खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा, ‘मैं 15 साल अंग्रेज़ों की जेल में रहा और 15 साल ही पाकिस्तान की जेलों में……. . - News On Radar India

खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा, ‘मैं 15 साल अंग्रेज़ों की जेल में रहा और 15 साल ही पाकिस्तान की जेलों में……. .

...मगर पाकिस्तानी बहुत ज़ालिम हैं: पठान प्रेजिडेंट जनरल अय्यूब खान चचा-चचा कहता था पर लिहाज़ नहीं करता था'

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-2)

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       आपके अहिंसक खुदाई खिदमतगार आन्दोलन की वजह से आपको ‘सरहदी गांधी ‘ या ‘सीमांत गांधी ‘ कहा जाता है, इस सवाल पर हंसते हुए बोले, ‘भई असली गांधी तो एक ही है,हम तो सब उसके अनुयायी हैं ।खुदाई खिदमतगार बहुत जल्दी सर्वप्रिय हो गया था जो पठानों का राजनीतिक, सामाजिक,  आर्थिक और आध्यात्मिक आन्दोलन था।इस आन्दोलन की वजह से पठानों में प्रेम, मोहब्बत,भाईचारा,एकता, जातिभक्ति के साथ साथ राष्ट्रभक्ति भी पैदा हुई । आम तौर पर पठानों को हिंसक माना जाता है लेकिन खुदाई खिदमतगार ने उनकी यह परिभाषा ही बदल दी ।जब कभी हम अंग्रजों से कहते कि हमारा यह आन्दोलन तो अहिंसक है तो इस पर उनका जवाब हुआ करता थ’अहिंसावादी पठान हिंसावादी पठान से ज़्यादा खतरनाक है ।’ गांधी जी की नज़रों में लॉर्ड इरविन अच्छे इंसान थे लेकिन उन्हें भी यह यकीन नहीं था कि पठान अहिंसावादी हो सकते हैं ।वह कहते थे कि ‘पठान और अहिंसा?असंभव है ।’ इस पर गांधी जी ने उन्हें कहा था कि आपको चाहिए कि आप सीमा प्रांत में जाकर अपनी आंखों से देखें कि पश्तून किस हद तक अहिंसा में आस्था रखते हैं ।’

लॉर्ड इरविन ने गांधी जी की जुबान का मान रखा और सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया जो फर्ज़ी मामलों में गिरफ्तार किए गये थे ।हमारे अहिंसात्मक आन्दोलन ने पठानों के दिलों से डर और शक़ पूरी तरह से खत्म कर दिया और उसकी जगह ली हिम्मत और बहादुरी ने ।ऐसी प्रतिष्ठा, उनके ऊंचे चरित्र और अनुशासन के कारण ही हिंदुस्तान की जंगे आज़ादी में  खुदाई खिदमतगारों की खिदमात खुले दिल से स्वीकार की गयी जिन के अहम रोल को गांधी जी ने भी तस्लीम किया था । 1939 के बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में मुझे पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त करने का फैसला हो गया और इस बाबत डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सूचित किया कि वह इस्तीफा दे रहे हैं और उनके स्थान पर बाचा खान यानी मुझे अध्यक्ष चुना गया है ।मैंने फौरन तार से इत्तला दे दी कि ‘मैं एक सिपाही हूं,खुदाई खिदमतगार हूं और खुदाई खिदमतगारी ही करूंगा ।’

कुछ लोगों का यह भी मानना रहा है कि कांग्रेस में आपके शामिल हो जाने के बावजूद कुछ बड़े नेताओं  से आपके खयालात वैसे नहीं मिलते थे जैसे गांधी जी और पंडित नेहरू से , मसलन सरदार पटेल, सी.राजगोपालाचारी,अबुल कलाम आज़ाद.. बीच में मुझे टोकते हुए गफ्फार खान ने कहा कि ऐसी गलतफहमियां फैलाने वाले हर जमात में होते हैं,ज़रूरत है ऐसे अंसरों से दूर रहने की।हम यह कैसे भूल सकते हैं कि सरदार पटेल के वालिद विट्ठल भाई पटेल,जो उस वक़्त सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के माननीय स्पीकर थे, ने रावलपिंडी में बैठकर सीमा प्रांत पर ढाये जाने वाले ज़ुल्म का विस्तृत ब्योरा अगर भारत भर की अखबारों को न भेजा होता तो हमें कांग्रेस में क्यों शुमार किया जाता ।विट्ठल भाई पटेल पेशावर के किस्सा खानी बाज़ार के उस गोलीकांड का जायजा लेने के लिए असेंबली द्वारा तैनात किये गये थे जिसमें बड़ी तादाद में खुदाई खिदमतगार मारे गये थे लेकिन अंग्रेज़ हुकूमत ने उन्हें वहां जाने की इज़ाजत नहीं दी थी लिहाजा रावलपिंडी में बैठकर कुछ चश्मदीद गवाहों की गवाही के आधार पर अंग्रेजों के ज़ुल्म की कहानियों का सिर्फ हिंदुस्तान को ही नहीं सारी दुनिया को वाजे कराया था ।ऐसे बाप के बेटे से हमारे रिश्ते कैसे तुर्श हो सकते हैं ।

सुना जाता है कि आप और गांधी जी हिंदुस्तान के बंटवारे के हक़ में नहीं थे तो यह विभाजन हुआ कैसे और क्यों?जहां तक मैं समझता हूं कि कुछ बड़े नेताओं की यह दलील थी अंग्रेज़ तो देश छोड़ कर जायें बदले में हमें विभाजन मंज़ूर कर लेना चाहिए ।इसके साथ एक पेंच और भी फंसा हुआ था सीमा प्रांत में जनमत संग्रह कराने का ।मैं और महात्मा गांधी दोनों जनमत संग्रह के विरुद्ध थे ।लेकिन कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने देश का विभाजन और सीमा प्रांत में जनमत संग्रह दोनों पर अपनी सहमति प्रदान कर दी ।यह फैसला मेरे लिए मौत के समान था ।मैं हैरान और परेशान था । मेरे ज़ख्मों पर नमक छिड़कते हुए मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने सुझाव दिया कि मुझे मुस्लिम लीग में शामिल हो जाना चाहिए । मुझे उनकी इस सलाह पर बहुत दुख हुआ क्योंकि कुछ समय पहले तक हम दोनों सैद्धांदिक और वैचारिक तौर पर मुस्लिम लीग की नीतियों के खिलाफ थे ।मुस्लिम लीग जहां विनाश के लिए काम कर रही थी वहां मैंने अपनी सारी ज़िंदगी निर्माणकार्य में लगा दी थी । मैंने गांधी जी से कहा कि हम पठान आप लोगों के साथी हैं तथा भारत की स्वाधीनता के लिए बहुत कुर्बानियां दी हैं लेकिन आप लोगों ने हमें मंझधार में छोड़ दिया और भेड़ियों के हवाले कर दिया ।

खान अब्दुल गफ्फार खान के दिल का दर्द उस समय उनकी जुबान पर आ गया जब उन्होंने कहा कि हमने तो कांग्रेस को नहीं छोड़ा लेकिन कांग्रेसियों ने हमें छोड़ दिया।अगर हम कांग्रेस को छोड़ देते तो अंग्रेज़ हमें सब कुछ देने को तैयार था ।
शायद अफगानिस्तान के साथ मिलाने के भी, क्योंकि हम दोनों के सामाजिक और सांस्कृतिक तौर-तरीकों में खासी एकरूपता है,भाषा और रीति-रिवाजों में भी ।

हक़ीक़त को समझते हुए आपने तो भारत और पाकिस्तान को अलग देश के तौर पर स्वीकार कर लिया था लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत क्यों आपको शक़ की नज़र से देखती रही, खान अब्दुल गफ्फार खान ने उदासी भरे लहजे में कहा कि इसे हम अपनी बदकिस्मती ही कहेंगे।हम ने तो हुकूमत से कहा था कि जिस तरह से आपके पंजाब, सिंध,पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगलादेश) बलूचिस्तान सूबे हैं वैसे ही पुश्तूनिस्तन भी रहेगा ।मुझे लगता है उनका मकसद दीगर था।जब हम ने हुकूमत को भरोसा दिलाया कि हम मुल्क में कोई हिस्सा नहीं मांगेंगे बल्कि मुल्क के वफादार शहरी होने के नाते उसकी तरक्की और बहबूदी के लिए कदम से कदम मिलाकर चलेंगे लेकिम पाकिस्तान की सरकार पर मेरे इन विचारों का कोई असर नहीं हुआ और मुझ पर निर्माण की आड़ में ध्वंस का इल्जाम लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया ।मुझ पर कबाइलियों से मिलकर मुल्क के खिलाफ साजिश रचने का भी आरोप लगा ।मेरे बेटे वली खान और गनी खान को भी हिरासत में ले लिया गया हमारे बिना किसी अपराध और सबूत के । हम पर  बेइन्तहा ज़ुल्म ढाये गये ।इतने तो फिरंगियों ने भी अपने शासनकाल में अत्याचार नहीं किए थे, उन्होंने न तो हमारे घरों को लूटा था, न ही महिलाओं का अपमान किया था और न ही हमारी अखबारों पर रोक लगाई थी ।लेकिन हमारी अपनी इस्लामी सरकार ने सारी हदें पार कर दीं ।ऐसा ही जेलों में इस्लामी सरकार का बर्ताव था जो गोरों के मुकाबले दस गुना ज़्यादा बुरा था । 15 साल मैं अंग्रजों की जेल में रहा |
और 15 ही बरस इस्लामी शासन की जेलों में । इनके वक़्त मेरे गुर्दे में खराबी हो गयी और मेरे पैरों में सूजन आ गयी । वहां

Trilok Deep

की जेलों के जेलर गलतशलत दवाएं देकर मेरा रोग बढ़ाते रहे । जब रोग बहुत बढ़ गया तो इलाज कराने के लिए मुझे जुलाई, 1964 में रिहा कर दिया गया। सितम्बर में अपने इलाज के लिए लंदन चला गया और दिसंबर में वहां से लौट कर मैंने अफ़ग़ानिस्तान में रहते हुए पख्तुनिस्तान की प्राप्ति के लिए पुरअमन आन्दोलन की शुरुआत की जिसमें मुझे सभी कबीलों का समर्थन प्राप्त हुआ ।                                                                       …..….(अगले अंक में जारी)

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