विख्यात कवि एवं सांसद श्रीकांत वर्मा ‘दिनमान’ में मेरे सहयोगी थे
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-1)
एक बार हमारे एक मित्र ने उलाहना देते हुए कहा कि जब तुम ‘दिनमान’ में आये तो वहां बड़ी बड़ी हस्तियां थीं ।सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय के संपादकत्व में मनोहर श्याम जोशी, जितेंद्र गुप्त, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, श्रीकांत वर्मा आदि थे. इनके अतिरिक्त उपसंपादकों में श्यामलाल शर्मा, रामसेवक श्रीवास्तव, रमेश वर्मा, योगराज थानी, जवाहरलाल कौल और
श्रीमती शुक्ला रुद्र थीं. क्या तुम्हें खौफ नहीं लगा ऐसे धुरंधर पत्रकारों और साहित्यकारों के बीच पहुंचकर. मैंने कहा कि हर नए ऑफिस में पहले पहल अजनबीपन तो लगता ही है. लेकिन ‘दिनमान’ में मुझे ऐसा नहीं लगा, क्योंकि श्रीकांत वर्मा को मैं पहले से जानता था और अज्ञेय जी से भी मिल चुका था. इन के अलावा ‘दिनमान’ में मेरे सभी सहयोगी बहुत ही अच्छे, सहकारी और मिलनसार थे, इसलिए मेरे खौफ़ज़दा होने का कोई सवाल ही नहीं उठता था. पहली जनवरी, 1966 को मैंने ‘दिनमान’ ज्वाइन किया हालांकि मेरा चयन 1965 में हो गया था. इससे पहले मैं लोकसभा सचिवालय में काम करता. वहां मैं जून, 1956 से 31 दिसंबर, 1965 तक रहा. रघुवीरसहाय 1969 में आए | सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय के त्यागपत्र देने के बाद. मेरे कुछ पाठकों का कहना था कि आपने कमोबेश अपने सभी महत्वपूर्ण सहयोगियों के बारे में लिखा है, श्रीकांत वर्मा को कैसे भूल गए जो आपके सहयोगी होने के साथ साथ आपकी तरह छत्तीसगढ़ी भी थे. बेशक यह मेरी चूक थी. एक पाठक ने तो तंज कसते हुए लिखा था कि क्या आपके पास उनके बारे में लिखने के लिए यथोचित सामग्री नहीं है या आपकी स्मरणशक्ति कुंद
पड़ गयी है! मैंने इसे अपनी भूल मानते हुए कहा कि वास्तव में उनके बारे में लिखने के लिए मेरे पास खासी सामग्री है.उनका हक़ वैसे भी मुझ पर ज़्यादा बनता है वह भी मेरी तरह से छत्तीसगढ़ी हैं – वह बिलासपुर के थे और मैं रायपुर का.
श्रीकांत वर्मा सांसद मिनीमाता अगमदास गुरु के करीबी थे जो रायपुर से सांसद थीं. पहले थोड़ी सी पृष्ठभूमि दे देता हूं. यह बात 1949 की है. रायपुर मध्य भारत का ज़िला था,राजधानी नागपुर थी और मुख्यमंत्री थे पंडित रविशंकर शुक्ला. उनका रायपुर आना जाना लगा रहता था, क्योंकि उनका परिवार यहीं रहता था. उनके बेटे विद्याचरण शुक्ल मेरे बहुत करीब थे. तब मैं ब्राह्मण पारा में रहता था. रायपुर आने पर पंडित रविशंकर शुक्ला की कार जब ब्राह्मण पारा के आज़ाद चौक से गुजरती तो वहां जमा लोग हाथ हिलाकर उनका अभिवादन और अभिनंदन किया करते थे. लोग उनकी कार को रोककर माल्यार्पण भी करते थे. मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ला भी अपनी कार से नीचे उतरकर लोगों से हिलमिल जाते थे. कुछ लोगों को तो वह उनके नाम से जानते थे जैसे माधवराव सप्रे स्कूल के हेड मास्टर कन्हैयालाल शर्मा को.उनका सदर बाज़ार में डागा परिवार के यहां आना जाना रहता था. उनसे मिलने के बाद ही वह अपने
घर बूढ़ापारा जाया करते थे.
उन्हीं दिनों रायपुर में एक मशहूर कांग्रेसी नेता थे शारदा चरण तिवारी. उनके नाम ही वहां शारदा चौक है. उनके तीन सिनेमाघर थे शारदा, मनोहर और श्याम. श्याम नया था और बूढ़ापारा में स्थित था.वहीं हमारा स्कूल था माधवराव सप्रे हाई स्कूल जिसका पुराना नाम लॉरी स्कूल था.मेरे एक सहपाठी बनाम मित्र थे कमल बाजपेयी. कमल शारदा चरण तिवारी के भांजे थे.उनकी मार्फत मेरी कई नेताओं से मुलाकातें होतीं और नई नई फिल्में देखने का अवसर भी मिलता. रायपुर छोड़ने के बाद भी कमल बाजपेयी से मेरी दोस्ती बरकरार रही.दिल्ली से जब कभी रायपुर जाना होता तो पहली मुलाकत कमल से ही होती. उसे यह भी पता था कि मैं लोकसभा सचिवालय में काम करता हूं. वह अपने मामा शारदा चरण तिवारी से मेरी मुलाकात कराता रहता था जिनसे मुझे विविध विषयों पर जानकारियां मिलती रहती थीं.
एक दिन कमल बोला कि आओ तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति से मिलवाऊं जिनसे तुम्हारी जान पहचान होनी ज़रूरी है. वह मुझे अपने मामा जी के शारदा चौक वाले ऑफिस में ले गया. वहां एक महिला से परिचय कराते हुए बोला कि यह श्रीमती मिनीमाता जी हैं और रायपुर से लोकसभा सदस्य हैं. मैं नहीं जानता कि तुम पहले इनसे मिले हो कि नहीं. मैंने हाथ जोड़ कर मिनीमाता जी को नमस्कार किया और उन्हें बताया कि मैं लोकसभा सचिवालय की लेजिस्लेटिव ब्रांच में काम करता हूं. हम दोनों को एक दूसरे से मिलकर अच्छा लगा था. वहीं मुझे उन्होंने बताया कि बिलासपुर के श्रीकांत वर्मा उनके नार्थ एवेन्यू के फ्लैट में रहते हैं. बहुत मेहनती हैं, कोई अखबार वगैरह भी निकालते हैं और लिखते पढ़ते रहते हैं. मेरी भी सहायता करते हैं जैसे मुझे कोई गैर-सरकारी विधेयक या संकल्प देना होता है तो उसे तैयार कर देते हैं. मेरे यहां किसी विदेशी मेहमान के आने पर वह दुभाषिये का काम भी करते हैं आदि आदि. जब लोकसभा का अधिवेशन नहीं होता तो मैं रायपुर आ जाती हूं और पूरे फ्लैट के मालिक श्रीकांत वर्मा ही होते हैं. मिनीमाता जी ने मुझे भी अपने घर आने का निमंत्रण दिया था. रायपुर में कमल बाजपेयी के सौजन्य से मिनीमाता जी से हुई मुलाकात उनके अंतिम दिनों तक रही और उनके 91, नार्थ एवेन्यू के फ्लैट में ही मेरी श्रीकांत वर्मा से पहली मुलाकात हुई.तब वह नरेश मेहता के साथ मिलकर ‘कृति’ नामक पत्रिका का संपादन कर रहे थे।
अब मिनीमाता और श्रीकांत जी से मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया. कभी कभी लोकसभा में भी मिनीमाता से भेंट हो जाती तो रायपुर के ताज़ा हालात का पता चल जाता. श्रीकांत जी से उनके घर और बाहर भी मुलाकातें होने लगीं. उनके मित्र कमलेश जी से उन्होंने ही मेरा परिचय कराया जो स
माजवादी विचारधारा के थे.
डॉ. राममनोहर लोहिया से भी कमलेश जी ने श्रीकांत जी को मिलवाया था. लोकसभा में काम करते हुए मैं ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’,’ धर्मयुग’, ‘ज्ञान भारती’ आदि पत्रिकाओं के लिए मंत्रियों और सांसदों के इंटरव्यू भी लिया करता था. वहां काम करने के कारण मुझे किसी भी पार्टी के सांसद या मंत्री से मिलने में दिक्कत पेश नहीं आया करती थी.इस बात से शायद श्रीकांत जी भी परिचित थे, क्योंकि ‘दिनमान’ ज्वायन करने के बाद उन्होंने यह राज़ बेपर्दा किया था.
बहरहाल, लोकसभा सचिवालय में खासी व्यस्तता रहती थी,पढ़ाई भी चल रही थी, लेखन कार्य भी, श्रीकांत जी से लगातार मुलाकातें नहीं हो पाती थीं. 1964 में अज्ञेय को ‘आंगन के पार द्वार’ पर साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ और मेरी बहन श्रीमती प्रभजोत कौर को पंजाबी काव्य संग्रह ‘पब्बी’ के लिये. हिंदी भवन के एक समारोह में अज्ञेय और प्रभजोत जी को आमंत्रित किया गया था. प्रभजोत जी के साथ मैं भी गया था. उन दिनों साहित्य अकादेमी से पुरस्कार प्राप्त विद्वानों का बहुत आदर सम्मान होता था विभिन्न कॉलेजों और साहित्यिक संस्थाओं द्वारा. हिंदी भवन भी ऐसी संस्थाओं में से एक था. प्रभजोत जी ने अज्ञेय जी से मेरा परिचय कराते हुए कहा कि ‘यह मेरा भाई त्रिलोक दीप है.लोकसभा सचिवालय में काम करता है.इसे लिखने पढ़ने का शौक है. लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह के यात्रा संस्मरण अंग्रज़ी से हिंदी में तथा मेरे और कर्नल नरेंद्रपाल सिंह के कविता और उपन्यास पंजाबी से हिंदी में अनुवाद कर बहुत सी हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशित कराये हैं. अज्ञेय जी ने मुझे गौर से देखा और मुस्कुराते हुए दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और मैंने भी अपने दोनों हाथ जोड़ दिये. अज्ञेय की आभा ऐसी थी कि उनके चेहरे पर से मेरी नज़र ही नहीं हटती थी.एक दिन प्रभजोत जी मुझे फ़ोन करके बताया कि अगले दिन अज्ञेय से उनके ऑफ़िस में जा
कर मिल लो और उनके दफ्तर का पता भी भेज दिया. अज्ञेय 7, बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित टाइम्स हाउस की दूसरी मंज़िल पर बैठते थे. वहां पहुंचकर उनके निजी सचिव से अपने आने का मकसद बताया. मुझे तुरंत बुला लिया गया. अज्ञेय जी ने मुझे सामने रखी कुर्सी पर बैठने के लिए कहा.फिर लोकसभा सचिवालय में मेरे काम के बारे में पूछते रहे जिसकी मैंने उन्हें विस्तृत जानकारी दे दी.उन्होंने कहा कि आपको मालूम ही है कि हम लोग ‘दिनमान’ पत्रिका प्रकाशित करते हैं, मैं चाहता हूं कि आप हर हफ्ते सोमवार को संसद से जुड़ी आंखों देखी कुछ खबरें हमें दें. मैं हामी भर जब उनके कक्ष से बाहर निकला तो वहां श्रीकांत जी को देखकर बहुत खुश हुआ. उन्होंने अपनी कुर्सी से उठकर हाथ मिलाया और आने का सबब पूछा. अज्ञेय से हुई बातचीत की संक्षिप्त जानकारी उन्हें दे दी। — ——– त्रिलोक दीप .
…..….(अगले अंक में जारी)
