भारत के विभाजन की घटनाओं को देखने का नया नज़रिया है ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’
राजधानी दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार विवेक शुक्ला की नवीनतम पुस्तक ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ की समीक्षा (6 भाग में) के साथ दिनमान पत्रिका एवं संडे मेल के भूतपूर्व कार्यकारी संपादक त्रिलोक दीप.
‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ पुस्तक मिली. धन्यवाद विवेक. पुस्तक पूरी पढ़ गया हूं पहले पन्ने से
आखिरी पन्ने तक. वैसे भी मुझे 1947 और 1984 की घटनाएं/दुर्घटनाएं ज़ज़्बाती कर जाती हैं. विवेक की इस पुस्तक के हर अध्याय से मैं अपने आपको जुड़ा हुआ महसूस करता हूं. वह इसलिए कि विभाजन की पहली झलक हमने मार्च, 1947 में ही देख ली थी पंद्रह दिनों तक घर से बेघर होकर फौज के संरक्षण में कैंप में रहकर. वह हमारे ‘शरणार्थी’ होने का पहला अनुभव था. क्योंकि हम लोग रावलपिंडी के तोपखाना बाजार जैसे कैंट एरिया में रहते थे, फौज की देखरेख में हम ‘मेहफ़ूज़’ थे लेकिन शहर के भीतर अच्छा खासा कोहराम मचा था, मारकाट और लूटपाट भी हुई थी. यह जानकारी हमारा डेनीज़ स्कूल खुलने पर सदर, मरीड़, राजा बाजार जैसी जगहों में रहने वाले हमारे सहपाठियों ने दी थी. विवेक के पिता श्री गोपाल कृष्ण शुक्ला भी उसी स्कूल में पढ़ते थे और ‘आउटलुक’ पत्रिका के संस्थापक संपादक विनोद मेहता भी. विवेक के पिता मुझसे सीनियर थे. पुस्तक से पता चलता है कि विभाजन के समय वह रावलपिंडी के प्रसिद्ध गॉर्डन र्कॉलेज में अध्ययन कर रहे थे जो वहां का ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित कॉलेज था.इस कॉलेज के प्रिंसिपल रहे प्रो. ख्वाजा मसूद ने मुझे बताया कि उनके कॉलेज में सभी धर्मों और सम्प्रदायों
के छात्र बहुत मेहनती,मेधावी और अनुशासित हुआ करते थे. 1990 में मैं प्रो. मसूद से इस्लामाबाद में उनके घर पर मिला था. वह और भीष्म व बलराज साहनी उनके पक्के ‘यार’ थे और मिलजुल कर एक पत्रिका निकालते थे ‘लोटस’.
रावलपिंडी आज पाकिस्तान का प्रमुख और ऐतिहासिक शहर है. यहां सेना का मुख्यालय है जिसकी वजह से इसे ‘आर्मी सिटी’ भी कहा जाता है. यह पंजाब का तीसरा सबसे बड़ा और आबादी के लिहाज़ से पाकिस्तान का चौथा सबसे बड़ा शहर है. इस्लामाबाद के पास स्थित होने से ये दोनों ‘जुड़वा शहर’ कहलाते हैं. रावलपिंडी 1959 से 1967 तक पाकिस्तान की राजधानी भी रहा. रावलपिंडी के निकट ही सिखों का प्रसिद्ध पंजा साहब गुरुद्वारा है और तक्षशिला का ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल भी.

बताया जाता है कि यहीं कभी चाणक्य, चन्द्रगुप्त मौर्य और व्याकरणचार्य पाणिनि ने शिक्षा ग्रहण की थी. इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी घोषित किया गया है. पाकिस्तान का हिल स्टेशन मरी भी रावलपिंडी के नज़दीक है. विभाजन से पहले वैष्णो देवी माता का दर्शन करने के लिए रावलपिंडी से ही श्रद्धालु जाते थे |
विवेक शुक्ला की किताब की यह शुद्ध समीक्षा नहीं है बल्कि उनके द्वारा प्रस्तुत जानकारियों का कुछ हद तक विस्तार है जिन्हें पूरक जानकारी भी कह सकते हैं.विवेक बहुत ही परिश्रमी, विवेकशील,अध्ययनशील,गहन चिंतक और खोजी पत्रकार हैं जिसकी मैं सदा प्रशंसा और सराहना करता रहता हूं पत्रकारिता के हर मंच पर |

मैंने ‘दिनमान’ पत्रिका के संस्थापक संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के साथ काम किया है. मुझे याद है कि हम जब भी अपना कोई संवाद लिखकर उन्हें दिखाते, वह उसमें कोई न कोई नयी और अतिरिक्त जानकारी जोड़ दिया करते थे .’दिनमान’ से उनके विदा हो जाने के बाद भी मुझे उनका आशीर्वाद मिलता रहा. करीब 23 वर्षों तक मुझे उनका स्नेह मिला. लिहाज़ा उनसे प्राप्त जानकारियों को मैं यदाकदा साझा करता रहता हूं |– त्रिलोक दीप. (….अगले अंक में जारी)
