राजा महेंद्र प्रताप जिन्होंने निर्वासित भारत सरकार के राष्ट्रपति के तौर पर काबुल में तिरंगा फहराया - News On Radar India

राजा महेंद्र प्रताप जिन्होंने निर्वासित भारत सरकार के राष्ट्रपति के तौर पर काबुल में तिरंगा फहराया

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग 3)

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               अपनी एक कनाडा  यात्रा के दौरान मैंने पाया कि कामागाटामारू आज भी वहां प्रासंगिक है । गया तो मैं वहां के हाउस ऑफ़ कामंस का चुनाव कवर करने के लिए था लेकिन मेरी चाहत कामागाटामारू के बारे में जानने की भी थी ।मैंने टोरांटो में जब कुछ पंजाबियों से इस बाबत पूछा तो उनका उत्तर था कि असली तस्वीर आपको वैंकूवर जाने पर ही मिल सकती है ।वहां तो आपको जगह जगह कामागाटामारू के बारे में कुछ जानने और देखने को मिल जाएगा ।टोरांटो से अमेरिका में जाने और उसके बाद स्वदेश लौटने तक मुझे कामागाटामारू के बारे में समाचार मिलते रहे । जब से प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर और जस्टिन त्रूदो ने कामागाटा मारू घटना के लिए हाउस ऑफ़ कामंस में माफी मांगी है तबसे कनाडा के पूर्व शासकों के रवैये को ‘क्रूर हृदय और संवेदनहीनता’ का प्रतीक बताया जाता है ।अब कामागाटा मारू घटना संबंधित विभिन्न तिथियों को याद करते हुए वहां कई प्रकार के समारोह आयोजित हो रहे हैं ।उसके प्रस्थान की 75वीं वर्षगांठ पर 23 जुलाई, 1989 में वैंकूवर के गुरुद्वारे में उसके स्मरण और कीर्ति की याद में वहां एक सम्मान फलक रखा गया है । इसी प्रकार का फलक 1099 वेस्ट हेस्टिंग्स स्ट्रीट में पोर्टल पार्क में भी है ।1994 में कामागाटामारू की 80वीं सालगिरह पर वैंकूवर हार्बर में रखे गये एक फलक को याद किया जाता है ।खालसा दीवान सोसाइटी वैंकूवर द्वारा रास स्ट्रीट गुरुद्वारे में ग्रहालय स्थापित किया गया । एक स्मारक भी बना 23 जुलाई 2012 को ।कामागाटामारू के आगमन की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में  मई 01, 2014 को कनाडा पोस्ट द्वारा एक डाक टिकट भी जारी किया गया । इतना ही नहीं ब्रिटिश कोलंबिया की सरे नगर परिषद ने 31 जुलाई, 2019 को 75ए एवेन्यू के हिस्से का नाम बदल कर कामागाटामारू रख दिया । वैंकूवर शहर और वहां के लोग कामागाटामारू से बिल्कुल अनजान नहीं हैं ।वहां आपको विभिन्न स्थानों पर उसका उल्लेख मिल जायेगा ।दूसरे वहां पर संग्रहालय स्थापित हो जाने से जो लोग और वर्तमान पीढ़ी और आने वाली अगली पीढियां कामागाटामारू के अस्तित्व से अनजान हैं उन्हें यह पता चल जायेगा किअपने देश की आज़ादी के लिए देशभक्त किस हद तक जा सकते हैं।

अब कामागाटामारू के यात्रियों के वंशजों ने उसकी विरासत को स्मरण दिलाने के लिए काम किया है । कामागाटामारू की याद में एक नागरिक संपति भी है और किंग जार्ज पार्क में दो स्मारक चिन्ह भी हैं । ब्रिटिश कोलंबिया ने कामागाटामारू स्मरण दिवस के रूप में मान्यता दी ।न्यू वेस्टमिंस्टर और विक्टोरिया शहरों को कामागाटामारू दिवस के रूप में घोषित किया गया जबकि वैंकूवर शहर ने इस दिन को कामागाटामारू स्मरण दिवस के तौर पर मनाया । कनाडा में गदरी बाबेयां दा मेला (गदर पार्टी का त्योहार) मनाया जाता है ।ऐसे ही एक मेले में 6 अगस्त 2006 में प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने कहा कि कनाडा सरकार ने कामागाटामारू घटना को स्वीकार किया है और कनाडा के इतिहास में इस दुखद क्षण को सर्वोत्तम तरीके से पहचानने के लिए इंडो-कनाडाई समुदाय के साथ परामर्श करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता की घोषणा की ।3 अगस्त, 2008 को हार्पर बाबेयां दा मेला में कामागाटामारू घटना के लिए माफी मांगने के लिए उपस्थित हुए ।उन्होंने हाउस ऑफ़ कामंस में आये एक प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा कि ‘कनाडा सरकार की ओर से मैं प्रधानमंत्री के रूप में आधिकारिक तौर पर माफी मांग रहा हूं । समुदाय के सदस्य इससे संतुष्ट नहीं हुए।

प्रधानमंत्री हार्पर से पहले 23 मई, 2008 को ब्रिटिश कोलंबिया की विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया कि यह विधानमंडल 23 मई,1914 की घटनाओं के लिए माफी मांगता है,जब वैंकूवर बन्दरगाह के पास खड़े कामागाटामारू के 376 यात्रियों को कनाडा द्वारा प्रवेश से वंचित कर दिया गया था ।सदन को इस बात का गहरा अफसोस है कि हमारे देश और हमारे प्रांत में शरण लेने वाले यात्रियों को निष्पक्ष व्यवहार का लाभ दिए बिना वापस कर दिया गया,जो एक ऐसे समाज के लिए उपयुक्त नहीं है जहां सभी संस्कृतियों के न केवल स्वागत किया जाता है बल्कि उन्हें स्वीकार भी किया जाता है ।इसके बाद सरकार से माफी मांगने की मांग की गयी ,वह भी प्रधानमंत्री द्वारा हाउस ऑफ़ कामंस (निम्न सदन) में । मांग करने वालों में कामागाटामारू के कुछ यात्रियों के सगे संबंधी और करीबी रिश्तेदार थे। प्रधानमंत्री हार्पर ने जब एक सार्वजनिक सभा में कामागाटामारू को वैंकूवर में प्रवेश न देने के लिए माफी मांगी तो इसे यह कहकर ख़ारिज कर दिया गया कि भला कोई चुनावी सभाओं में इस तरह की माफी मांगता है ।लेकिन लिबरल पार्टी के नेता जस्टिन त्रूदो जब देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने हाउस ऑफ़ कामंस में माफी माँगकर कामागाटामारू के यात्रियों के सगे संबंधियों से किए गये अपने वादे को पूरा किया ।पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो ने अपने पूर्वर्तियों की गलती के लिए माफी मांग कर यह सिद्ध कर दिया कि अपने पूर्वजों की गलतियों को स्वीकारते हुए उसके लिए क्षमायाचना करने से कोई छोटा नहीं हो जाता ।

तीन-चार बरस पहले प्रधानमंत्री के तौर पर जस्टिन त्रूदो जब भारत आये थे तो उन्होंने पूरा एक दिन स्वर्ण मंदिर में सेवा की थी ।उन्होंने दरबार साहब में सपरिवार बैठकर न केवल कीर्तन सुना बल्कि लंगर में हर किस्म की सेवा की ।लंगर बांटा, रोटियां बेलीं,बर्तन धोये,जोड़ा घर में जूतों पर पॉलिश की, जल सेवा की आदि ।उस समय वह कनाडा के प्रधानमंत्री थे ।इसी प्रकार जर्मनी के नेताओं ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जिन जिन देशों पर ज़ुल्म ढाये थे चांसलर (प्रधानमंत्री) विली ब्रांट ने उन देशों में जाकर अपने पूर्ववर्तियों के कृत्यों के लिए माफी मांगी थी । वह पोलैंड के आश्विच विशेष तौर पर गये जहां गैस चैंबरों में स्त्री,पुरुषों और छोटे-छोटे बच्चों को ठूंस कर मारा गया था ।1977 में अपने पोलैंड दौरे के दौरान मैं एक गैस चैंबर में रखे मृतकों के कपड़े और बच्चों के खिलौने देखकर यह सोच कर भीतर तक हिल गया था कि कैसे कोई इंसान इतना हृदयहीन और संवेदनहीन हो सकता है । लेकिन यह हक़ीक़त थी और यहां भी विली ब्रांट ने आकर घुटने टेक कर माफी मांगी थी ।

लेकिन अमृतसर में जलियाँवाला बाग में जो नरसंहार हुआ था उसके लिए ब्रिटेन की सरकारों में से प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने क्षमायाचना नहीं की बल्कि ‘गहरा शोक’ व्यक्त किया ।हालांकि महरानी एलिज़ाबेथ अमृतसर में जलियांवाला बाग़ गयी थीं उन्होंने भी इसे एक ‘दर्दनाक हादसा’ ही बताया, माफी नहीं मांगी । ब्रितानी हाउस ऑफ़ कामंस के कुछ सांसद समय समय पर सरकार से सदन में माफी मांगने की मांग करते रहे हैं लेकिन वह “गहरे खेद’ से आगे नहीं बढ़ी ।तर्क यह दिया जाता है कि अगर सरकार माफी मांगती है तो उसे जलियांवाला बाग में मारे गये व्यक्तियों के सगे-संबंधियों को मुआवजा देना पड़ेगा। इतना ही नहीं जिन जिन देशों में ऐसी घटनाएं हुई होंगी जहां ब्रितानी शासन था उन सभी देशों के पीड़ितों को मुआवजा देना होगा ।कुछ समय पहले केन्या के उन दो जीवित व्यक्तियों को कोर्ट के आदेश पर ब्रितानी सरकार को मुआवजा देना पड़ा जिन पर उनके सत्ता में रहते हुए जुल्म हुए थे ।

जब मैंने राजा महेंद्र प्रताप से पूछा कि आपने दुनिया भर के आप्रवासी भारतीयों की भारत के स्वाधीनता संग्राम में अपने अपने योगदान के बारे तो बता दिया क्या आप सुभाषचंद्र बोस के प्रयासों पर भी रोशनी डालेंगे ।उन दिनों भी आप विदेश में ही थे ।राजा महेंद्र प्रताप मुस्कराये और बोले आपने भी काफी तैयारी कर रखी है । जी हां,सुभाष बाबू ने भी अपनी मुहिम जर्मनी से शुरू की थी । बताया जाता है कि कांग्रेस से निकाले जाने पर उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक नामक जो पार्टी बनायी थी उसने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोही तेवर दिखाये जिसके चलते उन्हें घर में नजरबंद कर बाहर पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया था लेकिन सुभाष चंद्र बोस 16 जनवरी, 1941 को पुलिस को चकमा देते हुए एक पठान मोहमद ज़ियाउद्दीन के वेष में अपने घर से निकले और कोलकाता से दूर धनबाद के ज़िले गोमोह पहुंचे और वहां के रेलवे स्टेशन से फ़्रंटियर मेल पकड़ कर पेशावर पहुंच गये। वहां से फॉरवर्ड ब्लॉक के अपने एक साथी के साथ वह काबुल में प्रवेश कर गये ।यहां पर दो महीने रहकर उन्होंने अपनी अगली योजनाओं पर काम शुरू कर दिया।यहां पर पहले उनसे मेरी मुलाकात हुई थी ।उनका तब लक्ष्य था रूस जाने का ।वहां जब उनका काम नहीं बना तो वह जर्मनी गये ।इस बाबत मैंने अपने अनुभव के आधार पर उन्हें बताया था कि रूस में मैं लेनिन और जर्मनी में उस समय के सम्राट कैसर से मिला था ।उसके बाद मैंने जापानी नेतृत्व से सहायता मांगी लेकिन वह तो दिसंबर,1941 को हवाई द्वीप के पर्ल हार्बर स्थित अमेरिका के नौसैनिक अड्डे पर अचानक सैन्य हमला करके सातवें आसमान पर था ।वह इतना महत्वकांक्षी हो गया कि वह अपने आप को एक शक्ति के तौर पर देखने लग गया था ।इसका परिणाम यह हुआ कि जो अमेरिका अभी तक द्वितीय विTrilok Deepश्वयुद्ध में तटस्थ था जापान के हमले के बाद वह मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हो गया ।इस तरह अब जापान भी किसी न किसी रूप में विश्वयुद्ध से जुड़ गया था ।मैंने अपने अनुभवों तईं सुभाष बाबू को फीडबैक दे दिया था ।मुझे पता चला कि रूस में उनकी बात नहीं बनी ; जर्मनी में सुभाषचंद्र बोस फासी नेताओं से और हिटलर से भी मिले थे लेकिन उस समय जर्मनो की दिक्कत यह थी कि वह दूसरे विश्वयुद्ध में बुरी तरह से फंसे हुए थे ।इसलिए उनके पास सुभाषबाबू को मदद देने का समय नहीं था हालांकि वह अंग्रेज़ों से नफरत करते थे ।    —-त्रिलोक दीप .                                           ….. (अगले अंक में जारी)

*(pic credit-aaww.org; rarehistoricalphotos.com and ici.radio-canada.ca)

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