खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा, ‘मैं 15 साल अंग्रेज़ों की जेल में रहा और 15 साल ही पाकिस्तान की जेलों में……. . - News On Radar India

खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा, ‘मैं 15 साल अंग्रेज़ों की जेल में रहा और 15 साल ही पाकिस्तान की जेलों में……. .

..मगर पाकिस्तानी बहुत ज़ालिम हैं: पठान प्रेजिडेंट जनरल अय्यूब खान चचा-चचा कहता था पर लिहाज़ नहीं करता था'

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-3)

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                 क्या पाकिस्तान की हुकूमत और लीडरान को यह इल्म नहीं था कि आपकी लड़ाई अंग्रेज़ हुकूमत के खिलाफ थी  जिस में हिन्दू-मुसलमान-सिख-ईसाई सभी शामिल थे। शुरू शुरू में मोहम्मद अली जिन्ना भी तो स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थे, बाद में अंग्रजों की शह पर उन्होंने अलग मुल्क की आवाज़ बुलंद की थी? बादशाह खान का कहना था ‘इस्लामी सरकार हर चीज़ से वाकिफ थी लेकिन आज़ादी के बावजूद वहां  के कारकून अंग्रजों के पित्ठू बने रहे जबकि भारत  सरकार खुदमुख्तियर हो गयी थी। पाकिस्तानी लोग गोरों के तलवे सहलाते रहे । जिन्ना जल्दी इंतकाल फरमा गये, उनके बाद वज़ीरेआज़म लियाकत अली भी ज़्यादा देर ज़िंदा नहीं रहे लिहाजा मुल्क में अफरातफरी का माहौल था। दूसरी तरफ पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगलादेश) के बंगाली मुसलमान  पंजाबी मुसलमानों में अपने आपको अनफिट महसूस कर रहे थे । नतीजतन पाकिस्तान की जम्हूरियत का जनाजा निकल गया  और मुल्क में जनरल अय्यूब खान ने मार्शल लॉ लागू कर गद्दी संभाल ली

“जनरल अय्यूब खान तो पठान था  उन्होंने आपके प्रति कोई हमदर्दी का रुख नहीं अपनाया ? ‘ बाचा खान का जवाब था कि मुंहजुबानी वह बहुत कुछ कहता था और मुझे ‘चचा ‘ भी बुलाता था लेकिन लगता है उसे भी हुकूमत का या तो गरूर हो गया था या व्यवस्था ने उसे कुछ उल्टा सीधा पाठ पढ़ा दिया था ।अगर पठान दूसरे पठान या पूरी पठान जाति का दर्द न समझे तो वह हाकिम हमारे किस काम का ।अय्यूब खान का कुछ ऐसा ही बेरुखी का रवैया हो गया था ।

वहां के हुक्मरानों को आपसे चिढ़ किस बात को लेकर थी, के सवाल के जवाब में बादशाह खान ने बताया था कि उन्हें सब से बड़ी तकलीफ मेरे कांग्रेस में जाने की थी। वह कहते थे कि मैं मुस्लिम लीग में शामिल क्यों नहीं हुआ । इसके जवाब में जब उन्हें बताया कि मैं सबसे पहले शामिल होने के लिए तो मुस्लिम लीग के पास ही गया था लेकिन उन्होंने जब कोई तवज्जो नहीं दी तो मायूस होकर मैं कांग्रेस के पास गया और उन्होंने मुझे सिर आँखों पर बिठा लिया और जितनी इज़्ज़त मुझे वहां बख्शी गयी और आज भी बख्शी जा रही है ,वह मुझे मुस्लिम लीग में हरगिज़ न मिलती । मुझे मुस्लिमलीगी ‘देशद्रोही’ मानते हैं जब कि मैं खुदाई खिदमतगार हूं जिस का मकसद है इंसानियत की खिदमत करना और भाईचारे का पैगाम पहुँचाना । क्योंकि पाकिस्तान की नींव नफरत पर रखी गयी थी इसलिए उसे घुट्टी में ही नफरत, इर्ष्या, द्वेष,दुश्मनी,  दुर्भावना मिली थी।

‘अंग्रजों ने पाकिस्तान का निर्माण इसलिए किया ताकि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दंगे फसाद हमेशा होते रहें ।’अगर उनकी ऐसी सोच न होती तो महज़ मज़हब के नाम पर दूरदराज़ के बंगाल को पंजाब की तरह दोफाड़ क्यों करते जो सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर पश्चिमी पंजाब से मेल नहीं खाता था ।यही हाल सिंध, बलूचिस्तान और हम  पख्तूनों का है ।सिंध भारत के ज़्यादा करीब है और हम लोग अफ़ग़ानिस्तान के ।अंग्रजों की तोड़ो और राज करो की नीति ही एक मात्र वजह है कि जम्हूरियत पाकिस्तान को फल नहीं आयी और पूर्वी पाकिस्तान अब बंगलादेश बन गया है । बाकी के सूबे भी उससे पिंड छुड़ाने के लिए छटपटा रहे लगते हैं लेकिन इन सूबों पर कुछ तो आबादी की अदला-बदली करके और कुछ फौज की बंदूकों के बल पर अपने कब्जे में रखे हुए है ।आखिर कब तक !

बादशाह खान के मुताबिक ज़ुल्फिकरअली भुट्टो की ‘बदतरीन तानाशाही ‘और उनके बाद ज़िया उल हक़ द्वारा पठानों की आबादी को दूसरे सूबों में बसाने का काम हम पर कम ज़ुल्म नहीं था । इसके पीछे उनका मकसद क्या था ।अब फिर बादशाह खान उदास हो गये ।बोले, सब से ज़्यादा कहर तो ज़िया उल हक़ ने ढाया । उन्होंने बड़ी भारी तादाद में पठानों को सिंध भेज दिया और सिंधियों को पेशावर और उसके आसपास के इलाकों में ।कई घर और परिवार इन हुक्मरानों ने तबाह कर दिये। इतना ही नहीं सभी सरहदों पर मरने के लिए पठानों को भेजा जाता है चाहे कश्मीर हो या रण कच्छ या दूसरे दूरगामी इलाके हों । इस बात की पुष्टि तो कराची में मेरे टैक्सी ड्राइवर ने भी की जब मैं कराची एयरपोर्ट से अवारी होटल जा रहा था। मैंने ड्राइवर से पूछा कि आप कहां के हो? उसने बताया,पेशावर । यहां कैसे आये के जवाब में उसने बताया था कि ज़िया साहब ने बड़ी तादाद में पठानों को सिंध और सिंधियों को फ़्रंटियर भेजा है ।आबादी की अदला- बदली उनके राज में खूब हुई है ।शहर के सुकून के बारे में जब पूछा तो उसने बताया कि अनिश्चित रहता है , न जाने अमन कब बेअमनी में बदल जाये । उस ड्राइवर ने यह भी बताया था कि यहां से कुछ सिंधी परिवार पेशावर भेजे गये हैं । वहां वह दुखी हैं और यहां हम ।

आज खान अब्दुल गफ्फार खान दिलखोल कर बात करने के मूड में थे ।मुझे लगा कि एक बार वह अपने मन का दर्द उड़ेल देना चाहते हैं ।इतनी बातें करते देख बादशाह खान की देखरेख करने वालों को भी लगता है ताज्जुब हुआ था । मैंने खान साहब का शुक्रिया अदा किया और जब रुख्स्त होने लगा तो मेरी पीठ पर हाथ फेर कर आशीर्वाद देते हुए कहा कि ‘आपसे मिलकर ऐसे लगा जैसे मैं अपने मुल्क के किसी बंदे से मिल रहा हूं वैसे रावलपिंडी पेशावर से ज़्यादा दूर नहीं है ।’ चलते चलते मैंने पूछ ही लिया,यहां से कहां जायेंगे । ‘पूरी तरह से सेहतमंद होने के बाद ही मैं हिंदुस्तान छोड़ूंगा और इरादा अफगानिस्तान जाने का ही है ।वहां पहुंच कर लोगों से सलाह मशविरा कर के ही पाकिस्तान जाऊंगा। मुझे मालूम है कि वहां मेरी आज़ादी खतरे में है ।अगर जेल नहीं तो नजरबंदी शर्तिया है । हाथ ऊपर करते हुए बोले इंशाल्लाह ।

1990 में अपने पाकिस्तान के दौरे के दौरान पेशावर के पास चारसदा में जब मैंने उनके पुत्र वली खान से बादशाह खान से इस लंबी बातचीत का ज़िक्र किया तो वह बहुत खुश हुए । उन दिनों मैं  ‘संडे मेल ‘ में कार्यकारी संपादक था और एक मिशन पर पाकिस्तान गया था । वह मिशन था गैरराजनीतिक तरीके से भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच दोस्ती और भाईचारे को बढ़ाने के लिए एक सम्मेलन आयोजित करना ।प्रमुख  समाजसेवी उद्योगपति और ‘संडे मेल ‘ के मालिक संजय डालमिया का यह मानना कि राजनीतिक तौर पर तो दोनों देशों के मसले तो हल होने से रहे, क्यों न गैरराजनीतिक तौर पर इस दिशा में प्रयास किये जायें।उनका मानना था कि भारत में तो ऐसे सकारात्मक विचार वाले लोगों की कमी नहीं है, हमें पाकिस्तान में ऐसे सोच वाले लोगों को तलाशने की ज़रूरत है । उनके इस मकसद को लेकर मैं पाकिस्तान की टोही यात्रा पर गया था । लाहौर , इस्लामाबाद, रावलपिंडी और मुज़फ्फराबाद के बाद जब मैं पेशावर पहुंचा तो सौ से अधिक अतिविशिष्ट लोगों की मुझे सहमति मिल चुकी थी |
जिसमें संस्कृतिकर्मी, पूर्व राजनयिक, पूर्व न्यायधीश,पूर्व मंत्री,शिक्षाविद, उपकुलपति,पत्रकार आदि शामिल थे । वली खान को भी यह विचार Trilok Deepबहुत पसंद आया । उन्होंने तुरंत अपनी सहमति देते हुए कहा कि अगर मेरी सेहत ने मुझे इज़ाजत दी तो अपने बिछुडे हुए भाइयों से मिलने के लिए मैं खुद ही हाज़िर हो जाऊंगा वर्ना अवामी नेशनल पार्टी का कोई सीनियर पदाधिकरी उस सम्मेलन में शिरकत करेगा ।वली खान ने अपना कौल रखा और उन्होंने अजमल खटक को अपनी पार्टी की तरफ से भेजा जो खुद बाहैसियत पश्तो के लेखक, शायर और खुदाई खिदमतगार थे और वली खान के अवकाश ग्रहण करने के बाद अवामी नेशनल पार्टी के प्रेसीडेंट और पकिस्तान नेशनल असेंबली के सांसद भी थे।.……त्रिलोक दीप                     …..….(अगले अंक में जारी)

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