भारत के विभाजन की घटनाओं को देखने का नया नज़रिया है ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’
राजधानी दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार विवेक शुक्ला की नवीनतम पुस्तक ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ की समीक्षा (6 भाग में) के साथ दिनमान पत्रिका एवं संडे मेल के भूतपूर्व कार्यकारी संपादक त्रिलोक दीप. (भाग 4)
मैं कराची चार बार गया हूं. चूंकि शुरू शुरू में कराची ही पाकिस्तान की राजधानी थी इसलिए भारत के
उत्तरप्रदेश और बिहार के रहने वाले यहां आकर बस गए थे. क्योंकि ये लोग ज़्यादा पढ़े लिखे थे लिहाज़ा वह स्थानीय सिंधी आबादी पर हावी हो गए. संख्या के लिहाज़ से आज इन मुहाजिरों की तादाद सिंधियों से ज़्यादा है. अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इन्होंने मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम)बनाया जिसका चुनाव चन्ह था ‘पतंग’. मैंने एमक्यूएम के नेताओं से मिलने की हरचंद कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली. किसी ने हमें सलाह दी कि आप लोग उनके चुनावी मंच के पास या तो नीचे खड़े हो जाएं या ऊपर चढ़ जाएं. लिहाज़ा हम तीनों जी.के. सिंह, प्रवीण जैन और मैं उनके एक चुनावी मंच पर चढ़ गए. वहां लाउड स्पीकर पर हिंदी फ़िल्म का गाना चल रहा था ‘चली चली रे पतंग मेरी चली रे’. इस गाने की आवाज़ दूर दूर तक सुनाई दे रही थी. थोड़ी देर में मुहाजिर नेताओं का आना शुरू हुआ. सबसे पहले मेयर डॉ. फारुख सत्तार आये. लोगों ने तालियों के बीच उनका स्वागत किया. उसके
बाद अज़ीम तारिक की गाड़ी रुकी. वह अपने सुरक्षा कर्मियों से घिरे मंच पर पहुंचे. उनको हमने अपना परिचय दिया. अज़ीम तारिक एमक्यूएम के दूसरे बड़े नेता हैं यानी अल्ताफ हुसैन के बाद.(pic credit-latestly) उन्होंने बड़ी बेबाकी से बताया कि आप लोगों के हमें संदेश मिल गए थे लेकिन हम आपसे मिलने से परहेज कर रहे थे हालांकि दिल से हम चाहते थे कि अपने पुरखों के वतन के लोगों से मिलना. उनका संबंध अलीगढ़ से था. न मिलने की उन्होंने दो वजहें बताई थीं : एक विपक्षी पार्टियों द्वारा हमें हिंदुस्तानी एजेंट बताना और दूसरे हम से हुई बातचीत को काटछांट कर छापा जाना. इससे हमारी छवि खराब होती है. हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि हिंदुस्तान से हमारे बुज़ुर्ग आए थे, हम पक्के पाकिस्तानी हैं और हमें पाकिस्तानी होने पर फख्र है.क्योंकि मेरा टेप रिकॉर्डर चल रहा था उन्हें मैंने भरोसा दिलाया कि आपसे हुई बातचीत ज्यों की त्यों छपेगी और उसकी कॉपी आपको भेज दी जाएगी. हमने ऐसा किया भी.
थोड़ी देर में हलचल हुई. देखा कि काली ऐनक पहने एक युवा नेता तेज़ी से स्टेज पर आया. इतने में लाउड स्पीकर से आवाज़ सुनाई दी ‘मज़लूमों का मसीहा अल्ताफ हुसैन, अल्ताफ हुसैन.’ अल्ताफ हुसैन मंच के बीच में खड़े होकर लोगों का अभिवादन कर रहे थे. वह कभी स्टेज के एक कोने में जाते तो कभी दूसरे कोने में. हाथ हिला हिलाकर लोगों का अभिवादन कर रहे थे. भीड़ भी बला की थी. आधी रात से ज़्यादा वक्त गुज़र चुका था मज़ाल है कि लोग वहां से हिले हों. कुछ लोग घरों की छतों पर खड़े थे, घरों के गलियारों में, सड़कों पर तिल रखने की जगह नहीं थी. ऐसी क्रेज़ थी अल्ताफ हुसैन की. उनकी आवाज़ में भी दम था. वह कह रहे थे ‘हम लोग अगर सत्ता में आये तो मुल्क का चेहरा बदल देंगे. लोगों को पूरी आजादी देंगे. गुरबात नाम की कोई चीज नहीं होगी. हम पाकिस्तान को जन्नत बना देंगे. याद रखिए हम पाकिस्तानी हैं, यह ही हमारा मुल्क है. इसकी बहबूदी ही हमारा मकसद. हमें कोई किसी का एजेंट समझने या कहने की गलतफहमी न पाले. हम पाकिस्तानी हैं और ताउम्र पाकिस्तानी ही रहेंगे.’ अल्ताफ हुसैन बहुत अच्छे वक्ता हैं और भीड़ को बांधे रखने की उन्हें कला आती है. यह चुनावी सभी करीब सुबह चार बजे खत्म हुई. हम लोगों से अलग से बात करते हुए उन्होंने कबूला कि किसी हिंदुस्तानी के साथ दीख
जाना भी हम पर उसका एजेंट चस्पा दिया जाता है, बात करना तो दीगर है. इसलिए हमें अपनी तक़रीर में अपने पाकिस्तानी होने का प्रूफ देना पड़ता है. बड़े ही प्यार से मिले थे अल्ताफ हुसैन हम लोगों को निस्संदेह.
जैसे मैंने कहा कि ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ के हर अध्याय से मेरा जुड़ाव है लेकिन अब मैं संक्षेप में ही अपनी बात रखूँगा नहीं तो लोग कहेंगे कि मैं अपना ‘ज्ञान बघार’ रहा हूं.विवेक शुक्ला ने अपनी इस किताब में नयी नयी जानकारियों को उड़ेल कर रख दिया है जो मेरे लिए भी कई ‘नयी’ हैं. मेरे साथ दिक्क़त यह है कि एक तो मैं वहां का जन्मा हूं और दूसरे पांच-छह बार पाकिस्तान के हर बड़े शहर को कई बार देख आया हूं और वहां के नेताओं के घरों में भी गया हूं. इसलिए अपनी ‘टांग अड़ा’ देता हूं. आशा है विवेक
इसे सहृदयता से लेंगे.एक बात काबिलेगौर है कि विभाजन के बाद जो लोग पश्चिमी पंजाब में आ गए वह देर सबेर यहां के हुक्मरान बन गए जैसे लियाकत अली खान, ज़ुल्फिकार अली भुट्टो,नवाज़ शरीफ, जनरल ज़िया उल हक़, जनरल परवेज़ मुशर्रफ, इब्राहिम इस्माइल चुन्दरीगर, ममनून हुसैन, जनरल मिर्ज़ा असलम बेग, इमरान खान आदि. कराची की ओर जाने वाले केवल सिंध तक महदूद होकर ही रह गए.आज भी वे ‘मुहाजिर’ यानी शरणार्थी कहलाते हैं जबकि पश्चिम पाकिस्तान में आकर बसने वालों पर ऐसा कोई तगमा नहीं है. मजेदार बात यह है कि पंजाब का मुख्यमंत्री पद नवाज़ शरीफ का ‘पॉकेटबरो’ हो गया है. 1990 तक नवाज़ शरीफ पंजाब के मुख्यमंत्री थे लेकिन अक्टूबर, 1990 में राष्ट्रीय असेंबली का चुनाव जीतने पर वह प्रधानमंत्री बन गए. उनके भाई शहबाज़ शरीफ पहले 1988 में पंजाब असेंबली के लिए चुने गए

और शहबाज़ शरीफ 1990 में राष्ट्रीय असेंबली के लिए. वह 20 फ़रवरी, 1997 को पहली बार पंजाब के मुख्यमंत्री बने. उसके बाद वह 2008 और 2013 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने. अप्रैल 2022 से वह लगातार देश के प्रधानमंत्री हैँ. 26 फ़रवरी, 2024 से नवाज़ शरीफ की बेटी मरियम नवाज़ शरीफ पंजाब की मुख्यमंत्री हैं. देखा जाए तो पंजाब सूबे पर शरीफ खानदान का ही कब्ज़ा है. – त्रिलोक दीप. (….अगले अंक में जारी)
