‘मैंने तीन सदियाँ देखी हैं—-!’
….वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री त्रिलोक दीप का अविभाजित गुजरात एवं रावलपिंडी से लोकसभा सचिवालय होते हुए जोधपुर एवं राजस्थान का सफरनामा…भाग-2
जोधपुर राजस्थान की व्यापारिक राजधानी है जो दुनिया भर के व्यापारियों को आकर्षित करती है. उत्कृष्ट हस्तशिल्प के समृद्ध संग्रह का रंगीन प्रदर्शन खरीददारों को लुभाता है. बंधेज का कपड़ा, काशीदाकारी की हुई चमड़े, ऊंट की खाल. मखमल आदि की जूतियां यहां के बाज़ारों में पायी जाती हैँ. भोजन के मामले में भी जोधपुर लाजवाब है. यहां का मिर्ची बड़ा तथा प्याज़ और मावे की कचौड़ी बहुत प्रसिद्ध हैं.मिर्ची बड़ा स्थानीय लोगों के साथ साथ बाहर से आने वालों को भी खूब रुचता है.एक मिर्ची बड़ा के ऊपर-नीचे डबल रोटी के दो पीस खाने से पूरा नाश्ता हो जाता है. नई सड़क का जनता स्वीट्स और रावत आपको हमेशा भरे मिलेंगे।
यहां तीन किस्म की कचौडियां उपलब्ध हैं, प्याज वाली, दाल वाली और मावा वाली.
कचौडियों की क्रेज के बारे में वहां एक किस्सा मशहूर है. एक बार मुंबई से उड़कर एक विमान को सीधे दिल्ली जाना था लेकिन पायलट को जोधपुर की कचौडियां बहुत पसंद थीं.उसने जोधपुर एयरपोर्ट पर अपने किसी सहयोगी को फ़ोन करके जनता स्वीट्स से बक्सा भर कचौडियां लाकर रखने की हिदायत देते हुए कहा कि मुंबई से दिल्ली जाने वाले विमान को वह वाया जोधपुर लाएगा, सवारियां नहीं उतरेंगी वह काकपिट में कचौडियां पहुंचा दे. सहयोगी ने अपने पायलट के हुक्म की तामील की और उसके बाद विमान दिल्ली के लिए उड़ गया.पायलट के साथ दिल्ली में एयरलाइंस के अधिकारियों ने क्या सलूक किया, उस बाबत यही सुनने में आया कि यह सभी लोगों की मिलीभगत थी, क्योंकि सभी को जोधपुर की कचौडियां बहुत पसंद हैं.
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जोधपुर से पाली जाते हुए रास्ते में रोहट पड़ता है.वहां की कचौडियां भी मशहूर हैं लेकिन जोधपुर जितनी नहीं. एक तो उनका साइज़ छोटा होता है और स्वाद भी जोधपुर की कचौडियों जैसा मुझे नहीं लगा. लेकिन स्थानीय लोगों को बहुत पसंद हैं।
रोहट से पाली की तरफ जाते हुए रास्ते में एक स्थान पर मोटरसाइकिल की पूजा आराधना होती देख मैं ठिठक गया. वहां पूछने पर पता चला कि ओम बन्ना (पूरा नाम ओम सिंह राठौड़) नामक एक राजपूत 2 दिसंबर, 1988 क़ो अपनी रॉयल एनफील्ड बुलेट पर सवार होकर अपनी ससुराल बगड़ी से अपने गांव चोटिला लौट रहा था कि उसकी बाइक एक पेड़ से टकरा गयी जिससे मौके पर ही उसकी मौत हो गयी. दुर्घटना के बाद स्थानीय पुलिस उसकी बुलेट को ज़ब्त करके थाने ले गयी. लेकिन अगले दिन वह बाइक रहस्यमय तरीके से थाने से गायब होकर उसी दुर्घटनास्थल पर पहुंच गयी.
इस चमत्कार से प्रभावित होकर ग्रामीणों और पुलिस ने इसे दैवीय शक्ति माना और उसी स्थान पर उनकी बाइक की पूजा शुरू हो गयी. आ
ज इस स्थान को ‘बुलेट बाबा मंदिर’ के नाम से जाना जाता है. ड्राइवरों और यात्रियों का विश्वास है कि ओम बन्ना सड़क पर उनकी रक्षा करते हैं और इस रास्ते से गुजरने वाले लोग सुरक्षित यात्रा की मन्नत मांगने के लिए वहां रुकते हैं. यह स्थान पाली से 20 और जोधपुर से 53 किलोमीटर दूर है.स्थानीय लोगों का मानना है कि इस बाइक में ओम बन्ना की आत्मा से युक्त ‘दिव्य’ और ‘दैवीशक्ति’ का प्रवेश हो गया है लिहाज़ा यह मोटरसाइकिल पूजनीय हो गयी है.अब वहां उसकी विशेष वार्षिक पूजा होती है जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। पूजा के दिन वहां अच्छा खासा मेला जुड़ता है. जिस तरह से मंदिरों के बाहर पूजा अर्चना के सामान से युक्त दुकानें होती हैं वैसी दुकानें यहां भी खुल गयी हैं.
राजस्थान में पाली ज़िले का ऐतिहासिक महत्व इस मायने में है कि यह मारवाड़ साम्राज्य का हिस्सा रहा है और पालीवाल ब्राह्मणों का निवासस्थान था. मुगलों के अत्याचारों से तंग आकर उन्हें यह शहर छोड़कर भागना पड़ा. वीर योद्धा महाराणा
प्रताप का जन्म पाली के पास कुम्भलगढ़ किले में हुआ था. बताया जाता है कि महाभारत युग में पांडव भी अज्ञातवास के दौरान कुछ समय तक यहां की एक तहसील बाली के पास छुपे थे. वर्तमान में पाली एक औद्योगिक नगर कहलाता है. यहां का रंगाई-छपाई और सूती वस्त्र उद्योग बहुत प्रसिद्ध है. पाली से करीब 15 किलोमीटर दूरी पर स्थित है जाडन गांव.
वहां 250 एकड़ (एक वर्ग किलोमीटर से कुछ अधिक) में बना है ‘ओम आश्रम’. यह दुनिया का पहला और एकमात्र ओम के आकार में बना भव्य शिव मंदिर एवं आध्यात्मिक केंद्र है. इस आश्रम के बारे में दरअसल मुझे समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया ने बताया था.उन दिनों मैं उनके एक एनजीओ डालमिया सेवा ट्रस्ट द्वारा मारवाड़ में आयोजित चिकित्सा शिविरों के निरीक्षण के लिए उनके प्रतिनिधि के तौर पर जाया करता था.
जोधपुर में अपने कुछ मित्रों की सहायता से जब मैं जाडन पहुंचा तो इस आश्रम में मैंने स्कूल,कॉलेज,अस्पताल, गौशाला, बरसाती पानी को एक तालाब में एकत्रित कर कई प्रकार की फसलें उगाई जाने वाली प्रक्रिया को देखा। मरुस्थल में पानी की कमी की प्रतिपूर्ति को जल संचयन का यह बेहतर तरीका माना जाता है.’ओम आश्रम’ का निर्माण प्रकृति का संरक्षण है, धरती को बंजर होने से बचाना है,लोगों को इस तथ्य से भी अवगत कराना है कि क्लोराइड और वॉशिंग पाउडर का पानी धरती के लिए कितना नुकसानदेह है. इसी प्रकार यूरिया का इस्तेमाल भी धरती की उर्वरता के लिए घातक है. यही कारण है कि कल जो भूमि साल में तीन-तीन फसलें दिया करती थी आज मुश्किल से एक या दो से अधिक नहीं दे पाती. कुदरत के साथ खिलवाड़ का असर सभी प्रकार की जिंदगियों पर पड़ता है इंसानों और जानवरों पर एक समान.अलावा इसके पर्यावरण,विश्व शांति,शिक्षा,योग और वैदिक संस्कृति को बढ़ावा देने, संस्कृतियों और धर्मों में शांति और समझ के विकास तथा आरोग्यता के संरक्षण को ‘ओम आश्रम’ अपना मूलमंत्र मानता है. निस्संदेह ऐसे विचार सराहनीय हैं-समाज और देश दोनों के लिये. इस मूलमंत्र का ही भाग है ‘ओम आश्रम’ का दिव्य आकार जहां सभी प्रकार की हस्तकला, वास्तुकला और शिल्पकला के अद्वितीय व अलौकिक नमूने देखने को मिलेंगे. वहां पहुंचने पर कुछ ऐसा महसूस होता है जैसे आपके भीतर कुछ
अलौकिक दिव्य तरंगें और ब्रह्मांडीय ऊर्जा प्रवेश कर गयी है.
मुझे ‘ओम आश्रम’ के निर्माण के विभिन्न प्रक्रमों को देखने का कई बार सौभाग्य प्राप्त हुआ जिसे विश्व दीप गुरुकुल स्वामी महेश्वरानंद आश्रम शिक्षा एवं शोध केंद्र, जाडन का अंग माना जाता है. यह विश्व गुरु महामंडलेश्वर परमहंस स्वामी महेश्वरानंद पुरी महाराज की सरपरस्ती,मार्गदर्शन और आशीर्वाद से दिसंबर, 1994 में स्थापित हुआ। इस आश्रम के बीचो-बीच चार खंडों वाला एक मंदिर बना हुआ है । इसका एक भूखंड धरती के नीचे है और तीन ऊपर ।भूगर्भ में स्वामी माधवानंद की समाधि है जिसके चारों तरफ सप्तऋषियों की मूर्तियां हैं । मैंने मंदिर देखने आने से पहले स्वामी योगेश पुरी से बात कर ली थी जिन्हें इस पूरी योजना का प्रमुख वास्तुशिल्पी माना जाता है। उनकी कुटिया गेट से प्रवेश करते ही दाईं तरफ है । साढ़े छह फ़ूट लंबे बहुत ही खूबसूरत गेरुआ वस्त्रधारी स्वामी योगेश पुरी से जब मैं मिला तो उन्हें एकटक देखता ही रह गया।मैं उनके सामने बौना-सा लग रहा था। (….अगले अंक में जारी)
