खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा, ‘मैं 15 साल अंग्रेज़ों की जेल में रहा और 15 साल ही पाकिस्तान की जेलों में……. .
...मगर पाकिस्तानी बहुत ज़ालिम हैं: पठान प्रेजिडेंट जनरल अय्यूब खान चचा-चचा कहता था पर लिहाज़ नहीं करता था'
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (अंतिम भाग)
यह दो द्विवसिय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन नवंबर, 1991 में दिल्ली के अशोक होटल में हुआ जिसमें पाकिस्तान से दर्जन भर लोगों ने जस्टिस दोराब पटेल के नेतृत्व में शिरकत की ।अजमल खटक से शायद वली खान ने मेरे खान अब्दुल गफ्फार खान से मुलाकात की चर्चा की थी ।दिल्ली एअरपोर्ट पर मैंने ही उनकी अगवानी की । मुझे देखते ही उन्होंने मुझे गले लगाते हुए कहा कि आपने हमारे बादशाह खान से बहुत लंबी गुफ्तगू की थी ।आपको इस खुदाई खिदमतगार का सलाम । खान वली खान ने आपके मुतालिक़ बताया था ।
उनकी सेहत नासाज़ थी लिहाजा आप सब लोगों से मिलने की खुशकिस्माती इस नाचीज़ को नसीब हुई ।सम्मेलन के पहले और बाद में भी अजमल खटक से मेरी बातचीत होती रही । संजय डालमिया का यह बहुत ही नेक काम है ।हमारे दोनों मुल्कों की त्वारीख एक,खना पीना-ओढ़ना-पहनना, एक जैसी बोली एक और दुख दर्द सांझे फिर यह नफरत क्यों ।बंटवारा अपनी जगह है लेकिन हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक,शैक्षिक और आध्यात्मिक सम्बंध तो क़ायम हो ही सकते हैं ।मेरा इन्हीं मुद्दों पर ज़ोर रहेगा ।सम्मेलन में उन्होंने पुरज़ोर आवाज़ में इस मुद्दे को उठाया भी ।एक निजी भेंट में उन्होंने अपनी नज्में भी सुनायीं ।एक तो पंजाबी से मिलती जुलती थी जिसे पठान ‘हिंदको’ कहते हैं।
खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म 6 फरवरी,1890 को उत्त्नमान जई गांव में एक समृद्ध और सम्पन्न गौरवशाली जमींदार पठान खान बहराम खान के घर हुआ जो अपनी विनम्रता, पाक-साफ छवि और खुदा के सच्चे बंदे के तौर पर मशहूर थे । वे अपनी उदारता, दया, दयानतदारी और मेहमाननवाजी के लिये भी दूर दूर तक जाने जाते थे ।
यह भी माना जाता है कि गफ्फार खान के दादा, परदादा ने गाज़ी, दुर्रानी और मुगलों जैसे हमलावरों का डट कर मुकाबला किया था और गफ्फार
खान ने पहले अंग्रजों और बाद में अपने मुल्क की इस्लामी हुकूमत से लोहा लिया था । वह इंसाफ पसंद स्वतंत्रता सेनानी थे । महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिला कर देश की आज़ादी के लिए सभी कुछ कुर्बान कर दिया। यह हिम्मत, बहादुरी, सच्चाई और अनुशासन का पाठ खान अब्दुल गफ्फार खान ने अपने दूरदर्शी और वीर पुरखों से सीखा था।उन दिनों बच्चे आम तौर मस्जिदों में पढ़ा करते थे ,क्योंकि अंग्रेज़ वहां स्कूल या मदरसे खोलने की इज़ाजत नहीं देते थे ।लेकिन गफ्फार खान के पिता ने उन्हें शिक्षित बनाने के लिए मिशनरी स्कूल में शिक्षित कराया । स्कूली पढ़ाई समाप्त करने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय से स्नातक की डिग्री ली ।उनके पिता गफ्फार खान को भी ऊंची पढ़ाई के लिए लंदन भेजना चाहते थे जैसे कि उन्होंने अपने बड़े बेटे अब्दुल जब्बार खान को डॉक्टरी पढ़ने के लिए भेजा था लेकिन माँ ने यह कह कर विरोध किया कि बड़ा भाई पहले ही वहां है इसे हम अपने से अलग नहीं करेंगे ।
लिहाजा वह देश सेवा के काम में लग गये ।1919 में पेशावर में अंग्रजों ने जब फौजी कानून लागू किया तो गफ्फार खान ने शांतिपूर्ण ढंग से उसका विरोध किया जिसके चलते उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । अंग्रजों का अहिंसा से विरोध करने के लिये 1929 में उन्होंने खुदाई खिदमतगार नामक सामाजिक,राजनीतिक और आध्यात्मिक संस्था का गठन किया जिसे ‘सुर्ख पोश ‘ या ‘लाल कुरती ‘ के नाम से भी जाना जाता है ।
बादशाह खान धर्मनिरपेक्ष मुसलमान थे जो धार्मिक हदबंदियों के खिलाफ थे ।उन्होंने किनान्खेल कबीले के यार मोहम्मद खान की बेटी से 1912 में पहली शादी की जिस से उनके दो बेटे अब्दुल गनी खान और अब्दुल वली खान तथा एक बेटी सरदारो मेहरकन्दा पैदा हुई । 1918 में इन्फ्लूएंजा की महामारी में पहली बेगम के फौत हो जाने से 1920 में उसकी चचेरी बहन नामबाता से दूसरी शादी की । उससे एक बेटी मेहर ताज और एक बेटा अब्दुल वली खान पैदा हुआ ।
बदकिस्मती से 1926 में येरुशलम में एक घर की सीढीयों से गिर कर उसकी भी मौत हो गयी । उनका बड़ा बेटा गनी खान शायर और कलाकार है तथा उसने पारसी औरत रोशन से शादी की है । दूसरा बेटा खान अब्दुल वली खान अवामी नेशनल पार्टी का संस्थापक है और पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली में विपक्ष का नेता है ।तीसरा बेटा अब्दुल अली खान गैर राजनीतिज्ञ शिक्षाविद है और पेशावर विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रह चुके हैं । उनका पोता आसफंदयार वली खान अवामी नेशनल पार्टी का नेता है जो 2008 से 2013 तक फ़्रंटियर में सत्ता में रही । आधुनिक भारत में पश्तून नेता खान गफ्फार की विख्यात विरासत को बड़े आदर सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है जिन के कुछ पौध भारत में भी हैं ।
खान अब्दुल गफ्फार खान की गांधी जी के साथ बहुत गहरी, आध्यात्मिक और निस्संकोच मित्रता थी और दोनों ने स्वतंत्रता संग्राम में हर क्षेत्र में एकजुटता का परिचय दिया था । अब्दुल गफ्फार खान की इन नि:स्वार्थ सेवाओं के लिए उन्हें 1967 में जवाहरलाल नेहरू सद्भावना पुरस्कार तथा 1987 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया ।
20 जनवरी, 1988 को पेशावर में 97 साल की उम्र में जब उनकी मौत हुई तो वह अपने देश में नजरबंद थे ।उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में जलालाबाद में उनके निजी घर में दफन किया गया ।उस समय अफगानिस्तान में गृहयुध्द चल रहा था लेकिन बादशाह खान के सम्मान में युद्घविराम किया गया । उनका जनाजा पेशावर बरास्ता खैबर जलालाबाद गया जिस में दो लाख से ज़्यादा लोगों ने शिरक
त की ।
अफगानिस्तान के तत्कालीन प्रेसीडेंट मोहम्मद नजिबुल्लाह भी जनाजे में शामिल होने वाले नेताओं में थे ।भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी अपनी अकीकत पेश करने के लिए पेशावर पहुंचे थे हालांकि पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़िया उल हक़ ने सुरक्षा कारणों से उन्हें आने से मना किया था । बेशक ‘शांति के इस मसीहा ‘ के काफिले में गमगीन चेहरों और उदास आंसूयाफ्ता आंखें भी बेशुमार थीं ।
अलविदा सीमांत गांधी ।सादर नमन । —-त्रिलोक दीप.
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