'मैंने तीन सदियाँ देखी हैं.....!' - News On Radar India

‘मैंने तीन सदियाँ देखी हैं…..!’

….वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री त्रिलोक दीप का अविभाजित गुजरात एवं रावलपिंडी से लोकसभा सचिवालय होते हुए जोधपुर एवं राजस्थान का सफरनामा…भाग-3

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            उन्होंने दोनों हाथ जोड़ कर ‘हरि ओम ‘ कह कर मेरा अभिवादन किया । उनके बातचीत करने के ढंग और पहनावे को देखकर यह अनुमान लगा पाना मुश्किल था कि वह विदेशी हैं । वैसे वह मूलतः स्लोवेनिया के रहने वाले हैं जो कभी युगोस्लाविया का अंग था। वह वहां की राजधानी ल्जुबिजना में एक कॉलेज में वास्तुकला के सहायक प्राध्यापक थे जिन्होंने स्वामी महेश्वरानंद पुरी का शिष्यत्व विदेश में रहते ही 1990 में प्राप्त कर लिया था और 1991में जाडन आ गये थे.शुरू शुरू में उनके माता पिता उनके इस फैसले के पक्ष में नहीं थे. बाद में वह मान गये.आजकल वे भी जाडन में रहते हैं.उन्हें यहां आये 35-36 साल हो गये हैं ।वह तलाकशुदा हैं और उनकी एक बेटी है जो यूरोप में ही रहती है.अपना मूल नाम भी अब उन्हें याद नहीं.

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यनुभव वाले श्री त्रिलोक दीप, देश की राजधानी दिल्ली के राजनीतिक क्षितिज पर एक चमकते हुए स्तंभ हैं। अविभाजित भारत के गुजरात की तहसील फालिया में जन्मे और रावलपिंडी के डेनीज़ स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने, बाद में  माधवराव सप्रे स्कूल, रायपुर (छत्तीसगढ़) से माध्यमिक स्कूल तक पढ़ाई की.  90 वर्षीय त्रिलोक जी ने भारत के विभाजन को झेला और अपने अनुभवों को पत्रकारिता में समेटा है। ‘चढ़ता हुआ रंग’, ‘स्वप्न और परछाईं’, ‘ठंडा रेगिस्तान’ जैसे उपन्यासों और कहानी संग्रहों के अलावा उन्होंने संस्मरण के द्वारा पाकिस्तान, अमेरिका, यूरोप, तत्कालीन सोवियत संघ की यात्राओं के अनुभव एवं अपने वरिष्ठ नामी पत्रकारों  सच्चिदानंद  वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, रघुवीर सहाय की जीवनी संकलन भी लिखे हैं। त्रिलोक दीप  दिनमान पत्रिका एवं संडे मेल के संपादक भी रहे हैं। ऑल इंडिया रेडियो के प्रोग्राम  संचालक  त्रिलोक जी प्रतिष्ठित आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं कई मीडिया पुरस्कारों से नवाजे गये हैं….                                                                                           ‘मैंने तीन सदियाँ देखी हैं ‘ उनके 70 वर्ष के पत्रकार जीवन का सारांश (5 भाग में),
www.NewsOnRadar.com के पाठकों के लिए विशेषानुमति के साथ.

 

पासपोर्ट स्वामी योगेश पुरी के नाम से है. हिंदी और काफी कुछ राजस्थानी यहां के कारीगरों के साथ रहते हुए सीखी है. अपने गुरु स्वामी महेश्वरानंद के कारण उन्हें यह भारतीय नाम और गुरु की जाति पुरी प्राप्त हुई है. यह पूछे जाने पर कि जब स्वामी जी पूर्वी यूरोपीय देशों के साम्यवादी शासन के समय अपने आध्यात्मिक और मानवता के उत्थान संबंधी कार्यों से लोगों की मनोवैज्ञानिक सहायता कर रहे थे तब वह उनसे प्रभावित हुए थे या उससे भी पहले उन्हें जानते थे ,स्वामी योगेशजी मुस्कुराये और बोले ‘हां, मैं उनकी सोच और प्रवचनों से प्रभावित हुआ था लेकिन यह तथ्य भी उतना ही सही है कि दुनिया के अनेक भागों के बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, धार्मिक गुरुओं और राजनेताओं ने स्वामीजी के विश्व भर में किए जा रहे परोपकारी,मानवीय, धार्मिक और पर्यावरण की सुरक्षा के कार्यों को भी सराहा है. अपने भक्तों को स्वामी जी किस भाषा में संबोधित करते हैं योगेश पुरी जी ने बताया हिंदी, अंग्रेज़ी, जर्मन में.
हंगेरियन भी वह काफी हद तक समझ लेते हैं.आपके अलावा स्वामी जी के और भी विदेशी शिष्य हैं? जी हां, 30-40 के करीब. वे केवल पूर्व यूरोपीय देशों के ही नहीं ,दुनिया भर के देशों से हैं जैसे अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया,ऑस्ट्रिया,चेकोस्लोवाकिया आदि देशों से. और स्वामी जी ने सभी को अपने अपने काम सौंप रखे हैं. सभी शिष्य हिंदी बोल और समझ लेते हैं और कुछ लिख-पढ़ भी सकते हैं,स्वामी योगेश पुरी ने जानकारी दी.उन्होंने यह भी बताया कि कामगारों के साथ रह कर बहुतों ने राजस्थानी भी सीख ली है. स्वामी महेश्वरानंद जी राजस्थानी हैं और पाली ज़िले के रूपवास गांव से संबंध रखते हैं.वह स्वामी माधवानंद के शिष्य हैं.उनका संबंध भी राजस्थान से था.औपचारिकता में समय नष्ट किये बिना स्वामी योगेश पुरी जी बोले ,’आइये त्रिलोक जी, मंदिर का निर्माणकार्य देखते हैं.’

सबसे पहले वह मुझे बाहर के गेट के बिल्कुल सामने बने मंदिर के प्रवेश द्वार से भीतर ले गये जो खासा ऊंचाई पर बना हुआ है.10-12 सीढियां चढ़ने के बाद एक बड़ा-सा हाल है जिसे प्रार्थना भवन कहा जाता है. स्वामी योगेश पुरी ने कहा कि आइये त्रिलोक जी,ब्रह्मलीन स्वामी माधवानंद जी की समाधि के समक्ष बैठकर दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें.पांच मिनट वहां बैठने के बाद वह मुझे अपने साथ निर्माणाधीन आश्रम के बारे में बताते हुए कहते हैं कि ऐसा विश्वव्यापी मंदिर बनाने का सपना स्वामी महेश्वरानंद पुरी ने विदेश में लोगों को योग सिखाते सिखाते और भारतीय सनातन संस्कृति पर चर्चा करते हुए देखा था. स्वामी जी का मानना है कि योग की ताकत और सनातन धर्म के दिव्य ज्ञान से शारीरिक और मानसिक दुखों को दूर किया जा सकता है.इस बाबत जब उन्होंने अपने विदेशी मेज़बानों से अपने सपने की बात चलायी तो उन्होंने स्वामी जी को आश्वासन देते हुए कहा था कि आप अपने सपने को साकार करने की दिशा में सोच विचार कर अपना निर्णय लें, यहां से हम लोग आपको भरपूर सहयोग, समर्थन और सहायता
प्रदान करेंगे.उस समय वे ऑस्ट्रिया में रहते थे जहां वे एक आयुर्वेदिक अस्पताल चलाते हैं जिसका नाम है इंटरनेशनल श्री दीप माधवानंद आश्रम.एक अनुमान के अनुसार इस समय स्वामी जी के यूरोप, अमेरिका, कनाडा,ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और भारत समेत 40 हज़ार योग शिविर हैं जो उनके भक्तजन चलाते हैं. विदेशों की भांति भारत में भी उनके अनेक भक्तों ने इस महान कार्य के लिए खुले दिल से दान दिया है जिसकी बदौलत यह भव्य आश्रम निर्मित हुआ.

इस आश्रम के निर्माण में धौलपुर के बंशी पहाड़ के पत्थरों  का इस्तेमाल किया गया है. उत्तर भारत की नागर शैली की स्थापत्य कला तथा वास्तुकला के आधार पर इसका निर्माण हुआ. इस अनूठी इमारत का डिज़ाइन पवित्र प्रतीक ॐ के आकार का है जो उत्तर भारत की नागर शैली पर आधारित है. इस परिसर के केंद्र में गुलाबी बलुआ पत्थर से बना हुआ शिव मंदिर है जिसमें भगवान शिव की 1008 अलग अलग स्वरूपों की प्रतिमाएँ और एक विशाल शिवलिंग स्थापित है.स्वामी योगेश पुरी ने चलते चलते एक कक्ष का दरवाज़ा खोला और मुझे भीतर आने के लिये कहा.बहुत ही साफ सुथरा था वह कक्ष जहां दो बेड लगे हुए थे. बाथरूम कमरे के साथ ही संलग्न थ. स्वामीजी ने बताया कि इस प्रकार के 108 आवासीय कमरे हैं. इनके अतिरिक्त एक पुस्तकालय, सम्मेलन कक्ष और योग आध्यात्मिक शिक्षा व अनुसंधान केंद्र की सुविधा भी है. इन कक्षों का निर्माण इसप्रकार किया गया है कि ऊपर टॉवर पर जाकर देखने से एक प्रभावशाली ओम आकार की आकृति देखने को मिलेगी. जिस तरह से जाप माला के एक सौ आठ मनके होते हैं उसी प्रकार से ये 108 कक्ष हैं जो ज़बरदस्त ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आकर्षित करते हैं. ये कक्ष उन लोगों के रहने के लिए हैं जो यहां योग की व्यापक शिक्षा प्राप्त करने तथा सनातन संस्कृति का अध्ययन करने के लिए आएंगे. इन कक्षों में एक साथ पांच सौ छात्र रह सकते हैं जो योग,संस्कृत और दर्शन शास्त्र में शिक्षा प्राप्त करते हैं.

इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य योग के प्राचीन विज्ञान और वैदिक संस्कृति के अमूल्य आध्यात्मिक खज़ाने को बढ़ावा देना है जिस में सम्मिलित है शारीरिक,मानसिक,सामाजिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य,सभी जीवित प्राणियों के जीवन का सम्मान,धर्मों,संस्कृतियों और राष्ट्रों के बीच सहिष्णुता,सम्मान और समझ तथा मानव और पशु अधिकारों और पर्यावरण का संरक्षण.इन कक्षों में हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध हैं.                                                                                                                                                                         (….अगले अंक में जारी)

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