंग में अपने दोस्त सर दिनशा पेतित दोस्त को धोखा देकर उनकी बेटी रत्नबाई उर्फ़ रत्ती को बरगलाया, शादी की और छोड़ दिया. दोनों की एक बेटी थी दीना. रत्नबाई का 29 बरस की उम्र में निधन हो गया.लेकिन जिन्ना ने इसकी कोई परवाह नहीं की.23 मार्च, 1940 में मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन में लाहौर प्रस्ताव द्वारा मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में एक स्वतंत्र और संप्रभु मुस्लिम राज्य की उन्होंने मांग

करके अपनी मंशा जतला दी. उन्होंने कभी आजादी की लड़ाई में सक्रियता से भाग नहीं लिया और न ही वह और उनका कोई साथी समर्थक दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों की तरह जेल ही गए. जिन्ना मार्च-अप्रैल, 1947 को रावलपिंडी में मुस्लिम लीग के गुंडों ने जमकर हिंदुओं और सिखों को मारा और उनकी संपत्ति लूट ली. ये हिंदू और सिख खासे धनी लोग थे. क्या मज़ाल कि जिन्ना ने कभी उन दंगों को रुकवाने की अपील की हो और न ही कभी उन्होंने संप्रदायिक दंगों की परवाह की. 14 अगस्त, 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना वायसराय लार्ड माउंटबेटन से गवर्नर जनरल पद की शपथ लेते रहे जबकि लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान आदि में दंगाइयों द्वारा हिंदू सिख मारे जाते रहे. इस समारोह में उनकी बेटी दीना वाडिया शामिल नहीं हुई अलबत्ता उनकी बहन फातिमा जिन्ना थीं. लेकिन जिन्ना अपनी असंवेदनशीलता का खुद ही शिकार हो गए जब तपेदिक से गंभीर रूप से बीमार होने पर उन्हें एक खटारा एम्बुलेंस में अस्पताल ले जाया गया जो बीच सड़क में ही खराब हो गयी और 11 सितम्बर, 1948 को उनका निधन हो गया. इस पुस्तक
में मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में जितनी विस्तृत जानकारी दी गयी है वह शायद ही कहीं और उपलब्ध हो. – त्रिलोक दीप. (….अगले अंक में जारी)
