भारत के विभाजन की घटनाओं को देखने का नया नज़रिया है ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’
राजधानी दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार विवेक शुक्ला की नवीनतम पुस्तक ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ की समीक्षा (6 भाग में) के साथ दिनमान पत्रिका एवं संडे मेल के भूतपूर्व कार्यकारी संपादक त्रिलोक दीप. (भाग 5)
1947 से 1959 तक कराची पाकिस्तान की राजधानी थी. अरब सागर के तट पर स्थित कराची
पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहर और बंदरगाह है. इसे पाकिस्तान की आर्थिक और वित्तीय राजधानी भी कहा जाता है. अपनी जीवंतता और रोशनी के कारण इसे ‘रोशनियों का शहर’ और मोहम्मद अली जिन्ना का जन्मस्थान होने के कारण ‘शहर-ए-कैद भी कहते हैं.कराची को विभिन्न जातियों और संस्कृतियों का संगम भी कहा जाता है जहां सिंधी, पठान, बलूच,मुहाजिर, पंजाबी सभी मिलजुल कर रहते हैं. कराची में भारत ने अपना पहला उच्चायोग 3, फातिमा जिन्ना रोड पर स्थापित किया जिसे ‘इंडिया हाउस’ कहा जाता था. लेकिन उच्चायुक्त के निवासस्थान की कोई माकूल जगह नहीं मिल पा रही थी. एक बार पंडित जवाहरलाल नेहरू कराची गए. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान उन्हें ‘कराची दर्शन’ के लिए ले गए. उन्हें एक घर दिखाते हुए लियाकत अली खान ने पंडित नेहरू को बताया कि यह उनके एक युवा दोस्त का मकान है, क्या इसे आपकी अपने उच्चायुक्त के लिए खरीदने में दिलचस्पी है.
पंडित नेहरू को पहली नज़र में ही यह मकान पसंद आ गया और उन्होंने अपनी सहमति दे दी. इस प्रकार 63, क्लिफटन रोड का मकान तब भारतीय उच्चायुक्त का निवास स्थान हो गया.
1965 में इस्लामाबाद में उच्चायोग के शिफ्ट हो जाने के बाद यह भारत के कौँसल जनरल का निवासस्थान बना. इस मकान की मा
लकिन श्रीमती सुपारीवाला से भी मेरी भेंट हुई थी. उन्होंने बताया था कि इस भवन निर्माण पर उन्होंने मार्बल इटली से मंगाया था इस मकान की छतें ऊँची हैं. क्योंकि हमारा कोई बच्चा नहीं है और इतने बड़े मकान का रखरखाव हमारे बूते से बाहर था इसलिए इसे हमने बेच दिया. 1990 में मणि त्रिपाठी कौँसल जनरल थे और उनकी पत्नी शशि त्रिपाठी डिप्टी कौँसल जनरल. दोनों आईएफएस थे. मणि उड़िया थे जबकि शशि का संबंध सिख परिवार से था. वह डॉ गोपाल सिंह की भतीजी थीं जिन्होंने गुरु ग्रंथ साहब का अनुवाद अंग्रेज़ी में किया था. डॉ गोपाल सिंह राज्यसभा सांसद थे और बुलगारिया में भारत के राजदूत भी. कौँसल जनरल के इस निवासस्थान पर मैं
कई बार गया अपने ‘संडे मेल’ के सहयोगी प्रवीण जैन के साथ. प्रवीण मणि त्रिपाठी से परिचित थे. लेकिन 1992 में भारत में बाबरी मस्जिद गिराने के विरोध में यहां के कट्टरपंथियों ने यहां के मंदिरों के साथ साथ इस खूबसूरत मकान को भी
क्षतिग्रस्त कर दिया था. 1993 में तत्कालीन कौँसल जनरल श्री डोगरा से मेरी भेंट पर्ल होटल में हुई थी.अक्टूबर, 1990 में राष्ट्रीय असेंबली का चुनाव कवर करने के लिए ‘संडे मेल ( )अंग्रेज़ी) से जी.के. सिंह और प्रवीण जैन आए थे और हिंदी ‘संडे मेल’ से मैं. हिंदुस्तान टाइम्स से डी. सेन भी थे. हम सभी लोग कराची के ताज महल होटल में ठहरे थे. इस होटल का भारत के ताज होटल से कोई संबंध नहीं. — त्रिलोक दीप. (….अगले अंक में जारी)
*pic credit- school.theprint)
