भारत के विभाजन की घटनाओं को देखने का नया नज़रिया है ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’
राजधानी दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार विवेक शुक्ला की नवीनतम पुस्तक ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ की समीक्षा (6 भाग में) के साथ दिनमान पत्रिका एवं संडे मेल के भूतपूर्व कार्यकारी संपादक त्रिलोक दीप. (भाग-2).
भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद के अज्ञेय साथी क्रांतिकारी थे तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस
की आज़ाद हिंद फौज की पूर्वोत्तर की उपस्थिति को उन्होंने करीब से देखा था. इन दोनों ने अपने अपने तरीके से समूचे देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी. भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद को अंग्रेज़ों से स्वतंत्र कराने की अपनी क्रांतिकारी शैली थी जबकि नेता जी की अपनी जुदा सोच और शैली. नेता जी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज (आई एन ए) जापानी सेना की सहायता से भारत को अंग्रेज़ों से आज़ाद कराना चाहते थे. अज्ञेय छह बरस तक क्रांतिकारी संगठन से जुड़े रहे जहां वह ‘साइंटिस्ट’ के नाम से प्रसिद्ध थे.वह क्रांतिकारियों के लिए विस्फोटक सामग्री दरियागंज के अपने क्रन्तिकारी साथी बिमल प्रसाद जैन की ‘दुकान’ की आड़ में बनाते थे. उन्होंने लाहौर के फोरमान कॉलेज में भौतिकशास्त्र और रसायनशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी और उनका लक्ष्य वैज्ञानिक बनना था. खैर वह क्रांतकारी संगठन से जुड़ गए. वह बताते थे कि भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की नेतृत्व क्षमता चरित्र और साथियों पर पूरा भरोसा रखने के साथ साथ चौकस और सतर्क रहने की भी थी. लाहौर के नेशनल कॉलेज में शिक्षित भगत सिंह को उनके प्राध्यापक उन्हें
पढ़ाकू मानते थे जो क्रांतिकारियों की जीविनियों के साथ साथ देश से जुड़ी खबरों को बड़े गौर से पढ़ते थे. उन्होंने कानपुर से प्रकाशित पेपर ‘प्रताप’ में क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ काम किया था. दोनों के बीच आत्मीय संबंध थे. उनका ऑफिस भगत सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था और उनका शराणालय भी.उन्होंने वहां रहते हुए पत्रकारिता भी की थी और ‘बलवंत’ उपनाम से वह लिखा करते थे. विद्यार्थी जी भगत सिंह को दुनिया भर की खबरों से भी रूबरू कराते थे. भगत सिंह बहुत जागरूक, जिज्ञासु और दूरदर्शी थे. विवेक शुक्ला ने अल्लामा मोहम्मद इक़बाल के 29 दिसंबर, 1930 के जिस भाषण का ज़िक्र किया है उसे भगत सिंह ने भी पढ़ा बताया जाता था विद्यार्थी जी की सहायता से शायद,जिसकी वजह से उन्हें इक़बाल से ‘विरक्ति’ हो गयी थी.
अज्ञेय अंग्रज़ी सेना में लड़ने के लिए शामिल नहीं हुए थे बल्कि उनका मकसद सेना और जनता के बीच तनाव रोकना था. जिसप्रकार जापानी सेना आगे बढ़ रही थी उसे रोकने के लिए अंग्रेजी फौज में सिर्फ गोरे सैनिक ही थे, हिंदुस्तानी नहीं. उन्हें शक था कि कहीं ये हिंदुस्तानी सैनिक आज़ाद हिंद फौज के साथ न मिल जाएं. अज्ञेय ने बताया था कि आज़ाद हिंद फौज के कुछ सैनिकों से उन्हें पता चला कि जापानी सेना की नीयत के प्रति वह सशंकित रहते थे और बार बार सुभाष बाबू जापानी सेना को उसकी ‘सीमा’ याद दिलाते रहते थे. जिस तरह से 7 दिसंबर, 1941 को जापान ने अमेरिका के पर्ल हार्बर नौसैनिक अड्डे पर हमला किया था उसके हौसले बुलंद हो गए थे और उसकी नज़र
अब हिंदुस्तान पर थी वाया आज़ाद हिंद फौज के. खैर अंग्रेज़ी फौजों ने जापानी सेना के मंसूबों पर पानी फेर दिया. अगर ऐसा हो जाता तो भारत के स्वतंत्रता संग्रामियों को अब जापान के खिलाफ भी कमर कसनी पड़ती.
आज़ाद हिंद फौज में मेजर जनरल रहे शाह नवाज़ खान से भी मेरी इस बाबत बातचीत हुई थी जब वह लोकसभा सदस्य थे. आप आज़ाद हिंद फौज से कैसे जुड़े के सवाल पर उन्होंने मुझे बताया था कि वह भारतीय सेना में कैप्टन थे और 1942 में सिंगापुर के पतन के बाद जापानियों द्वारा पकड़ लिए गए. वह सुभाष चंद्र बोस के राष्ट्रभक्ति के भाषाणों से बहुत प्रभावित हुए जिनमें युद्धबंदियों से भारतीय राष्ट्रीय सेना में शामिल होने और एक स्वतंत्र भारत के लिए लड़ने का आग्रह किया गया था. बेशक मैं उनके व्यक्तित्व और उनके भाषाणों से सम्मोहित हो गया था. उनके देशभक्तिपूर्ण भाषाणों से प्रभावित होकर 1943 में मैं आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो गया.बोस द्वारा गठित स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार की काबीना में भी रहा. उन्होंने बताया कि उन्हें पूर्वोत्तर भारत की ज़िम्मेदारी दी गयी लिहाज़ा जापान की मदद से उन्होंने कुछ समय के लिए कोहिमा और इम्फाल पर अधिकार कर लिया. क्या कभी आपको लगा कि हिंदुस्तान पर कब्ज़ा करने के बाद जापानी सेना अपने वादे से मुकर सकती है?थोड़ा सोचने के बाद शाह नवाज़ खान ने बताया कि कभी कभार वह लोग अपनी ‘अथॉरिटी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया करते थे. इसपर नेता जी उन्हें स्पष्ट कर जाते थे कि आप हमारी सहायता कर रहे हैं हमारे स्वतंत्रता संग्राम में, इसके आगे और बाद में आपकी कोई भूमिका नहीं.
शाह नवाज़ खान ने बताया कि आज़ाद हिंद फौज की नाकामयाबी के बाद उनपर ‘ब्रितानी सम्राट के खिलाफ युद्ध छेड़ने’ के आरोप में लाल किले में देशद्रोह का मुकद्दमा भी चला. हमारी तरफ से सर तेज बहादुर सप्रू, पंडित जवाहरलाल नेहरू,कैलाशनाथ काटजू,आसफ़ अली आदि जैसे वकीलों ने हमारा बचाव इस आधार पर किया कि हमें युद्धबंदी माना जाना चाहिए, क्योंकि हम भाड़े के सैनिक नहीं बल्कि एक वैध सरकार, स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार, या आज़ाद हिंद सरकार के वास्तविक सैनिक थे. मुकद्दमे के बाद 1946 में शाह नवाज़ खान ने घोषणा की कि वह अब गांधी जी के अहिंसा के मार्ग का अनुसरण करेंगे. मेजर जनरल शाह नवाज़ खान महात्मा गांधी और खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ शांति बहाल करने और नोआखली दंगा पीड़ितों को सहायता प्रदान करने वाले दल का हिस्सा थे. यह पूछे जाने पर कि यदि सुभाष बाबू जीवित होते तो क्या वह भारत का विभाजन स्वीकार करते तो शाहनवाज खान ने ज़ोरदार लहज़े में कहा था, ‘कतई नहीं. किसी कीमत पर नहीं.वह हर किसी से भिड़ जाते’. उन दिनों मैं लोकसभा सचिवालय में काम करता था.
24 जनवरी, 1
914 को रावलपिंडी ज़िले के गांव मटोर में एक पंजाबी जनजुआ राजपूत परिवार में जन्मे शाह नवाज़ खान बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ खान के पिता मीर ताज मोहम्मद खान के चचेरे भाई थे.वह मेरठ से चार बार लोकसभा के लिए चुने गए 1952,1957,1962 और 1971. वह पंडित जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी की सरकारों में मंत्री भी रहे. सरकार ने सुभाष चंद्र बोस
की मृत्यु से संबंधित परिस्थितियों की जांच के लिए शाह नवाज़ खान की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. इस समिति में सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस भी शामिल थे. सभी तथ्यों और साक्ष्यों की जांच के बाद समिति के दो सदस्य इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु 10 अगस्त, 1945 को ताइवान में एक विमान दुर्घटना में हुई थी. उन्होंने कहा कि उनकी अस्थियां जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी हैं जिन्हें भारत लाया जाना चाहिए. लेकिन नेता जी के भाई सुरेश चंद्र बोस समिति के निष्कर्षों से असहमत थे. 9 दिसंबर, 1983 को शाह नवाज़ खान का दिल्ली में देहांत हो गया. — त्रिलोक दीप. (….अगले अंक में जारी)
