विख्यात कवि एवं सांसद श्रीकांत वर्मा ‘दिनमान’ में मेरे सहयोगी थे: त्रिलोक दीप
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-2)
अब ‘दिनमान’ हर हफ्ते आना होता रहा और श्रीकांत जी से मिलना भी. एक दिन किसी अंग्रज़ी पेपर
में ‘दिनमान’ में विशेष संवाददाता की भर्ती के लिए एक विज्ञापन देखा. अपनी बहन प्रभजोत जी की सलाह पर मैंने भी इस पद के लिए अपनी अर्ज़ी डाल दी.उसके उत्तर में मुझे एक टेस्ट में शामिल होने के लिए बुलाया गया.वहां जाकर पता चला कि श्रीकांत जी भी टेस्ट दे रहे हैं. एक हफ्ते के बाद इंटरव्यू हुआ जिसमें श्रीकांत जी का चयन हो गया.उन्हें मैंने दिलखोल बधाई दी. कुछ दिनों के बाद सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (वहां इसी नाम से जाने जाते थे) का एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि विशेष संवाददाता के पद के लिए तो आपका चयन नहीं हो सका, यदि उपसंपादक बनने के लिए तैयार हैं तो मुझसे मिल लीजिए. मैंने जब अपनी बहन प्रभजोत जी से बात की तो उनकी सलाह थी कि इस ऑफ़र को स्वीकार कर लेना चाहिए, वैसे भी तुम लोकसभा सचिवालय छोड़ना चाह रहे थे. लिहाजा पहली जनवरी 1966 को मैं विधिवत ‘दिनमान’ के संपादकीय विभाग का सदस्य बन गया.अब श्रीकांत जी से रोज़ मिलना होने लगा।
उन दिनों ‘दिनमान’ के संपादक सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय और दूसरे लोगों के बैठने की व्यवस्था टाइम्स ऑफ इंडिया के दूसरे प्रकाशनों के लोगों के साथ ही टाइम्स हाउस में थी जो 7, बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित है. दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग को लंदन की फ़्लीट स्ट्रीट के समकक्ष माना जा
ता है जहां से वहां के प्रसिद्ध समाचारपत्र निकलते हैं. संपादकीय टीम दूसरी मंज़िल पर बैठती थी अर्थात टाइम्स ऑफ इंडिया,नवभारत टाइम्स और इकनॉमिक टाइम्स. ‘महाराष्ट्र टाइम्स’का एक प्रतिनिधि भी वहीं बैठता था. कोशिश होती थी कि हम ‘दिनमान’ के लोग ग्यारह बजे तक ऑफ़िस पहुंच जायें. वैसे समय की वहां कोई पाबंदी नहीं थी.उस समय ‘दिनमान’ में संपादक सहित बमुश्किल बारह-तेरह लोग थे जो रिपोर्टिंग भी करते थे और लेखन तथा संपादन का कार्य भी. विधिवत विशेष संवाददाता केवल श्रीकांत वर्मा ही थे. राज्यों में भी कोई विधिवत संवाददाता नहीं था लेकिन बिहार से फणीश्वरनाथ रेणु, उत्तरप्रदेश से राय कृष्णदास और गूंजेश्वरी प्रसाद,राजस्थान से महेश झालानी,ओम गौड़,मध्यप्रदेश से रमेश नैयर आदि समाचार और विभिन्न विषयों पर आलेख भेजा करते थे.बनवारी और अनुपम मिश्रा, विनोद और कविता नगपाल, प्रो. कृष्ण कुमार आदि भी लिखा करते थे। प्रयाग शुक्ल फ़्री लांसिंग किया करते थे।’दिनमान’ में उस समय पत्रिका में सिर्फ संपादक का नाम जाता था सच्चिदानंद वात्स्यायन. उनके अलावा ओमप्रकाश दीपक और इंदर लाल का नाम उनके आलेखों के साथ छपता था.
अब आते हैं श्रीकांत वर्मा पर..वह भी ग्यारह सवा ग्यारह बजे ऑफ़िस पहुंच जाते थे. वाहन के नाम पर वात्स्यायन जी की अपनी स्टैंडर्ड कार थी. उन दिनों एम्बेस्डर और फीयट दो अन्य कारें थीं. श्रीकांत जी अमूमन टैक्सी पर ही आते जाते थे. वह अपनी रिपोर्ट सीधे टाइपरा
इटर पर डायरेक्ट डिक्टेशन देकर लिखवाते थे.अपने पास किसी अंग्रेज़ी समाचारपत्र की फ़ाइल रख लेते थे. हमारे कुछ सहयोगियों को भ्रम होता था कि वह अख़बार देखकर स्टोरी लिखवा रहे हैं. असल में उनके पास अपनी विशेष स्टोरी हुआ करती थी उसे अपडेट करने के लिहाज़ से समाचारपत्र की फ़ाइल देखते थे. जब उनकी स्टोरी छप कर आती तो भ्रम करने वाले लोग शर्मिंदा होते थे अपने आपसे, क्योंकि उनकी लिखी रिपोर्ट पूरे हफ्ते तक सही और सटीक रहने वाली होती थे. श्रीकांत जी के अपने पुख्ता संपर्क सूत्र होते थे कांग्रेस के अतिरिक्त भी. उनका भाषा और अपने विषय पर अधिकार ऐसा कि उनकी टाइप की हुई कॉपी में नहीं के बराबर सुधार करना पड़ता था बशर्ते टाइपिंग में कोई गलती न हो. उनकी यह राजनीतिक रपट ‘हमारे विशेष संवाददाता द्वारा’ के नाम से छ्पा करती थी. यह तो उनका नियमित स्तंभ होता था. इसके अतिरिक्त वह कला और साहित्य पर भी लिखा करते थे. कभी कभी उनके द्वारा लिए गये विशेष इंटरव्यू भी छपते थे.
श्रीकांत जी में गजब की ग्रह्यशक्ति थी. जिससे एक बार मिल लेते उसे याद रखते थे. वह बहुत पढ़ाकू थे और उन्हें विभिन्न विषयों की गहन जानकारी थी. वह मूलत: कवि थे लेकिन उन्होंने उपन्यास, कहानियां और संस्मरण भी लिखे थे. उनका लिखा मैंने काफ़ी कुछ पढ़ा था लेकिन यहां मैं उनके पत्रकारीय पक्ष और व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण पहलुओं तक ही अपने आपको सीमित रखूँगा.उनके साहित्य और कृतित्व पर तो बहुत कुछ लिखा जा चुका है. यदि उनकी किसी बौद्धिक और विद्वान से चर्चा होती तो वह काफी सार्थक और गहन हुआ करती थी.पत्रकारिता की उनकी भाषा बहुत ही सहज,सरल और सामान्य व्यक्ति की समझ में आ जाने वाली होती थी और साथ ही भावपूर्ण भी.गंभीर से गंभीर विषय को वह सहज और सामान्य भाषा में कह जाने की महारत रखते थे.वह केवल अपना एक विशेष राजनीतिक स्तंभ ही नहीं लिखते थे समय की मांग के अनुसार वह किसी भी विषय पर लिखने की कुव्वत रखते थे. उनका गहन अध्ययन था, छोटी और हल्की बातें न कभी अपने लेखन में वह करते थे और न ही बातचीत में.वह अक्सर कहा करते थे कि अच्छा पत्रकार वही है जो अपने आपको अपडेट रखता है और जिस किसी का वह इंटरव्यू लेता है उसे अपने प्रश्नों और प्रति प्रश्नों से उसे जता और चेता देता है कि वह पूरी तैयारी के साथ आया है ।

श्रीकांत वर्मा बहुत रिज़र्व रहते थे. हरेक के साथ नहीं उठते बैठते और खुलते थे, बेशक दुआ सलाम उनकी सब के साथ थी. उनकी कुछ हद तक करीबी मनोहर श्याम जोशी, प्रयाग शुक्ल, योगराज थानी और मुझ से थी. वह किसी की टेबल पर नहीं जाते थे, उनसे ही लोग मिलने के लिए आया करते थे.’ दिनमान’ में फर्नीचर की कुछ कमी थी इसलिये एक टेबल पर दो-दो व्यक्ति बैठा करते थे. पहले-पहल मैं श्रीकांत जी के सामने बैठा लेकिन बाद में मैं रामसेवक श्रीवास्तव की सामने वाली सीट पर बैठने लगा. वह इसलिए क्योंकि मुझे भी प्रदेश डेस्क के साथ जोड़ दिया गया जिसके वह इंचार्ज थे. सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और रमेश वर्मा की अलग-अलग सीटें थीं जबकि श्यामलाल शर्मा के सामने योगराज थानी बैठते थे और इसी प्रकार जवाहरलाल कौल और श्रीमती शुक्ला रुद्र भी.बाद में कुछ नया फर्नीचर आने पर मुझे एक बड़ा सा टेबल मिल गया जिस पर मैं अपना टाइपराइटर भी रखता था. अपने संवाद अक्सर मैं खुद ही टाइप करता था.
श्रीकांत जी के साथ मेरी खासी करीबी थी. कभी कभी हम लोग छत्तीसगढ़ की राजनीति पर भी चर्चा कर लेते थे.जब कभी मेरा रायपुर जाने का प्रोग्राम बनता तो कहते कि मेरा भाई आपसे मिलने के लिए आयेगा.उस भाई का नाम अब मुझे याद नहीं.दफ्तर में वह वात्स्यायन जी अपनी विशेष रिपोर्ट पर चर्चा करते रहते थे. 1967 में बिहार में भयंकर अकाल पड़ा था.उसे कवर करने के लिए वात्स्यायन जी स्वयं गये थे. पटना से रेणु जी को साथ ले लिया. दोनों के बीच तय हुआ कि फोटो वात्स्यायन जी लेंगे और रिपोर्ट रेणु जी लिखेंगे. लेकिन बीच बीच में अज्ञेय जी की भी कुछ लोगों से बात हो जाती थी जिसे वह रेणु जी से शेयर कर लेते. एक स्थान पर उन्हें सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण भी मिल गये जो अपने कुछ समर्थकों के सा
थ अकाल का जायजा लेने के लिए आये थे.वात्स्यायन जी और जेपी एक दूसरे से परिचित थे. वह जानते थे कि अज्ञेय बहुत अच्छे फोटोग्राफर हैं. जेपी ने अज्ञेय को सलाह दी कि ‘दिनमान’ में अपनी स्टोरी के साथ फोटो छापने के बाद बाकी के चित्रों की दिल्ली में आप एक प्रदर्शनी लगायें जिसका उद्घाटन मैं करूंगा. दिन और समय निश्चित हो गया.अज्ञेय जी ने बड़ी संख्या में चित्र भी तैयार करा लिये थे टाइम्स ऑफ़ इंडिया की फोटो सेक्शन से.
यहां एक प्रसंग याद आता है. वात्स्यायन जी ने जिस फोटोग्राफर को निगेटिव डेवलप करने को दिए उसका नाम परमेश्वरी दयाल था. वह निगेटिव डेवलप करते करते सोचता रहा कि यह फोटो वात्स्यायन जी ने खुद खींचे हैं या किसी प्रोफेशनल फोटोग्राफर से खिंचवाएं हैं. वह अपने मन की बात मन में न रख सके. उन्होंने वात्स्यायन जी से पूछ ही लिया, साहब ये फोटो आपने खुद खींचे हैं या… इससे पहले परमेश्वरी दयाल कुछ आगे बोलते अज्ञेय ने जिस अंदाज़ से डेवलप किए गए निगेटिव से फोटो बनाने के लिए कहा उन्हें अपनी ‘मूर्खतापूर्ण सोच’ पर अफ़सोस हुआ. वात्स्यायन जी ने उनसे कुछ फोटो कई कोणों से बनवाये. यह बात परमेश्वरी दयाल ने हम सब को खुद बतायी. इ
स पर सर्वेश्वर जी ने परमेश्वरी जी को बताया कि ‘भाई न केवल बहुत अच्छे फोटोग्राफर हैं बल्कि गजब के पेंटर भी हैं. उन्होंने अपनी कई पुस्तकों के कवर स्वयं डिज़ाइन किए हैं और ‘अरे यायावर, रहेगा याद’ नामक संस्मरणों की पुस्तक के सभी स्केच उनके बनाए हुए हैं.’ सर्वेश्वर जी अज्ञेय जी को ‘भाई’ कहकर संबोधित करते थे. अज्ञेय ने बिहार अकाल से संबंधित बहुत सी फोटो बनवा ली थीं. जब वह साहित्य अकादमी के हाल में प्रदर्शनी की तैयारी कर रहे थे कि जयप्रकाश नारायण का वात्स्यायन को फोन आया कि वह अस्वस्थ हो गए हैं और डॉक्टर ने उन्हें घर से निकलने के लिए मना किया है. ——–.. त्रिलोक दीप . …..….(अगले अंक में जारी)
