‘मैंने तीन सदियाँ देखी हैं ..!’
….वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री त्रिलोक दीप का अविभाजित गुजरात, रावलपिंडी से लोकसभा सचिवालय होते हुए जोधपुर एवं राजस्थान का सफरनामा…भाग-I.
नई दिल्ली: मैं 1967 से राजस्थान जाता रहा हूं. उसकी दो वजह हैं : एक तत्कालीन राज्यपाल सरदार हुकम सिंह और दूसरे लोकसभा का ‘दिनमान’ के लिए चुनाव कवर करना. 1965 के आखिर तक तो मैं लोकसभा सचिवालय में कार्यरत था, कह सकते हैं कि तीसरी लोकसभा के साढ़े तीन बरस तक.
उन दिनों मैं कुछ समय तक तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह का निजी सचिव भी रहा था. वैसे मैं सरदार हुकम सिंह को मध्य 1956 से जानता था जब वे लोकसभा में उपाध्यक्ष थे. उन दिनों वे मास्टर तारा सिंह के अकाली दल में थे. उनसे मेरी करीबी 1958 में हुई थी जब मैंने उनके यात्रा संस्मरणों को अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद कर हिंदी की ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित कराना शुरू किया था. सरदार हुकम सिंह से मेरी यह निकटता 1972 में उनका राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद भी बनी रही.
चौथी लोकसभा का चुनाव भी बहुत दिलचस्प था. वह इसलिए कि भारत के पूर्व गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के नेतृत्व में अगस्त, 1959 में गठित स्वतंत्र पार्टी थी. वह जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी नीतियों और ‘लाइसेंस परमिट राज’ को समाप्त कर मुक्त अर्थव्यवस्था और निजी उद्यम की समर्थक थी. उसका मानना था कि समृद्धि केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के जरिये आ सकती है.उस पार्टी में के.एम. मुंशी, प्रो.एन.जी. रंगा और मीनू मसानी जैसे पुराने कांग्रेसी नेता शामिल थे. धीरे धीरे उस पार्टी में भूतपूर्व राजे-महाराजे और नवाब भी जुड़ गए विशेष तौर पर 1971 में प्रिवी पर्स की समाप्ति के बाद. 1962 के लोकसभा चुनाव में उसने करीब 8 प्रतिशत मत प्राप्त कर 494 वाली लोकसभा में 18 सीटें जीतीं जबकि 1967 में 520 सदस्यीय लोकसभा में 44 सीटें. जयपुर से महारानी गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी की टिकट पर जीतीं जबकि बीकानेर से महाराजा कर्णी सिंह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर. नरसिंहगढ़ के महाराजा भानुप्रकाश सिंह भी स्वतंत्र पार्टी में शामिल नहीं हुए. स्वतंत्र पार्टी ने राजस्थान, गुजरात,मध्यप्रदेश और ओड़िसा में अच्छी सफलता प्राप्त की.
मैंने जयपुर, टोंक, झुंझुनू और पाली की कुछ चुनावी सभाएँ देखीं. उनमें बड़ी संख्या में वोटर्स राजघराने के राजाओं और महारानियों को देखने के लिए आते थे. धीरे धीरे उनकी यह क्रेज़ जाती रही और 1974 में पीलू मोदी की अध्यक्षता वाली उस पार्टी के भारतीय लोकदल में विलय के साथ इसका अस्तित्व समाप्त हो गया. 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौते के बाद पीलू मोदी ने स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर एक प्रेस कांफ्रेंस की थी.
पीलू मोदी से मेरे अच्छे संबंध थे. एक बार मैंने उनसे पूछा कि स्वतंत्र पार्टी का विघटन इतनी जल्दी क्यों हो गया? उनका उत्तर था क्योंकि आम लोगों ने देख और समझ लिया कि उनकी समस्याएं राजे-महाराजे समझते नहीं हैं और दूसरे उन तक पहुंचना भी आसान बात नहीं है. स्वतंत्र पार्टी के नेताओं तक आम वोटर की पहुँच नहीं हो पाती थी जिसकी वजह से आमजन उस पार्टी से दूर होता चला गया और उसने कांग्रेस पार्टी को तरजीह दी. उन्होंने यह नहीं बताया कि स्वतंत्र पार्टी के विघटन का कारण आंतरिक कलह, नेताओं के बीच वैचारिक और व्यक्तिगत टकरावों में वृद्धि, चुनावी रणनीतियों की असफलता और इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ नारे के सामने इस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा.
पीलू मोदी 1967 और 1971 में गुजरात के गोधरा से चुने गए थे. 1978 से 1983 अपने अंतिम समय तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे. जयपुर में ‘राजस्थान पत्रिका’ के मालिक कर्पूर चंद्र कुलिश, उनके बेटे मिलाप कोठारी, प्रमोद भसीन, ओम सैनी, महेश झालानी जैसे मित्र और शुभचिंतक मिल गए जिन्होंने आगे चलकर मेरी बहुत सहायता की.
जोधपुर में मैं अधिक बार आया हूं. शुरुआत तो लोकसभा चुनाव कवर करने से हुई थी. बीच में कुछ प्रायोजित यात्राएं भी हो गयीं और 1992 में हम लोग यानी मैं और मेरी पत्नी पैलेस ऑन व्हील्स से सफर करते हुए जोधपुर आये थे. हमें बताया गया कि रा
व जोधा ने 1459 में आधुनिक जोधपुर शहर की स्थापना की थी.यह राजस्थान का दूसरा महानगर है. जोधपुर थार रेगिस्तान के बीच अपने ढेरों शानदार महलों, दुर्गों और मंदिरों वाला प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है. यहां साल भर चमकते सूर्य वाले मौसम के कारण इसे ‘सूर्य नगरी’ भी कहा जाता है. यहां स्थित मेहरानगढ़ दुर्ग को घेरे हुए हज़ारों नीले मकानों के कारण इसे ‘नीली नगरी’ के नाम से भी जाना जाता है.
पुराने शहर का अधिकतर भाग इस दुर्ग को घेरे हुए बसा है जिसकी प्रहरी दीवार में कई द्वार बने हुए हैं. मेहरानगढ़ दुर्ग पथरीली चट्टान पहाड़ी पर, मैदान से 125 मीटर ऊंचाई पर है. आठ द्वारों और अनगिनत बुर्जो से युक्त यह शहर दस किलोमीटर लंबी ऊँची दीवार से घिरा है. आम तौर पर बड़े शहरों में दिन भर लक्जरी बसों से नगर दर्शन कराया जाता है और लंच किसी पांच सितारा होटल में. यह भी बताया गया कि जोधपुर शहर के भीतर के ज़्यादातर मकानों की पुताई नीले रंग में ही करायी जाती है.पहले ये सभी नीले मकान ब्राह्मणों के हुआ करते थे ,अब दूसरी जातियों के भी हैं .लंच हमने उमेद भवन पैलेस में किया जो जोधपुर की शान है .आधे महल में होटल है और आधे भाग में पूर्व महाराजा गजसिंह अपने परिवार के साथ रहते हैं.उसकी भव्यता और सुंदरता देखते ही बनती है. यह महल मेरे मन में घर कर गया और दिल के किसी कोने में यहां रहने की इच्छा जागृत हहो गयी.जी हां,यह वही उमेद भवन पैलेस है जहां कई फिल्मी सितारों की शादियां शाही अंदाज़ में होती हैं.
लगता है कुदरत ने मेरे दिल की आवाज़ सुन ली. डालमिया सेवा ट्रस्ट नामक एनजीओ के अध्यक्ष समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया ने उनके ट्रस्ट द्वारा लगने वाले चिकित्सा शिविरों में उनका प्रतिनिधित्व करने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी.उस सिलसिले में मैंने शुरू में उमेद
भवन स्थित होटल को अपना ठौर बनाया था.मैं यहां सन 2000 में रहा था, पूरा एक साल. हर माह दो दिन के लिए यहां आकर ठहरता था. पूर्व महाराजा गजसिंह जी से भी मेरी मुलाकातें हुआ करती थीं.
बाद में ‘दैनिक भास्कर’ के तत्कालीन कार्यकारी संपादक ओम गौड़ की सलाह पर मैं ताज हरि महल होटल में शिफ्ट कर गया,क्योंकि वह शहर के बीच में है और लोगों से संपर्क करने में आसानी होती है. ओम गौड़ के अतिरिक्त ‘दैनिक भास्कर’ में ही संजय पांडेय, संगीता शर्मा और उनके पति मुकेशदत्त शर्मा से मुलाक़ात हुई थी. ‘राजस्थान पत्रिका’ में जहां मैं कुलिश जी और कमल कोठारी तथा उनके पुत्र प्रशांत कोठारी भी को जानता था वहीं मेरी जान पहचान कार्यकारी संपादक प्रदीप शेखावत और ज्ञानेश उपाध्याय से भी थी. ज्ञानेश जी आजकल दिल्ली से प्रकाशित ‘दैनिक हिंदुस्तान’ से जुड़े हैं. (….अगले अंक में जारी)
*(pics credit- rozanaspokesman.in and tusktravel.com)
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं संसदीय सचिवालय कार्यनुभव वाले श्री त्रिलोक दीप, देश की राजधानी दिल्ली के राजनीतिक क्षितिज पर एक चमकते हुए स्तंभ हैं। अविभाजित गुजरात के फलिया के गांव में जन्मे 90 वर्षीय त्रिलोक जी ने भारत के विभाजन को झेला और अपने अनुभवों को पत्रकारिता में समेटा है। ‘चढ़ता हुआ रंग’, ‘स्वप्न और परछाईं’, ‘ठंडा रेगिस्तान’ जैसे उपन्यासों और कहानी संग्रहों के अलावा उन्होंने संस्मरण के द्वारा पाकिस्तान, अमेरिका, यूरोप, मॉरीशस की यात्राओं के अनुभव एवं अपने वरिष्ठ नामी पत्रकारों एच एस वात्स्यायन अज्ञेय, रघुवर सहाय की जीवनी संकलन भी लिखे हैं। त्रिलोक दीप जी दिनमान पत्रिका एवं संडे मेल के संपादक भी रहे हैं। ऑल इंडिया रेडियो के प्रोग्राम निर्देशक त्रिलोक जी प्रतिष्ठित आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं कई मीडिया पुरस्कारों से नवाजे गये हैं….
‘मैंने तीन सदियाँ देखी हैं ‘, उनके 70 वर्ष के पत्रकार जीवन का सारांश (4 भाग में),
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वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं संसदीय सचिवालय कार्यनुभव वाले श्री त्रिलोक दीप, देश की राजधानी दिल्ली के राजनीतिक क्षितिज पर एक चमकते हुए स्तंभ हैं। अविभाजित गुजरात के फलिया के गांव में जन्मे 90 वर्षीय त्रिलोक जी ने भारत के विभाजन को झेला और अपने अनुभवों को पत्रकारिता में समेटा है। ‘चढ़ता हुआ रंग’, ‘स्वप्न और परछाईं’, ‘ठंडा रेगिस्तान’ जैसे उपन्यासों और कहानी संग्रहों के अलावा उन्होंने संस्मरण के द्वारा पाकिस्तान, अमेरिका, यूरोप, मॉरीशस की यात्राओं के अनुभव एवं अपने वरिष्ठ नामी पत्रकारों एच एस वात्स्यायन अज्ञेय, रघुवर सहाय की जीवनी संकलन भी लिखे हैं। त्रिलोक दीप जी दिनमान पत्रिका एवं संडे मेल के संपादक भी रहे हैं। ऑल इंडिया रेडियो के प्रोग्राम निर्देशक त्रिलोक जी प्रतिष्ठित आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं कई मीडिया पुरस्कारों से नवाजे गये हैं….