विख्यात कवि एवं सांसद श्रीकांत वर्मा ‘दिनमान’ में मेरे सहयोगी थे: त्रिलोक दीप
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-3)
दोनों के बीच यह तय हुआ कि जयप्रकाश नारायण (जेपी )अपने हाथ से एक संदेश लिखकर देंगे जो चित्र प्रदर्शनी स्थल के बाहर प्रदर्शित किया जायेगा.जेपी से यह संदेश लाने का दायित्व मुझे और श्रीकांत वर्मा को सौंपा गया.हमें अज्ञेय जी ने एक
मोटे कागज़ की शीट और मोटाई में लिखने वाला एक पेन भी दिया.जेपी उन दिनों 101, फ्रेंड्स कॉलोनी में किन्हीं जे.जे. सिंह (जीवनजीत सिंह) के यहां ठहरे हुए थे. हमारे पहुंचने की खबर पाकर वह नीचे आ गये. श्रीकांत ने जेपी को अपना और मेरा परिचय दिया. श्रीकांत को वह पहले से जानते थे लेकिन औपचारिकता के नाते तारुफ करा दिया.अज्ञेय जी से हुई उनकी बातचीत के अनुसार जेपी ने मोटे मोटे अक्षरों में अपना संदेश हमें लिखकर दे दिया. उन्होंने लिखा कि ‘इस समय बिहार अकाल के बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा है. इससे पहले वहां इतना भयंकर अकाल कभी नहीं पड़ा. सच्चिदानंद वात्स्यायन ने बिहार के धुर भीतर तक जाकर अकाल पीड़ितों को देखा, सुना, उनका हालचाल पूछा, उनके कष्टों के बारे में पता किया. उनके खींचे ये चित्र अकाल पीड़ियों की पीड़ा के साक्षी हैं. मुझे आशा है कि बिहार और केंद्र की सरकारें इन अकाल पीड़ितों की समय पर सहायता करेंगी. ‘जेपी की हस्तलिपि बहुत सुंदर और साफ थी. हाथ आया अवसर न गंवाते हुए श्रीकांत वर्मा ने जेपी से बिहार में अकाल के अलावा कुछ राजनीतिक प्रश्नों के उत्तर भी ले लिये. जेपी श्रीकांत की ‘अवसर का लाभ उठाने की कला’ से बहुत प्रभावित हुए.अज्ञेय की इस चित्र प्रदर्शनी का माकूल असर हुआ. कई समाचारपत्रों में समीक्षाएं भी छपीँ. महादेवी वर्मा ने भी यह चित्र प्रदर्शनी देखी और अज्ञेय ने स्वयं प्रदर्शित चित्रों के बारे में उन्हें विस्तृत जानकारी
दी. महादेवी वर्मा अज्ञेय को अपना छोटा भाई मानती थीं.
एक और प्रसंग याद आ रहा है. श्रीकांत वर्मा को अमेरिका जाना था. इसके लिए अपने पासपोर्ट पर वीज़ा लगवाने के लिए उन्हें अमेरिकी दूतावास जाना पड़ता. उन दिनों वीज़ा ऑफ़िस वहीं पर था.वहां बहुत सुबह से ही कतारें लगनी शुरू हो जाती थीं. उन्हें यह ज्ञात था कि ‘दिनमान’ में मेरी विदेश बीट है. एक दिन मेरे पास आकर बोले,’ दीपजी,अमेरिका जाना है उसके लिए वीज़ा लगवाना होगा.’ मैंने कहा कि इसमें क्या मुश्किल है.आप तो देश के परिचित चेहरे हैं.वह धीमे से हंस पड़े और बोले, ‘आपकी सहायता की आवश्यकता है’. मेरा उत्तर था, मैंने मना कब किया है,चलें । अब उनके चौंकने की बारी थी.बोले इस समय तो वहां बहुत भीड़ होगी. मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि आपको कतार में नहीं लगना पड़ेगा. हम दोनों *अमेरिकी दूतावास पहुंचे. मैंने अपने परिचित अधिकारी से उनका परिचय कराते हुए कहा कि श्रीकांत जी ‘दिनमान’ में विशेष संवाददाता हैं और हमारे सीनियर सहयोगी. र्ऑफ़िस से निकलने से पहले मैंने उस अधिकारी को फ़ोन करके अपने आने की सूचना दे दी थी.उन्होंने श्रीकांत से वीज़ा के कागजात लिये. इससे

पहले कि हमारी चाय खत्म होती श्रीकांत के पासपोर्ट पर पांच बरस का वीज़ा लगकर आ गया था. एक दफे इस अधिकारी से मेरी कराची में वहां भारत के महावाणिज्यदूत मणि त्रिपाठी के 63, क्लिफटन आवास पर दीवाली के अवसर पर आयोजित पार्टी में मुलाक़ात हो गयी. उन दिनों वह पाकिस्तान में पोस्टेड थे. त्रिपाठी दंपत्ति दीपावली के दिन अपने घर को परंपरागत मिट्टी के दीयों से सजाते थे. क्योंकि मैं भी उन दिनों उन्हीं के यहां था लिहाज़ा दीयों को विभिन्न स्थानों पर रखने में मैंने भी अपना योगदान दिया था. अफ़सोस अब वह खूबसूरत बंगला खंडहर में तब्दील हो चुका है क्योंकि 1992 में भारत में बाबरी मस्जिद की घटना के विरोध में पाकिस्तान में जूनूनियों ने इस बंगले को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया था. मणि त्रिपाठी के उत्तराधिकारी राजीव डोगरा कराची में मुझे 1993 में पर्ल होटल में मिले थे और वह वहीं से अपना कामकाज कर रहे थे. अब तो महावाणिज्य दूतावास बंद कर दिया गया है.
अमेरिकी वीजा प्राप्त कर बहुत प्रसन्न थे और बार बार मेरा शुक्रिया अदा कर रहे थे. यह उनका बड़प्पन था.यह 1967 के आसपास की बात है. बातों बातों में मैंने
श्रीकांत को यह जानकारी भी दी की राष्ट्रकुल देशों में जाने के लिए वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती और न ही गुटनिरपेक्ष देशों में जाने के लिये.मतलब यह कि चाहे आपको ब्रिटेन जाना हो, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया आप बिना वीज़ा लिए उन देशों की यात्रा कर सकते हैं. यह व्यवस्था काफी समय तक रही. 1975 से 1983 के बीच मैं छह बार लंदन गया, एक बार टोरांटो और एक ही बार बेलग्रेड, मुझे वीज़ा लेने की दरकार नहीं हुई थी. अब राष्ट्रकुल देशों तथा गुटनिरपेक्ष देशों में वीज़ा प्रथा कब शुरू हुई मुझे इसकी जानकारी नहीं है.
श्रीकांत वर्मा (18 सितम्बर, 1931-25 मई, 1986) बहुत शालीन और तहजीबयाफ्ता व्यक्ति थे. मृदुभाषा थे और एक दूसरे के मददगार भी. कुछ लोगों का अलबत्ता यह आरोप था कि 1975 में आपातकाल के समय वह अपने कुछ परिचितों की सहायता नहीं कर सके. एक बार मैंने उनसे किसी प्रसंग में यों ही पूछ लिए तो बोले कभी कभी प्रशासनिक विवशता होजाती है. ऐसा नहीं कि मैंने प्रयास नहीं किए थे. एक दफ़े श्रीकांत ने मुझसे पूछा कि आजकल कहानियां नहीं लिखते क्या. मैंने आपकी कुछ कहानियां ‘कहानी’ पत्रिका में पढ़ी हैं. मुझे अच्छी लगीं. श्रीपत राय मुझे हर महीने ‘कहानी’ पत्रिका भेजते हैं. उसी.से मुझे पता चला कि आप कहानियां लिखते हैं. मैंने श्रीकांत को बताया कि आजकल एक उपन्यास लिख रहा हूं. जल्दी ही उसकी पांडुलिपि आपकी राय जानने के लिए दूंगा.
कुछ दिनों के बाद मैं उस उपन्यास की पांडुलिपि ऑफिस ले आया. उपन्यास का शीर्षक था ‘चढ़ता हुआ रंग’. जब श्रीकांत ने अपनी
रिपोर्ट लिखा दी तो मैंने उन्हें झिझकते हुए वह पांडुलिपि पढ़ने के लिए देते हुए कहा कि आपकी राय मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण होगी. उन्होंने हंसते हुए कहा कि इसे मैं घर ले जाकर तसल्ली से पढ़ कर आपको बताऊंगा. ज़रूरत समझने पर मैं उसपर अपनी लिखित राय देते हुए आपको इंट्रोड्यूस भी कर दूंगा. हालांकि इसकी आवश्यकता नहीं होती. क्योंकि आपका पहला उपन्यास है इसलिए मैं चाहता हूं कि इस विधा में आपकी लेखनी के बारे में पाठकों को बताया जाए. श्रीकांत ने वास्तव में इस उपन्यास को पढ़ा और उस पर अपनी बेबाक राय भी दी. प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश : ___ त्रिलोक दीप . …..….(अगले अंक में जारी)
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