खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा, 'मैं 15 साल अंग्रेज़ों की जेल में रहा और 15 साल ही पाकिस्तान की जेलों में....... . - News On Radar India

खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा, ‘मैं 15 साल अंग्रेज़ों की जेल में रहा और 15 साल ही पाकिस्तान की जेलों में……. .

....मगर पाकिस्तानी बहुत ज़ालिम हैं: पठान प्रेजिडेंट जनरल अय्यूब खान चचा-चचा कहता था पर लिहाज़ नहीं करता था'

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-1)

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                 बात 26 मार्च, 1980 की है. खान अब्दुल गफ्फार खान कांग्रेस के शताब्दी समारोह में शिरकत करने के लिए दिल्ली आये थे। उनका तब बहुत स्वागत सत्कार हुआ था. दिल्ली हवाई अड्डे पर अगुवानी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की थी जो दूसरी बार जनवरी, 1980 में प्रधानमंत्री बनी थीं जनता पार्टी को हराकर. 1977 में इसी जनता पार्टी ने उन्हें पराजित किया था. इंदिरा गांधी को एयरपोर्ट पर देख खान अब्दुल गफ्फार खान बहुत खुश हुए थे और बोले, ‘बच्चा तुमने क्यों तकलीफ की, किसी कारकून को भेज देतीं’. इंदिरा गांधी मुस्कुराई और बोलीं, ‘यह सुख और सम्मान मैं किसी और को नहीं दे सकती थी.’ खान अब्दुल गफ्फार खान के पास एक पोटली थी. जब उसे इंदिरा गांधी ने लेने के लिए हाथ आगे बढ़ाया तो खान साहब ने उस  पोटली को सीने से लगाते हुए कहा कि ‘अब यही तो मेरे पास बची है इसे मैं किसी को नहीं देता.’ ये सारी बातचीत खुद खान अब्दुल गफ्फार ने मुझे बताई थीं जब मैं 26 मार्च, 1980 को एम्स में उनसे मिला था. उन्होंने बताया था कि स्वाधीनता संग्राम के दौर के उनके साथी अब नहीं के बराबर रह गये थे लेकिन विरासतों की तादाद अच्छी खासी थी ।अपनी ऊंची कद काठी और गोरे रंग के कारण आज भी वह आकर्षण का केंद्र थे । मैं मिला तो उनसे पहले भी एक बार था मोहम्मद यूनुस के निवास पर लेकिन वह एक औपचारिक भेंट थी । उनसे दूर वाली मेरी मुलाकात तो मार्च-अप्रैल, 1947 में भी रावलपिंडी में हो चुकी थी जब वह महात्मा गांधी के साथ लालकुर्ती की एक सार्वजनिक सभा में आये थे । यह सभा हमारे घर तोपखाना बाज़ार से ज़्यादा दूर नहीं थी जहां मैं अपने चाचा श्री परमानंद जी के साथ गांधी जी को देखने और सुनने के लिए गया था । लालकुर्ती में चाचा जी का ससुराल भी था । वैसे ‘लालकुरती’ गफ्फार खान के खुदाई खिदमतगार यानी ‘मानव-मात्र की सेवा की भावना ‘ पैदा करने वाले कार्यकर्ताओं की पोशाक भी है । 14-15 अगस्त,1947 को विधिवत विभाजन से पहले मार्च, 1947 में पेशावर से लाहौर तक हिंदू मुसलमानों के बीच फसाद हो चुके थे जिसके फलस्वरूप हम लोग दो  सप्ताह तक सेना की देखरेख में रावलपिंडी के करीब शिविरों में बिता आये थे ।लोगों को शांत करने की गर्ज से गांधी जी तब रावलपिंडी आये थे । उस समय पहली और आखिरी बार मैंने गांधी जी को देखा था जिनके साथ मुझे ‘सरहदी गांधी’  यानी अब्दुल गफ्फार खान भी दीखे थे । उस समय मेरी उम्र बारह बरस के करीब थी।

गफ्फार खान को पख्तून  उन्हें आदरपूर्वक कई नामों से संबोधित करते हैं: जैसे ‘बाचाखान’,  ‘सीमांत गांधी ‘, ‘ बादशाह खान ‘आदि ।दिल्ली में वह अपने सम्मान में आयोजित कांग्रेस के अत्यधिक कार्यक्रमों से इतने थक गये थे कि उन्हें कुछ दिनों के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भरती कराना पड़ा ।हालांकि वहां सुरक्षा प्रबंध खासे कड़े थे लेकिन मैंने उनसे अकेले मिलने का प्रबंध कर ही लिया ।

मुझे खान अब्दुल गफ्फार खान बड़े प्यार से मिले ।जब मैंने उन्हें बताया कि हम लोग रावलपिंडी से आये हैं तो वह कुछ भावुक होकर आशीर्वाद वाले दोनों हाथ ऊपर उठा कर बोले,’ठीक हैं न आप सब लोग ।मुझे लगता है मैंने पहले भी कहीं आपको देखा है शायद मोहम्मद यूनुस के घर ।वह मेरा भतीजा है ।’ क्या याददाश्त थी खान अब्दुल गफ्फार खान की । उनका आशीर्वाद मिलने के बाद हम लोगों ने खुल कर बातें करनी शुरू कर दीं ।उनकी देखभाल के लिए उनके कमरे में एक नर्स और एक और व्यक्ति मौजूद था ।उन दोनों को भी कुछ समय के लिए खान साहब ने यह कह कर कमरे के बाहर भेज दिया कि ‘यह मेरा गिराईं (गांव का) है ‘ इससे मुझे कोई खतरा नहीं । जब मैंने उनसे पूछा कि कैसी लगी मौजूदा कांग्रेस पार्टी और उसके नेता?तो वह हल्का-सा मुस्कुराए और बोले ‘वक़्त के साथ काफी कुछ बदल जाता है ।कांग्रेस प्रमुख और वज़ीरेआज़म इंदिरा गांधी नेक इंसान है ।पंडित जवाहरलाल नेहरू का वह बेटी है और इस लिहाज़ से वह मेरी बेटी भी हुई. इंदिरा गांधी का बेटा राजीव गांधी भी मुझ से मिलने के लिए आया था । नफासत तो उन्हें घुट्टी में पिलायी जाती है ।मुझे बहुत इज़्ज़त बख्शी । अपने नाना और माँ की बातें भी करता रहा और अपने मुल्क की भी ।जवाहरलाल तो मेरे भाई जैसे थे ।एक बार हम दोनों के बीच गलतफहमी ज़रूर पैदा हो गई थी जिसे हम दोनों ने मिल बैठकर जल्दी ही सुलटा लिया था ।बाद में तो हमारा बहुत करीबी रिश्ता हो गया और कांग्रेस पार्टी के हर सम्मेलन में हम दोनों की राय शायद ही कभी मुख्तलिफ रही हो । और कई पुराने नेता भी मिले ।स्वतंत्रता संग्राम के वक़्त कुछ तो छोटे थे तो कुछ नन्हे बच्चे ।मार्च,1947 में जब आपने मुझे देखा होगा तब से हम दोनों की शक्ल-सूरत में खासा बदलाव आया होगा ।’ जब मैंने कहा कि आप तो मुझे बिल्कुल वैसे ही लगते हैं तो वह हंसकर बोले,’नहीं अज़ीज़ ।बहुत सितम झेले हैं ।’

‘और गांधी जी के साथ आपके कैसे संबंध थे ?”अब बादशाह खान कुछ गमगीन हो गये ।ऐसा लगा मानो उन्हें कुछ करीबी लहमो की याद हो आयी हो ।’कहां से शुरू करूं और क्य क्या बताऊं ।’उनका गला रुंध गया था ।’दो लफ्ज़ में मैं इस तरह बयान कर सकता हूं कि मुझे सरहदी पेशावर के कबीलों की नेतागिरी से निकाल कर कांग्रेस में शामिल करने से लेकर हिन्दुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने की शुरुआत उन्होंने ही की थी ।’ 5 मार्च, 1931 के गांधी-इरविन समझौते में यह दर्ज है कि हिंसा के आरोपियों को छोड़ कर बाकी सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया जाएगा।मतलब यह कि अगर किसी केस में हम दोनों को गिरफ्तार किया जाता है तो रिहाई भी साथ साथ होगी ।एक बार ऐसा नहीं भी हुआ था ।लेकिन गांधी जी ने तुरंत लॉर्ड इरविन से कहा कि या तो गफ्फार खान को रिहा करो अथवा मुझे भी गिरफ्तार करो ।और मुझे फौरन रिहा कर दिया गया था ।बहुत प्रेम करते थे गांधी जी मुझसे । चाहे बारदोली दंगों की जांच करने के लिए जाना हो या रावलपिंडी अथवा पेशावर या लाहौर वह अक्सर मुझे साथ रखते थे।उन्हीं की वजह से सीमांत के हम लोग कांग्रेस के साथ जुड़े थे ।शर्त सिर्फ एक ही थी स्वाधीनता संग्राम में उनका साथ देना ।उनकी लड़ाई भी ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ थी और हम सरहद के लोग अंग्रजों के ज़ुल्मों से आजिज़ आ चुके थे । 1901 में जब अंग्रजों ने सीमा प्रांत को पंजाब से अलग कर फ़्रंटियर क्राइम्स रेगुलेशन एक्ट लागू कर दिया तो उससे पठानों के सम्मान, गरिमा और आत्मविश्वास को बहुत ठेस पहुंची और हम लोगों पर बेइन्तहा ज़ुल्म होने लगे तो डूबते को सहारा कांग्रेस और गांधी जी ने दिया ।

यह पूछे जाने पर कि कांग्रेस के दूसरे नेताओं का उनके प्रति क्या रुख था तो बादशाह खान ने बताया कि सभी नेताओं ने सरहद के हम पश्तूनों का दिलखोल स्वागत किया चाहे पंडित नेहरू रहे हों या वल्लभभाई पटेल,अबुल कलाम आज़ाद या डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अथवा सुभाषचंद्र बोस देश के स्वाधीनता संग्राम में हमारी सक्रिय भूमिका के कौल का इस्तकबाल किया ।उन्हें यह भी पता चल गया कि हमारे खुदाई खिदमतगार अहिंसा में यकीन रखते हैं और गांधी जी के भारत की आज़ादी के अहिंसक आन्दोलन में उनका महत्वपूर्ण रोल हो सकता है, तो सभी नेताओं ने हमें गले लगाया ।बेशक़ हमारे कांग्रेस में शामिल होने से अंग्रजों की भवें तन गयी थीं, क्योंकि अब खुदाई खिदमतगार का Trilok Deepदायरा सीमा प्रांत से बढ़ कर पूरा भारत जो हो गया था ।हमारा यह सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलन पूरी तरह से अनुशासित और अहिंसक था जो सत्य पर आधारित था और उसका मकसद बेकसूर लोगों के आत्मसम्मान की रक्षा करना था ।खुदाई खिदमतगार को उसके लाल रंग की शर्ट से पहचाना जा सकता था जिसे कुछ लोग ‘लाल कुरती’ कहते तो कुछ ‘सुर्खपोश’।  ——त्रिलोक दीप                                                       ………. ….. …..….(अगले अंक में जारी)

*(pic credit-alamy.com and  cartoondealer.com)

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