राजा महेंद्र प्रताप जिन्होंने काबुल में निर्वासित भारत सरकार के राष्ट्रपति के तौर पर तिरंगा फहराया
वे हाथरस के पास मुसरॉन रियासत के नामित राजा, स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें 1932 में नोबेल प्राइज के लिए भी नामित किया गया था
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-1)
जून, 1956 से 31 दिसंबर, 1965 तक मैंने लोकसभा सचिवालय में काम किया तकरीबन दस बरस.
यानी पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा. पहली और तीसरी में कम लेकिन दूसरी लोकसभा में उसके पूरे कार्यकाल तक. मैं लेजिस्लेटिव ब्रांच में काम करता था. सत्र के दिनों में इस नाते सदन में आना जाना और मंत्रियों से मिलना जुलना लगा रहता था. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बीसियों बार देखा, अभिवादन हुआ और बातचीत भी. ज़रूरत पड़ने पर और भी मंत्रियों से मेलमुलाक़ात हो जाती बिना किसी दिक्कत के. पंडित नेहरू राज्यसभा जाने के लिए आम तौर पर केंद्रीय कक्ष अर्थात सेंट्रल हॉल से होकर जाते थे. जिन सांसदों, या पत्रकारों को भी, पंडित जी से संक्षिप्त मुलाकात करनी होती उनके लिए सेंट्रल हॉल मौजूँ रहता. कुछ लोग पंडित की इस आदत से परिचित थे और उन्हें यह भी जानकारी रहती थी कि राज्यसभा में किस दिन उनके मंत्रालय का प्रश्न लगा है. पंडित जी ने विदेश मंत्रालय अपने पास रखा हुआ था लिहाज़ा वह सांसदों के प्रश्नों का उत्तर स्वयं दिया करते थे. यह ऐसा मौका होता कि सांसद उन्हें ‘पकड़,’ सकते थे.ऐसे लोग पंडित जी से मिलने का कोई मौका नहीं गंवाते थे ।
सोफे के बीच धंसकर बैठे होशियारपुर के छोटे कद के प्रोफेसर दीवान चंद शर्मा पंडित नेहरू को लोकसभा के सदन से आता देखकर सोफे
से उछल कर उठते और बोलते पंडित जी पंडित जी ।पंडित नेहरू रुक जाते और कहते कहिये प्रोफेसर साहब, क्या बात है । बिना किसी भूमिका के प्रो. शर्मा तपाक से बोलते कि हम पंजाब के मुख्यमंत्री प्रतापसिंह कैरो से तंग आ गये हैं, वह हमारा कोई भी काम नहीं करते, हम भला अपने हलके में मतदाताओं को क्या मुंह दिखाएंगे। पंडित जी उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें आश्वस्त करते कि आप हमारे सदन की शान हैं,रूह हैं,आप के काम भला कौन रोक सकता है मैं आज ही कैरों जी से बात करता है. भविष्य में आपका काम होगा. यह मेरा वादा है. आगे बढ़ते तो भक्त दर्शन भी हाथ जोड़े खड़े मिल जाते और उत्तराखंड के मसलों की चर्चा करते ।अभी वह राज्यसभा की तरफ जाने वाली चार पांच सीढ़ियों को पार करने को ही होते कि कहीं से आवाज़ आती “पंडित जी- पंडित जी”।
नेहरू जी मुड़ कर देखते तो सांसद उपाध्याय जी कुछ महिलाओं और लड़कियों के साथ खड़े होते ।कहते ये लोग आपके दर्शन करना चाहती हैं. पंडित जी उन महिलाओं को हाथ जोड़ नमस्कार कर आगे बढ़ जाया करते थे.
एक दिन राजयसभा की तरफ जाते हुए उनकी नज़र राजा महेंद्र प्रताप जी पर पड़ गयी। पंडित जी ने स्वयं उनके पास जाकर अभिवादन किया और हालचाल पूछा। राजा महेंद्र प्रताप स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार,पत्रकार, क्रांतिकारी,लेखक,महान दानवीर और समाज सुधारक होने के अलावा अफगानिस्तान में भारत की अंतरिम सरकार के अध्यक्ष थे । उन्होंने 1915 में काबुल में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान निर्वासित भारतीय सरकार के रूप में काम किया और वहां पर तिरंगा झंडा फहराया जो कि उन दिनों बड़ा जोखिम भरा काम था । इससे ब्रिटिश सरकार में हड़कंप मच गया था ।लेकिन राजा महेंद्र प्रताप की हिम्मत की दाद उस समय स्वधीनता संग्राम से जुड़े सभी वर्गों ने दी थी । पंडित नेहरू एक तो उनके इस साहसिक कार्य के मुरीद थे और दूसरे वह राजा महेंद्र प्रताप से आयु मे भी तीन साल छोटे थे। राजा महेंद्र प्रताप दिसंबर 01,1886 जन्मा थे.जबकि पंडित नेहरू नवंबर 14,1889.
भारत के स्वधीनता संग्राम में बहुत लोग सक्रिय रहे हैं देश और विदेश; दोनों स्थानों पर– भारत में जहां महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका थी तो वहां सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव,बटुकेश्वर दत्त,चंद्रशेखर आजाद, यशपाल, सच्चिदनंद वात्स्यायन, बिमलप्रसाद जैन आदि जैसे क्रान्तिकारियों की अपनी जुदा महत्वपूर्ण भूमिका । मकसद सभी का समान था: हिंदुस्तान की आज़ादी । बताया जाता है कि अंग्रेज़ी हुकूमत में दहशत पैदा करने के लिए भगत सिंह ने असेंबली में जो बम फेंका था वह सच्चिदनंद वात्स्यायन का बनाया हुआ था जो क्रांतिकारियों में ‘साईंटिस्ट’ के नाम से मशहूर थे। बम फेंकने की यह खबर चंद्रशेखर आजाद और बिमल प्रसाद जैन ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में दी और वहां से तुरंत भाग खड़े हए थे ताकि पुलिस उन्हें देख न ले।
राजा महेंद्र प्रताप 1957-62 में लोकसभा सदस्य रहे । उन्होंने मथुरा से निर्दल उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था। उन्होंने कांग्रेस के चौधरी दिगंबर सिंह और जनसंघ (बाद में भारतीय जनता पार्टी) के अटलबिहारी वाजपेयी को पराजित किया। मैं पहली लोकसभा में सचिवालय की नौकरी में आ गया था ।दूसरी लोकसभा (1957-62) पूरी और तीसरी लोकसभा (1962-67) में 1965 तक रहा। वहां पर काम करते हुए मैंने महसूस किया था कि इस दौर में अधिसंख्य सदस्यों का जुड़ाव स्वधीनता संग्राम से किसी न किसी तरह था । उस समय ऐसे भी सांसद थे जो अपने बारे में कम ही बातचीत किया करते थे ।बावजूद इसके राजा महेंद्र प्रताप के बारे में कुछ लोग इतना भर जानते थे कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में रहते हुए भारत की निर्वासित सरकार के ‘राष्ट्रपति’ के तौर पर काबुल में तिरंगा झंडा फहराया था ।क्योंकि पंडित
नेहरू,जो स्वयं स्वाधीनता सेनानी थे, राजा महेंद्र प्रताप की वैश्विक भूमिका से परिचित थे, इसलिए उन्होंने राजा महेंद्र प्रताप के साथ बहुत वक्त गुजारा । भक्त दर्शन, प्रो दीवान चंद शर्मा और उपाध्याय जी दूर खड़े इन दो नेताओं की भाव भंगिमाएं देख पा रहे थे और अगर सब कुछ कोई देख-सुन रहे थे वह थे उनके निजी सचिव यशपाल कपूर, जिनकी उस समय पंडित नेहरू के साथ ड्यूटी थी ।
लोकसभा सचिवालय में काम करते हुए मैंने भी राजा महेंद्र प्रताप के बारे में पढ़ रखा था, जिन्हें देश का ‘गुमनाम नायक’ कहा जाता है तो कुछ लोगों के लिए वह ‘आर्यन पेशवा’ थे । मेरी उनसे टुकड़ों-टुकड़ों में कई मुलाकातें हुई थीं लेकिन मैं तसल्ली से बैठकर उनसे बात करना चाहता था ।एक दिन लोकसभा सचिवालय में ही मुझे ऐसा अवसर मिल गया जब उन्होंने न केवल मुझे स्वाधीनता संग्राम में अपनी भूमिका के बारे में ही बताया बल्कि उन तमाम जत्थेबंदियों का ज़िक्र भी किया जो विदेशों में रहते हुए भारत की आजादी की लड़ाई लड़ रही थीं। वह 32 वर्ष तक कई देशों में रहते हुए अपने इस अभियान को चलाते रहे और 9 अगस्त 1946 को भारत लौटे । वह बहुत ही विनम्र और दूरदर्शी थे और कहते थे कि, “स्वधीनता संग्राम के इस यज्ञ में कई जत्थेदारियों ने अपनी अपनी आहुति दी है, मुझसे भी जो बन पड़ा मैंने किया ।”
उन्होंने स्वधीनता संग्राम में कूदने का फैसला 1906 में कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने से किया तब उनकी स्वदेशी आंदोलन में शामिल कई नेताओं से बातें और मुलाकातें हुईं जिसके फलस्वरूप उन्होंने स्थानीय कारीगरों के साथ छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने का निर्णय लिया । राजा महेंद्र प्रताप ने मुझे बताया था , “न जाने मुझे एक दिन क्या सूझा कि मैंने सोचा कि हमें विदेशों में जाकर भी अपने स्वधीनता आंदोलन के बारे में ब्रिटेन विरोधी शक्तियों की मदद से अपनी मुहिम को आगे बढ़ाना चाहिए | लिहाजा जनवरी, 1915 में मैं स्विट्ज़रलैंड पहुंच गया ।वहां मेरी मुलाकात वीरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय से हुई जिनकी पहुंच जर्मन नेताओं तक थी । मैंने तत्कालीन जर्मन सम्राट कैसर विल्हेम द्वितीय से मिलने की इच्छा जताई जिसकी व्यवस्था कर दी गयी । सम्राट कैसर से मुलाकात में ऐसी रणनीति बनी जिसके अनुसार उनका सुझाव था कि अगर भारत पर अफ़ग़ान सीमा की तरफ से हमला किया जाये तो कैसा रहेगा । विचार अच्छा था । पूर्व में भी तैमूर लंग,बाबर तथा अन्य विदेशी आततायियों के इसी रास्ते से हिंदुस्तान पर हमले होते रहे हैं । इस रणनीति को अंजाम देने से पहले मुझे पोलिश सीमा के पास एक सैन्य शिविर में सेना की नीतियों और उसकी कार्यप्रणाली को समझने के लिए प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजा गया।अप्रैल,1915 को एक जर्मन राजनयिक, मौलवी बरकतुल्लह और कुछ अन्य सदस्यों के साथ एक प्रतिनिधिमंडल के तौर पर हमने
सम्राट कैसर से भेंट की । वहां पर तुर्की के सुल्तान मोहम्मद रिशाद भी उपस्थित थे । उन दोनों ने अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह हबीबुल्लाह के नाम एक पत्र दिया जिसे लेकर हम बरास्ता मिस्र के खेडिव और तुर्की के सुल्तान के दामाद और रक्षामंत्री अनवर पाशा से मिले. उन्होंने ने हमारा मार्गदर्शन करने के लिए अपने एक विश्वसनीय सैन्य अधिकारी के नेतृत्व में दो हज़ार सैनिकों की एक टुकड़ी दी जिस के साथ हम लोग काबुल पहुंचे. वहां हमारे प्रतिनिधिमंडल का गर्मजोशी के साथ स्वागत हुआ और अगली रणनीति पर चर्चाएं हुईं, क्योंकि सभी लोग ब्रितानी उपनिवेशवाद के विरुद्ध थे|” .. त्रिलोक दीप … ….. …..….(अगले अंक में जारी)
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