शिमला समझौते के चश्मदीद गवाह थे पीलू मोदी !
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-3)
अचानक पता चला कि हिमाचल भवन में इलेक्ट्रिक टाइपराइटर नहीं है. वह ओबेराय क्लार्कस होटल से मंगाया गया. इस बीच मेहमानों और पत्रकारों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. मैं अपने आप को रोक न सका और कहा कि यह संभवतया पहली संधि है जिसपर ओबेराय क्लार्कस होटल की स्टेशनरी पर दस्तखत हुए. क्योंकि पाकिस्तान सरकार की सरकारी सील गलती से वहां के भारी सामान के साथ पैक होकर चली गयी थी | लिहाज़ा दोनों तरफ से बिना सरकारी मोहर के दस्तखत हुए. संधि पर हस्ताक्षर होने के बाद खूब शोरशराबा था. इस बीच कोई ऊँची आवाज़ में पूछ रहा था कि आल इंडिया रेडियो और फिल्म्स डिवीज़न कहां हैं जबकि दुनिया भर के पत्रकार यहां जमा हैं. उन्हें बार बार बुलाया गया. मुझे नहीं लगता कि आल इंडिया रेडियो और फिल्म्स डिवीज़न ने समय पर इसे कवर किया हो. उ
स दिन तो कमाल हो रहा था. लगता है सभी नौकरशाहों के हाथ पांव फूल गए थे. संधि पर विधिवत हस्ताक्षर करने के लिए टेबलों को जोड़ा जा रहा था तो कहीं नौकरशाह उनपर टेबल क्लॉथ बिछा रहे थे. जब संधि पर हस्ताक्षर करने का समय आया तो भुट्टो की सरकारी कलम सूखी पायी गयी और उन्होंने किसी से कलम उधार लेकर दस्तखत किए. उसके बाद भुट्टो श्रीमती गांधी को उनकी कार तक छोड़ने के लिए गए. लौटकर मुझे और वीना से बोले, चलो संधि को सेलिब्रेट किया जाए. हम सब उनके कक्ष में पहुंच गए.
ज़ुल्फिकार अली भुट्टो बेशक बहुत राहत महसूस कर रहे थे. उन्होंने मुझे संधि की प्रति देकर मेरी राय मांगी. उस समझौते को देखने वाला मैं तीसरा व्यक्ति था.पहले तो मैं सरसरी निगाह से उसे देख गया फिर उससे उत्पन्न होने वाली संभावित पेचीदगियों को ध्यान में रखते हुए उसे गंभीरता से पढ़ा. मुझे संधि ठीक ही लगी. मैंने इतना भर कहा कि दोनों देशों के बीच शांति स्थापित हो, इससे बढ़कर और क्या अच्छी बात हो सकती है.इधर मैं संधि पढ़ रहा था और बाहर तीन सौ के आसपास पत्रकार संधि की प्रति पाने को बेकरार हो रहे थे. 2 जुलाई, 1972 को भुट्टो और श्रीमती गांधी ने शिमला समझौते पर रात करीब 11 बजे दस्तखत किए थे. पत्रकारों को अगले दिन यानी 3 जुलाई को 9.30 बजे सुबह बुलाया गया. भुट्टो ने मुझसे इस शांति समझौते पर होने वाले ‘बवाल’ से निपटने पर भी चर्चा की. उन्हें धुर कट्टरपंधियों के विरोध का खतरा था और कुछ ऐसे आलोचकों का भी जो 1965 के ताशकंद समझौते और शिमला समझौते को एक धरातल पर रखकर देखते हैं. हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि पाकिस्तान और भारत दोनों जगह इस शांति संधि का विरोध करने वालों की एक जमात ज़रूर पैदा हो जाएगी. भुट्टो के लिए अब विभाजित पाकिस्तान के लोगों में पुन: विश्वास की भावना पैदा करना आसान काम नहीं था. उसका एक भाग उससे अलग हो चुका
था और 93 हज़ार सैनिक भारत में युद्धबंदी थे. उस मुल्क के लिए इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है. युद्धबंदियों के परिवारों का दबाव अलग से था. ऐसी प्रतिकूल परिस्थितयों के बावजूद भारत से सम्मानजनक शांति समझौता बेशक पाकिस्तान के लिए एक उपलब्धि थी. लेकिन क्या इस समझौते का दोनों देशों में स्वागत हुआ! शायद नहीं.
शिमला समझौते की मुख्य बातें हैं:
भारत और पाकिस्तान सरकार ने संकल्प लिया है कि दोनों देश उन संघर्षों और टकरावों को समाप्त करेंगे जिन्होंने अब तक उनके संबंधों को प्रभावित किया है और उपमहाद्वीप में मैत्रीपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देने तथा स्थायी शांति की स्थापना के लिए काम करेंगे ताकि दोनों देश अब से अपने संसाधनों और ऊर्जा को अपने लोगों के कल्याण को आगे बढ़ाने के महत्वपूर्ण कार्य में लगा सकें. दोनों देशों की सरकारों के बीच सहमति के अनुसार अपने मतभेदों को शांतिपूर्ण साधनों के माध्यम से द्विपक्षीय वार्ताओं या किसी अन्य शांतिपूर्ण साधन से सुलझाने के लिए संकल्पित हैं जिस पर वे आपस में सहमत हों. दोनों देशों के बीच किसी भी समस्या के अंतिम समाधान तक, कोई भी पक्ष एकतरफा तरीके से स्थिति को नहीं बदलेगा और दोनों देश शांति और सामंजस्यपूर्ण संबंधों को बनाए रखने के लिए हानिकारक किसी भी कार्य के आयोजन, सहायता या प्रोत्साहन को रोकेंगे.
दोनों देश शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता का सम्मान तथा एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं. पिछले 25 वर्षो से दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करने वाले मूल मुद्दों और संघर्ष के कारणों को शांतिपूर्ण साधनों से सुलझाया जाएगा.
संयुक्तराष्ट्र के अधिकारपत्र के अनुसार दोनों देश एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल के प्रयोग या धमकी से बचेंगे और संप्रभु समानता का सम्मान करेंगे.
दोनों सरकारें अपनी शक्ति के भीतर सभी कदम उठाएंगी ताकि एक दूसरे के खिलाफ शत्रुतापूर्ण प्रचार को रोका जा सके. दोनों देश ऐसी जानकारी के प्रसार को प्रोत्साहित करेंगे जो उनके बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों के विकास को बढ़ावा दे. दोनों देशों के बीच संबंधों को धीरे धीरे पुर्नस्थापित और सामान्य बनाने के लिए, यह सहमति हुई कि संचार, डाक, तार, समुद्री, स्थल, सीमा चौकियों सहित और हवाई लिंक,जिसमें उड़ानें भी शामिल हैं, को फिर से शुरू करने के लिए कदम उठाए जाएंगे.एक दूसरे देश के नागरिकों के लिए यात्रा सुविधाओं को बढ़ावा देने के लिए उचित कदम उठाए जाएंगे.
स्थायी शांति की स्थापना की प्रक्रिया शुरू करने के लिए, दोनों सरकारें इस बात से सहमत हैं कि भारतीय और पाकिस्तानी सेनाएं अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के अपनी अपनी ओर वापस ले ली जाएंगी. जम्मू और कश्मीर, 17 दिसंबर, 1971 को युद्धविराम के बाद की नियंत्रण रेखा का दोनों
पक्षॉ द्वारा सम्मान किया जाएगा, बिना किसी पक्ष की मान्य स्थिति को प्रभावित किए. कोई भी पक्ष इसे एकतरफा तरीके से बदलने का प्रयास नहीं करेगा, चाहे आपसी मतभेद और कानूनी व्याख्याएँ कुछ भी हों. दोनों पक्ष आगे यह वचन देते हैं कि वे इस रेखा का उल्लंघन करते हुए बल के प्रयोग या धमकी से बचेंगे.
यह वापसी इस समझौते के लागू होने के साथ शुरू होगी और इसकी 30 दिनों की अवधि के भीतर पूरी कर ली जाएगी. यह समझौता दोनों देशों द्वारा उनकी संवैधानिक प्रक्रियाओ के अनुसार अनुसमर्थन के अधीन होगा और उस तारीख़ से लागू होगा जब अनुसमर्थन के दस्तावेजों का आदान प्रदान होगा. ——–.. त्रिलोक दीप .
….. …..….(अगले अंक में जारी)
