राजस्थान के धोरों के बीच मौजूद है ‘ज्ञान का भंडार’ एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी भादरिया में - News On Radar India

राजस्थान के धोरों के बीच मौजूद है ‘ज्ञान का भंडार’ एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी भादरिया में

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री त्रिलोक दीप का अविभाजित गुजरात एवं रावलपिंडी से लोकसभा सचिवालय होते हुए जोधपुर एवं राजस्थान का सफरनामा…भाग-3

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             एक बार मैंने भादरिया महाराज से पूछा कि आपको इस मरुस्थल में भूमिगत लाइब्रेरी बनाने का ख्याल कैसे और क्यों कर आया तो उन्होंने बताया यह मेरी सोच या कल्पना नहीं थी. इस महान संत एवं प्रख्यात आध्यात्मिक साधक भादरिया महाराज ने कहा कि यह माँ भादरिया राय का आदेश था कि क्यों न इस रेगिस्तानी इलाके में कोई ऐसा पुस्तकालय बनाया जाए जहां ज्ञान पिपासु और शोधकर्ता दूर दूर से आएं और उनकी ज़रूत का सारा साहित्य एक स्थान पर ही उपलब्ध हो. ज्ञान की खोज वाले बौद्धिक क्यों जगह जगह भटकें. यहां अखिल भारतीय सेवाओं के लिए तैयारी करने वाले जिज्ञासु भी आकर लाभ उठा सकते हैं. उन्हें अतिरिक्त कोचिंग की आवश्यकता नहीं होगी. मुझे बताया गया कि इस ग्रंथालय में नौ से दस लाख पुस्तकें,दुर्लभ सामग्री और ग्रंथ मौजूद हैं. यह संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है.

मुझे यह भी बताया गया कि 20 मई, 1998 को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी पोखरण परमाणु परीक्षण स्थल का दौरा करने आए थे तब उनके साथ उनके वैज्ञानिक सलाहकार एपीजे अब्दुल कलाम भी थे. अटल जी जब परमाणु परीक्षण का दौरा कर रहे थे तो वहां के एक स्थानीय नेता ने उन्हें रामदेवरा मंदिर का दर्शन करने की सलाह दी. वाजपेयी जी जब मंदिर की ओर जाने लगे तो कलाम साहब ने उनके प्रेस सचिव अशोक टंडन को भादरिया लाइब्रेरी देखने जाने की सूचना दे वह लाइब्रेरी पहुंच गए. लाइब्रेरी का रखरखाव करने वाले एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि कलाम साहब ने बड़े मनोयोग से एशिया की सबसे बड़ी यह लाइब्रेरी देखी. उन्होंने विज्ञान से जुड़ी पुस्तकों में बहुत

रुचि ली. उन्होंने दुर्लभ पांडुलिपियां भी देखीं और प्राचीन ग्रंथों को भी. कलाम साहब ने भादरिया महाराज से भेंट कर ज्ञान की इस ‘नायाब’ दौलत के लिए बधाई दी. वहां पर रखी उनकी पुस्तकों के लिए आभार व्यक्त किया. बताया जाता है कि कलाम साहब ने भादरिया महाराज को अपने कुछ सुझाव भी दिए.

भादरिया महाराज की पृष्ठभूमि के बारे में जब मैंने दरयाफ्त किया तो लाइब्रेरी में काम करने वाले एक सज्जन ने बताया कि भादरिया बाबा का जन्म 1930 में पंजाब के फिरोजपुर में हुआ ।वह संन्यासी हैं । एक बार वह यहां शक्तिपीठ भादरिया राय मंदिर में दर्शन करने के लिए आये थे। देर हो जाने पर रात को वह मंदिर में ही टिक गये ।विश्वास किया जाता है कि रात को भादरिया मां ने उन्हें दर्शन दिये और कहा कि तुम यहां रहकर मानवता की सेवा करो । तभी से वह यहीं पर हैं और हरबंससिंह निर्मल से भादरिया महाराज बन गये हैं ।उन्हीं की सरपरस्ती में यहां सारा सामाजिक और धार्मिक कामकाज होता है । उन्होंने मानवता की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण लोगों को नशे से मुक्त कराने में भरसक प्रयास किये.उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है ।

मैं डालमिया सेवा ट्रस्ट के सौजन्य से 1997 से हर माह राजस्थान जाया करता था। ट्रस्ट की ओर से चिकित्सा शिविर लगते हैं ।मैं समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया के प्रतिनिधि के तौर पर शिविर स्थलों का निरीक्षण करने के लिए जाता था ।ऐसे ही जोधपुर से जैसलमेर जाते हुए भादरिया के मंदिर में दर्शन करने और भूमिगत लाइब्रेरी को देखने के लिए रुक गया ।एक बार फरवरी 2010 को जब मैं जोधपुर में था तो मुझे खबर लगी कि भादरिया महाराज अस्वस्थ हैं और उन्हें किसी अस्पताल में दाखिल कराया गया है । मन में उनसे मिलने की उत्कट इच्छा हुई ।अभी उनसे मिलने का मैं मन बना ही रहा था कि सूचना मिली कि उन्हें वापस भादरिया ले जाया गया है,संभवतः उनका देवलोकगमन हो गया था । 15 फ़रवरी, 2010 में उन्होंने समाधि ले ली.दूसरी बार मैं उनके दर्शनों से वंचित रह गया ।

भादरिया महाराज अपने पीछे भूमिगत पुस्तकालय के रूप में जो विरासत छोड़ गये हैं उसका लाभ केवल राजस्थान के विश्विद्यालयों के शोधकर्ता और ज्ञान पिपासु ही नहीं उठाते बल्कि देश के अन्य भागों से आने वाले विद्वान भी इस अद्वितीय और अद्भुत लाइब्रेरी का लाभ उठाते हैं । यह भूमिगत ग्रंथागार दो भागों में विभाजित है : एक अध्ययन के लिए और दूसरा पुस्तकों के संग्रह के लिये । अध्ययन हाल इतना बड़ा है कि उसमें एक साथ पांच हज़ार शोधकर्ता और विद्वान बैठकर अध्ययन कर सकते हैं । 562 कांच की आलमारियों में रखी इन पुस्तकों और ग्रंथों में निस्संदेह आपकी रुचि वाले विषय की पुस्तक ज़रूर होगी । एक बार इस नायाब भूमिगत वातानुकूलित पुस्तकालय को देखना तो बनता है ।आजकल लाइब्रेरी की देखभाल और संरक्षण का कार्य जगदंबा सेवा समिति कर रही है.

यह भूमिगत पुस्तकालय देख मुझे अनायास अमेरिका के कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले परिसर से गार्डनर मेन स्टैक्स के रूप में एक विशाल भूमिगत पुस्तकालय की याद हो आयी. यह डो मेमोरियल लाइब्रेरी और मोफिट लाइब्रेरी के पास ज़मीन के नीचे स्थित है. यह चार मंज़िला भूमिगत परिसर कंक्रीट और स्टील से बना है. इसमें लाखों किताबें और शोध सामग्री सुरक्षित रखी गयी है. यहां छात्रों के पढ़ने के लिए शांत कमरे और डेस्क बने हैं. प्राकृतिक रोशनी के लिए इसमें बड़े बड़े रोशनदान भी लगाए गए हैं. 1979 में मैं वहां गया था तो पहली बार मुझे बेर्कले में अहसास हुआ था कि बेसमेंट का इस्तेमाल किस तरह रचनात्मक ढंग से किया जा सकता है । अब जब भादरिया लाइब्रेरी देखी तो लोगों की एक जैसी सोच पर यकीन हो गया. इस लाइब्रेरी की योजना बनाते समय भादरिया महाराज ने कुछ यूरोपीय देशों का दौरा अलबत्ता किया था लेकिन बेर्कले की भूमिगत लाइब्रेरी देखी थी कि नहीं इसकी पुष्टि नहीं हो सकी. वैसे पोलैंड की राजधानी वारसा के कांद्राटोविज़ा मेट्रो स्टेशन के भीतर एक लाइब्रेरी है. यहां से पाठक सेल्फ सर्विस से किताबें ले और लौटा सकते हैं. यहां एक हरा भरा गार्डन भी है जो ताज़ा वातावरण प्रदान करता है. यह केवल एक पुस्तकालय नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक और शैक्षणिक केंद्र है. इसकी जानकारी प्रो. मारिया क्षिष्टोफ बैरस्की ने 1977 में मुझे दी थी जब मैं पोलैंड की यात्रा पर था. उन्होंने यह भी बताया कि राजधानी वारसा में एक राष्ट्रीय पुस्तकालय भी है. वह देश का सबसे बड़ा और प्रमुख सांस्कृतिक व अनुसंधान संस्थान है जहां दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ, शुरुआती मुद्रित पुस्तकें, नक्शे, संगीत और लाखों किताबें शामिल हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त प्रो बैरस्की ने दो बरस तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी था. वह संस्कृत के विद्वान हैं . प्रो. बैरस्की धाराप्रवाह हिंदी बोलते हैं जिसे सुनकर यह अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि वह भारतीय हैं कि विदेशी. पद्मश्री से सम्मानित प्रो बैरस्की 1993 से 1996 तक भारत में पोलैंड के राजदूत भी रह चुके हैं.                                                                                                     ….. …..….(अगले अंक में जारी)                                                           *(Bhadaria Mata Mandir pic credit-patrika.com)

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