विख्यात कवि एवं सांसद श्रीकांत वर्मा ‘दिनमान’ में मेरे सहयोगी थे: त्रिलोक दीप
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (अंतिम भाग)
‘लोकप्रिय उपन्यास की अपनी खूबियां और अपने खतरे होते हैं. लोकप्रिय उपन्यास का सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह अपने को जिंदगी का आईना मानता हुआ सतह की तस्वीर पेश करने की कोशिश करता है और इस कोशिश
में वह सतह के पीछे के दृश्य को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करता है. उसकी खूबी यह है कि वह पाठक के साथ एक सीधा-सीधा संवाद कायम करता है. इस तरह का संवाद कायम करना महत्वाकांक्षी साहित्य के लिए दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है. किसी भी लेखक को, जो कि लोकप्रिय उपन्यास की रचना करना चाहता है, इन खतरों और खूबियों से बखूबी वाकिफ होना चाहिए. तभी वह न केवल अपने साथ, बल्कि अपने पाठक के साथ भी न्याय कर सकता है. युवा कथाकार त्रिलोक दीप उपन्यास के खतरों और खूबियों दोनों से वाकिफ हैं. उनका उपन्यास पढ़ते हुए सीधी प्रतिक्रिया यही होती है कि वह रचना के लिए उपलब्ध कच्चे माल का अपनी इच्छानुसार इस्तेमाल करना अच्छी तरह जानते हैं. उन्होंने बिना किसी दावे के इस उपन्यास की रचना की है. उन्होंने किसी तरह का ढोंग भी नहीं किया है. एक सरल ढंग से एक सरल कहानी कही गयी है जिसका प्रभाव अच्छे-खासे पाठकवर्ग पर होगा……..
किसी भी लेखक के पहले उपन्यास से बहुत-सी शिकायतें की जा सकती हैं, लेकिन की नहीं जानी चाहिएं. शिकायत के लिए लेखक के अगले कृतित्व के द्वार खुले होते हैं….’ श्रीकांत जी ने बहुत लंबी भूमिका लिखी है, यह उसका थोड़ा सा हिस्सा है.
श्रीकांत वर्मा मुझे बहुत स्नेह करते थे लेकिन किसी को इस बात की भनक नहीं लगने देते थे. उनसे जुड़े एक और प्रसंग का उल्लेख करना अभीष्ट होगा. एक दिन बिलासपुर से राम कुमार तिवारी का फोन आया कि कवि-लेखक-पत्रकार श्रीकांत वर्मा की पुण्यतिथि पर श्रीकांत वर्मा पीठ द्वारा दो दिवसीय आयोजन ‘स्मरण श्रीकांत वर्मा 2023’ आयोजित किया जा रहा है जिसकी अध्यक्षता आपको करनी है. यह सुखद
आश्चर्य था मेरे लिए. उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि उन्होंने जनसुलभ पुस्तकालय के अज्ञेय वाले कार्यक्रम में आपने श्रीकांत वर्मा की पत्रकारिता का उल्लेख किया था. उसी से प्रेरित होकर हम आपको आमंत्रित कर रहे हैं. उन दिनों मैं पूरी तरह से स्वस्थ नहीं था फिर भी डॉक्टर की अनुमति लेकर 24 मई को बिलासपुर पहुंच गया, 25-26 मई को कार्यक्रम था. श्रीकांत जी की साहित्य साधना के विभिन्न कोणों पर अपने विद्वतापूर्ण विचार रखने के लिए कई लोगों को न्योता गया था. इनमें से मैं व्यक्तिगत तौर पर ‘दूरदर्शन’के पूर्व महानिदेशक लीलाधर मंडलोई से परिचित था और गीत चतुर्वेदी के बारे में थोड़ा बहुत जानता था. श्रीकांत वर्मा की मूर्ति पर माल्यार्पण कर ज्योति प्रज्वलित की. श्रीकांत जी के अवसान दिवस पर पहले सत्र में ‘सदियों के अंतराल में श्रीकांत वर्मा का सृजन संसार’ का प्रारंभ करते हुए भोपाल से आए विख्यात लेखक गीत चतुर्वेदी ने कहा कि श्रीकांत वर्मा पर जब भी वैचारिक हमले हुए उनका जवाब उन्होंने सदा बौद्धिकता से दिया. उनके कहानी पक्ष पर बात करते हुए गीत चतुर्वेदी ने कहा कि श्रीकांत जी कहानियों में आम आदमी का दर्द रेखांकित होता है. दुर्ग के साहित्यकार जयप्रकाश ने श्रीकांत वर्मा को आवेगों का कवि बताते हुए कहा कि उनकी रचना में ज्ञान का संवेदनात्मक पक्ष परिलक्षित होता है. लीलाधर मंडलोई ने कहा कि श्रीकांत जी को कविता में जो खुशी और आलोचना में जो बसंत मिलना चाहिए था नहीं मिला. इन तमाम बुद्धिजीवियों, विद्वानों और मनीषियों को सुनने के बाद मैंने कहा कि बेशक मैं भी श्रीकांत वर्मा के व्यक्तित्व के साहित्यिक गुणों, सरोकारों और आयामों से थोड़ा
बहुत परिचित हूं लेकिन मैं उनके व्यक्तित्व के मनवीय करुणा और संवेदनशीलता वाले पक्ष पर ही कुछ कहने का प्रयास करूंगा. मैंने श्रीकांत जी की पत्रकारिता के उन सभी प्रसंगों की चर्चा की जिनका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूं. इसी अवसर पर ‘मैं सदियों के अंतराल में’ श्रीकांत वर्मा पर एकाग्र स्मारिका का लोकार्पण भी हुआ. इसके अतिरिक्त श्रीकांत वर्मा के कविता संग्रह ‘मगध’.के अंग्रेज़ी अनुवाद का भी लोकार्पण हुआ. कविताओं का अनुवाद किया है राहुल सोनी ने.
बेशक बिलासपुर में ‘स्मरण श्रीकांत वर्मा 2023’ का आयोजन बहुत ही सफल रहा जिसका पूरा श्रेय प्रसिद्ध कवि कहानीकार राम कुमार तिवारी को जाता है जो श्रीकांत वर्मा पीठ के अध्यक्ष थे. पीठ के अस्तित्व में आने के बाद यह तीसरा कार्यक्रम था. इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करना सरल कार्य नहीं है. विषय से जुड़े लोगों को पहले चीन्हना होता है और उन्हें आमंत्रित करना होता है. यह बहुत जटिल प्रक्रिया है. लेकिन राम कुमार तिवारी ने न केवल विषय से जुड़े लोगों की पहचान की बल्कि उन्हें आमंत्रित कर उनकी पूरी सुख सुविधा का ख्याल रखा. लीलाधर मंडलोई और गीत चतुर्वेदी के अलावा मुझे जिन लोगों के नाम याद पड़ रहे हैं वे कुछ इस प्रकार के हैं : आनंद हरसुल, अनिल यादव, त्रिलोक महावर, मांझी अनंत, जोशना बनर्जी आडवाणी, शैलजा पाठक, राजेश सकलानी, परिधि शर्मा, प्रभु नारायण वर्मा, राजेंद्र दानी, मुकेश वर्मा आदि. दिलचस्प बात यह रही कि गीत चतुर्वेदी हरफ़नमौला निकले. एक तो उनकी सभी तीनों सत्रो में भागीदारी रही और दूसरे उन्होंने श्रीकांत वर्मा की सभी विधाओं का अद्भुत विवेचन किया.
राज्यसभा के दो बार सांसद (1976-82 और 1982-1986) रहे श्रीकांत वर्मा ने अपने गृह क्षेत्र बिलासपुर के विकास में महती सेवाएं दी थीं.
यदि उनका असामयिक निधन न हुआ होता तो उनके ज़ेहन में अपनी मातृभूमि के लिए बहुत कुछ करने की चाह थी. बिलासपुर ने भी अपने
इस होनहार पुत्र को भुलाया नहीं. उनकी याद में छत्तीसगढ़ भवन के अहाते में नेहरू चौक के पास श्रीकांत वर्मा की एक आदमकद मूर्ति लगी हुई है जिसे हम सभी लोगों ने देखा और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी. उनके नाम पर बिलासपुर में एक सड़क भी है जिसे ‘श्रीकांत वर्मा मार्ग’ कहते हैं. यह सड़क लिंक रोड से व्यापार विहार सड़क को जोड़ती है. इसकी लंबाई लगभग एक से डेढ़ किलोमीटर होगी. अपने इस प्यारे साथी, सहयोगी और मित्र की मधुर स्मृति में सादर नमन ! ………. त्रिलोक दीप .
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