भारत के विभाजन की घटनाओं को देखने का नया नज़रिया है '1947 विभाजन के शेष सवाल' - News On Radar India

भारत के विभाजन की घटनाओं को देखने का नया नज़रिया है ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’

राजधानी दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार विवेक शुक्ला की नवीनतम पुस्तक ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ की समीक्षा के साथ दिनमान पत्रिका एवं संडे मेल के भूतपूर्व कार्यकारी संपादक त्रिलोक दीप. (अंतिम भाग)

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        मैंने पाकिस्तान में राष्ट्रीय असेंबली के चुनावी कवरेज में सभी बड़े शहरों को नापा लाहौर, इस्लामाबाद, रावलपिंडी, पेशावर, कराची वगैरह. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर मुज़फ़्फ़राबाद भी गया और पेशावर के आगे अफगानिस्तान के बॉर्डर तक. मुस्लिम लीग पार्टी की सभाओं में भी गया, पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) की सभाओं के साथ साथ इमरान अहमद खान नियाज़ी की तहरीक-ए-इंसाफ, (पीटीआई) तथा खान वाlली खान की नेशनल अवामी पार्टी की सभाओं में भी. नेशनल अवामी पार्टी भारत के प्रति बहुत संतुलित लहज़ा अपनाती है जबकि मुस्लिम लीग और पीपीपी कश्मीर को लेकर भारत पर निशाना साधते हैं. लेकिन जब नेताओं से आप अलग से बातचीत करते हैं तो दोनों देशों के बीच ‘सामान्य संबंधों को हितकारी’ मानते और बताते हैं. राजनीतिक दोहरापन आपको हर देश में देखने और सुनने को मिल जाएगा, पाकिस्तान में भी. लाहौर में इमरान की चुनावी सभाओं में दूसरे नेताओं की तुलना में ज़्यादा भीड़ देखने को मिलती थी. उनके भाषण मुल्क की बदहाली को लेकर होते थे.

विवेक शुक्ला की इस किताब में ‘दो पंजाब-जुदा ज़ुबानें’  वाला चैप्टर बहुत दिलचस्प है. पाकिस्तान के नेता चाहे नवाज़ शरीफ हों, इमरान खान या दूसरी किसी पार्टी के वे तक़रीर उर्दू में करते हैं बेशक उसको सुनने वाले लोगों की मातृभाषा पंजाबी ही क्यों न हो. उनकी उर्दू में पंजाबी का असर और ‘तड़का’ साफ तौर पर दीखता है. यही हालत इमरान खान की है. वह धरती की बोली नहीं बोलते. ये नेता लाहौर, रावलपिंडी, लायलपुर (अब फैज़लाबाद) जैसे शहरों में चुनावी सभाओं में उस जुबान में नहीं बोलते जिसे वहां की अवाम अपनी मानती है. वे क्यों नहीं धरती की जुबान में बोलते! क्या उसे उन्होंने दोयम दर्जे की जुबान मान लिया है. तर्क दिया जाता है क्योंकि देश के बंटवारे के वक़्त लोग उत्तरप्रदेश या दिल्ली से यहां आये थे इसलिए पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की सलाह पर  मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू घोषित कर दी थी. लिहाज़ा आज हाल यह है कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली में सदस्य मुख्यतया उर्दू या अंग्रेज़ी में ही अपनी बात रखते हैं. अगर किसी सांसद को पंजाबी, सिंधी, पश्तो, बलूची या सरायकी में बोलना होता है तो उसे स्पीकर से पूर्वअनुमति लेनी पड़ती है. लेकिन पंजाब की असेंबली में सदस्यों को शपथ भी उर्दू या अंग्रेज़ी में ही लेनी होती है और असेंबली में बहस भी इन दो भाषाओं में से किसी एक में करनी लाज़िमी है और किसी भाषा में नहीं. दिलचस्प बात यह है कि 7-8 फीसदी मुहजिरों की भाषा उर्दू को एक तरह से धर्म यानी इस्लाम की भाषा से जोड़ दिया. विवेक शुक्ला ने पंजाबी के कवि रेहान चौधरी को उधृत करते हुए लिखा है कि ‘हम पंजाबी के पक्ष में इसलिए लड़ रहे हैं, क्योंकि पंजाबी के रूप में पहचान हमारे पाकिस्तानी और मुस्लिम पहचान से कहीं अधिक पुरानी है. हम हज़ारों सालों से पंजाबी हैं. पाकिस्तानी तो हम 70 सालों से हैं और मुसलमान 200 सालों से भी कम समय से.’ उन्होंने इस बात पर अफ़सोस जताया कि पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह के समय से ही पंजाबी को उसका हक़ नहीं मिला. तब पंजाब में सरकारी भाषा फ़ारसी थी. उन्होंने इस बात पर भी हैरानी प्रकट की कि इक़बाल, फैज़ और साहिर लुधियानवी जैसे शायरों ने भी अपनी मातृभाषा यानी पंजाबी में नहीं लिखा. 1993 में मैं लाहौर में पंजाबी के मशहूर लेखक मुनीर नियाज़ी से उनके घर  मिला था. उन्होंने भी पंजाबी भाषा की बेकद्री होने पर दुख व्यक्त किया था. पाकिस्तान में पंजाबी भाषा फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है.

‘1947 विभाजन के शेष सवाल’  में 42 चैप्टर हैं जो अपने आप में मुकम्मल हैं. पाठक किसी भी एक अध्याय को उठा ले उसे पूरी जानकारी मिल जाएगी. मेरा इन सभी अध्ययाओं से किसी न किसी रूप से साबका है, जुड़ाव है, इसीलिए मैं इस किताब को पूरे मनोयोग से पढ़ गया. यह किताब उन लोगों के लिए एक ‘लासानी ग्रंथ’ है जिनके परिवार का विभाजन से संबंध रहा है. नहीं जानता कितने लोग इस वक़्त बचे होंगे जिन लोगों ने यह विभीषिका देखी होगी अलबत्ता विवेक शुक्ला जैसे ज़रूर लोग मौजूद होंगे जिन्होंने अपने ‘बड़ों’ से विभाजन के दर्दनाक मंजर के बारे में सुना होगा. ऐसे लोगों के लिए यह पुस्तक एक संग्रहणीय ग्रंथ से कम नहीं. यह पुस्तक ऐसे लोगों को भी पढ़नी चाहिए जिन्होंने विभाजन के बारे में सुन तो रखा है लेकिन उनके पास सही और सटीक जानकारी नहीं. विवेक शुक्ला बहुत ही परिश्रमी और खोजी पत्रकार हैं जिसका प्रत्यक्ष सबूत है ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’. मैं एक बार फिर से स्पष्ट कर दूं कि विवेक की खोज में अगर कहीं कुछ जोड़ा है तो वह उसके पूरक के तौर जिसे लेखक स्वीकार कर सकता है और नहीं भी इसकी उसे पूरी आजादी और छूट है…..

Trilok Deep

बहरहाल 1947 के विभाजन पर सरल और सहज शैली में इतनी सार्थक, रोचक और सुरुचिपूर्ण जानकारी के हार्दिक बधाई और प्यार विवेक.                                                                                                                               —–त्रिलोक दीप

*(pics credit-3speak.tv. and  gnnhd.tv)

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