राजा महेंद्र प्रताप जिन्होंने काबुल में निर्वासित भारत सरकार के राष्ट्रपति के तौर पर तिरंगा फहराया - News On Radar India

राजा महेंद्र प्रताप जिन्होंने काबुल में निर्वासित भारत सरकार के राष्ट्रपति के तौर पर तिरंगा फहराया

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 अफगानिस्तान  पहुंचकर राजा महेंद्र प्रताप ने काबुल में आज़ाद हिंदुस्तान की पहली निर्वासित सरकार का गठन किया जिसमें महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति,मौलवी बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री और मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को गृहमंत्री बनाया गया. हम सबने अंग्रेज़ों के खिलाफ जेहाद का ऐलान कर दिया ।ब्रिटिश विरोधी शक्तियों ने तो हमारे इस आंदोलन का समर्थन किया लेकिन अफसोस भारत की देसी रियासतों ने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने में हमारा साथ नहीं दिया ।उधर 1918 में कैसर विल्हेम द्वितीय के त्यागपत्र देने से हमारी मुहिम में देरी ज़रूरी हुई लेकिन भारत से अंग्रेज़ों के खिलाफ हमारा जुनून खत्म नहीं हुआ । अफ़ग़ानिस्तान में अब कई सालों से रह रहा था तथा वहां के बादशाह मेरी कई सेवाएं लिया करता ।वह अपने दूत के तौर पर मुझे दूसरे देशों को भेजते थे । कुछ लोग मुझे ‘विश्व महासंघ के प्ररेणता तो कुछ अफ़ग़ानिस्तान का अनौपचारिक दूत कहकर भी संबोधित किया करते थे’।1917 में मैं रूस गया और  लेनिनग्राद में ट्राटस्की से मिला ।वहां से कैसर और तुर्की के सुल्तान का संदेश देने के लिए एक जर्मन जहाज के ज़रिये रूस आया और लेनिन से मेरी मुलाकात हुई।उनसे भी मैंने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में मदद करने की गुहार लगाई ।उन्हें मैंने बताया कि इस समय मैं बेशक अफ़ग़ानिस्तान का अनौपचारिक दूत हूं लेकिन एक भारतीय स्वाधीनता सेनानी होने के नाते मैं सभी ब्रिटिश विरोधी शक्तियों से मदद मांग रहा हूं ।लेनिन ने मेरी बातें ध्यान से सुनीं और कुछ ‘करने’ का आश्वासन दिया ।

लेनिन से मुलाकात के बाद मैं अफ़ग़ानिस्तान लौट आया ।यहां आकर पता चला कि हबीबुल्लाह के स्थान  पर अमानुल्लाह नये बादशाह बन गये हैं ।उनकी सोच हबीबुलल्लाह से अलग थी । अमानुल्लाह ने तो चीन,तिब्बत, जर्मनी,तुर्की,अमेरिका आदि से समझौते कर लिए थे ।पहले जर्मनी में सम्राट कैसर सत्ता से अलग हो गये थे और अब हबीबुल्लाह भी ।मैं अफ़ग़ानिस्तान में ही बना रहा और बादशाह अमानुल्लाह मुझे ‘अफगानिस्तान के एक अनौपचारिक आर्थिक मिशन ‘के मुखिया के तौर पर देखते थे ।लेकिन मेरे ज़ेहन में भारतीय स्वधीनता संग्राम सर्वोपरि रहा । मेरा मुख्यालय काबुल में था जहां मैंने भारत की अंतरिम सरकार गठित की थी ।अमानुल्लाह की मुझ में हबीबुल्लाह जैसी रुचि तो नहीं थी लेकिन वह मेरी उपेक्षा भी नहीं करते थे ।मैं अमेरिका गया और वाशिंगटन डीसी में एक अफ़ग़ानिस्तान सूचना ब्यूरो और विश्व महासंघ का कार्यालय स्थापित किया । अमेरिका में रहते हुए ही मुझे पता चला कि यहां के प्रवासी भारतीयों ने ब्रिटिश शासन उखाड़ फेंकने के लिए गदर आंदोलन करने का निर्णय लिया है जिसे गदर पार्टी का नाम दिया गया है ।
गदर पार्टी के कई संस्थापक नेताओं में प्रमुख सोहन सिंह भकना थे ।शुरूआती आन्दोलन उन क्रांतिकारियों के लिए बनाया गया था जो अमेरिका और कनाडा के पश्चिमी तट पर रहते थे लेकिन बाद में यह आंदोलन दुनिया भर में रहने वाले भारतीय प्रवासी समुदाय में फैल गया ।इसकी स्थापना 15 जुलाई,1913 की मानी जाती है । इसमें हिंदुस्तानी श्रमिकों के रूप में जाने जाने वाले आप्रवासियों का एक समूह था ।अमेरिका के ओरेगन राज्य के एस्टोरिया नगर में हरदयाल, संत बाबा वसाखा सिंह,सोहन सिंह भकना,बाबा संतोख सिंह,बाबा ज्वाला सिंह की बैठक हुई जिसमें सैन फ्रांसिस्को के युगांतर आश्रम में मुख्यालय बनाने का निर्णय लिया गया ।इसमें अध्यक्ष और सभी पदाधिकारियों का संबंध पंजाब से था ।और कई सदस्य कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय बर्कले के छात्र भी थे जैसे हरदयाल, तारक नाथ दास मौलवी बरकतुल्लाह, करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले,हरनाम सिंह आदि ।हरदयाल और तारक नाथ जैसे क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों ने छात्रों को संगठित कर उनमें राष्ट्रवादी विचारों में शिक्षित करने की कोशिश की ।बर्कले के कुछ छात्र धनी पंजाबी किसानों के वंशज थे जिन्होंने भी गदर पार्टी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

पार्टी का एक साप्ताहिक अखबार भी होता था ‘गदर के इर्द-गिर्द’ जिसका शीर्षक था ‘अंग्रेज़ी राज का दुश्मन’। यह अखबार अमेरिका से पंजाब के शहरों और गांव तक पहुंचाया जाता था। अखबार में स्पष्ट तौर पर लिखा गया कि गदर पार्टी पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष है । हम सिख या पंजाबी नहीं, हमारा धर्म है देशभक्ति’। राजा महेंद्र प्रताप ने मुझे इस गदर पार्टी की जानकारी देते हुए कहा कि मैंने गदर पार्टी के कई नेताओं से भेंट करके उन्हें बताया था कि मैं भी अफ़ग़ानिस्तान में रहते भारत की आज़ादी की मुहिम चला रहा हूं ।मैं भी वहां ऐसी सोच वाले क्रांतिकारियों की टीम बनाऊँगा ।उनकी अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री बरकतुल्लाह उसी गदर पार्टी की ही देन हैं ।

राजा महेंद्र प्रताप द्वारा दिया गया गदर पार्टी का यह विवरण 1979 में मेरी अमेरिकी यात्रा में बहुत काम आया ।पहले तो मुझे यह जानकर ताज्जुब हुआ कि हमारे मेजबान को सैन फ्रांसिस्को में गदर मुख्यालय के बारे में कोई जानकारी नहीं थी ।जब उन्हें और विस्तार से बताया तो वे लोग गदर मेमोरियल हाल तलाशने में सफल हो गये ।सैन फ्रांसिस्को के इस मेमोरियल हाल में उन तमाम जाँबाज देशप्रेमियों के चित्र टंगे हुए हैं
जिन्होंने भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद कराने के न केवल सपने देखे थे बल्कि उसके लिए ठोस प्रयास भी किए थे ।वहां मैंने बहुत समय बिताया ।स्वधीनता संग्राम से जुड़ा एक संग्रहालय भी है ।बताया गया कि जुलाई,1913 में हिंदुस्तान गदर पार्टी का गठन हुआ था जिसका उद्देश्य था अमेरिका से आप्रवासी भारतीयों का स्वदेश के स्वधीनता सेनानियों के साथ मिलकर भारत को परतंत्रता की जंजीरों से आज़ाद कराना ।इस पार्टी के संस्थापक सदस्यों में प्रमुख थे: लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना, भाई परमानंद,संतोख सिंह,संत बाबा वसाखा सिंह, सुल्तान चौधरी, बाबा भगवान सिंह दुसांझ,मौलवी बरकतुल्लाह, करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगल आदि ।अफ़ग़ानिस्तान से गदर पार्टी के नेता जैमल सिंह ढाका भी थे जो राजा महेंद्र प्रताप की प्रेरणा से इस आंदोलन के साथ जुड़े थे.

राजा महेंद्र प्रताप ने उस विशेष भेंट में बहुत तफसील से बातचीत की थी ।मुझे ऐसा लगा था कि अपने 32 साल के विदेश प्रवास में उन्होंने जिन जिन जत्थेबंदियों को भारत की आजादी के लिए लड़ते देखा है वह सब कुछ बता देना चाहते थे। उनसे हुई बातचीत के जितने अंश मुझे याद हैं उसी के बल पर मैं लिखने की कोशिश कर रहा हूं क्योंकि उनसे बातचीत के नोट्स और उनके हस्ताक्षरों से युक्त उनका साहित्य मुझे खोजे नहीं मिला और न ही उनके साथ एस जे सिंह द्वारा लिया हमारा चित्र । राजा महेंद्र प्रताप ने बताया था कि 1913-14 में विदेशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों को भारत के स्वाधीनता संग्राम में शामिल करने के लिए बहुत प्रयास हुए । पंजाब के लोग इस दिशा में बहुत सक्रिय थे पंजाबी हिंदू,सिख और मुसलमान सभी । अमेरिका और कनाडा में रहने वाले प्रवासी भारतीयों का भी इसमें बहुत योगदान था ।इसी सिलसिले में सिंगापुर के व्यवसायी सरहाली के गुरदितसिंह संधू ने 1914 में जहाज कामागाटामारू जापान से किराये पर लिया जिसमें सवार होकर 376 भारतीयों ने कनाडा के वैंकूवर पहुंचने का प्रयास किया था। इनमें 340 सिख, 24 मुस्लिम और 12 हिन्दू थे ।वहां भारतीय राष्ट्रवादी क्रन्तिकारी बरकतुल्लाह और भगवान सिंह ज्ञानी रास्ते में जहाज में मिले ।भगवान सिंह ज्ञानी वैंकूवर गुरुद्वारे में मुख्य ग्रंथी थे । लेकिन कनाडा की कंजरवेटिव सरकार ने यात्रियों को जहाज से उतरने की अनुमति देने से इंकार कर दिया ।कनाडा में पहले से बसे दक्षिण एशियाई कनाडाई लोगों ने कामागाटामारू यात्रियों को प्रवेश से वंचित करने के फैसले का विरोध किया । कनाडा और अमेरिका में सरकार के इस फैसले के खिलाफ विरोध सभाएं हुईं लेकिन कनाडा सरकार अपने निर्णय पर अडिग रही ।उसका फैसला था कि किसी को भी आप्रवासन और उपनिवेशीकरण मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है ।अंत में 376 यात्रियों में से केवल 24 को कनाडा में प्रवेश मिला,शेष 352 को मजबूरन कोलकाता के पास बज बज लौटना पड़ा। यहां उनकी पुलिस से भिड़ंत हुई,क्योंकि ब्रितानी सरकार को यह पता चल गया था कि ये लोग राष्ट्रवादी हैं और कनाडा में स्वधीनता संग्राम की भावना से वहां पर रहने वाले भारत के प्रवासियों को प्रोत्साहित करेंगे । कोलकाता में ब्रिटिश पुलिस ने उन पर गोलीबारी की जिसमें बहुत लोग मारे गये और कुछ भाग कर अपने गांव चले गये । बाबा गुरदित सिंह वहां से Trilok Deep  निकलकर छुपते छुपाते गांधी जी के पास पहुंचे और उन्हें अपनी व्यथा कथा सुनायी ।गांधी जी ने उन्हें ‘सच्चा देशभक्त’ बताकर आत्मसमर्पण की सलाह दी और उन्हें पांच वर्ष की सज़ा हुई ।लेकिन कामागाटामारू के प्रयास के विफल हो जाने से उन्होंने हार नहीं मानी ।1952 में भारत सरकार ने बज बज के पास  कामागाटामारू के शहीदों के लिए एक स्मारक बनवाया जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था ।स्थानीय लोग इसे ‘पंजाबी स्मारक’ के तौर पर जानते हैं । त्रिलोक दीप .                                                                                            ..….(अगले अंक में जारी)

*(pic credit-dvnetwork.org and radianceweekly.net)

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