मैंने तीन सदियाँ देखी हैं; ‘पहला वित्तीय घोटाला फिरोज गांधी ने उजागर किया था’: त्रिलोक दीप
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय त्रिलोक दीप (संडे मेल के भूतपूर्व कार्यकारी संपादक) भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-1)
8 सितम्बर, 1960 की बात है । लोकसभा का अधिवेशन चल रहा था ।अगस्त-सितम्बर का मानसून सत्र होता था।
उन दिनों तीनों सत्रों की समय सीमा निश्चित हुआ करती थी| दफ्तर जाने से पहले मैं करीब दस बजे सिंधिया हाउस स्थित एलाइड मोटर्स के शोरूम में गया । देखा तो वह बंद था ।
बाहर शीशे के दरवाजे पर एक पत्र चिपका था जिस पर लिखा था कि ‘फिरोज गांधी का निधन हो गया है इसलिए आज यह शोरूम बंद रहेगा।’ एलाइट मोटर्स में मैं अपने लम्ब्रेटा स्कूटर की स्थिति के बारे में जानने के लिए गया था । उन दिनों कुछ महत्वपूर्ण वस्तुओं की प्राप्ति के लिए अग्रिम बुकिंग करानी पड़ती थी ।वहां पर लम्ब्रेटा,लम्ब्रेटी और एम्बेसडर कार की बुकिंग होती थी ।लम्ब्रेटी तो मेरी आ गयी थी,लम्ब्रेटा स्कूटर का इंतज़ार था।लम्ब्रेटी साइकिल जैसी होती है जो पेट्रोल से भी चल सकती है और पेट्रोल खत्म होने पर उसे साइकिल की तरह भी चलाया जा सकता है ।
उन दिनों स्कूटर के नाम पर लम्ब्रेटा और वेस्पा थे तो कारों में एम्बेसडर,फीएट और स्टैंडर्ड । एलाइट मोटर्स के बाहर शीशे पर चिपके कागज़ पर फिरोज गांधी के निधन की खबर पढ़कर मेरा मन बहुत मायूस हो गया । इसलिए कि तीन दिन पहले ही तो मैं उनसे संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में मिला था और हमारी लंबी बातचीत हुई थी खुलकर । जब से सरदार हुकम सिंह के सौजन्य से फिरोज गांधी से मेरा परिचय हुआ था, केंद्रीय कक्ष में आते-जाते उनसे बात मुलाकात हो जाया करती थी।
फिरोज गांधी को मैं कैसे जानता था इस बारे में संक्षिप्त जानकारी मैं पहले दे चुका हूं । फिर भी जो लोग वह देखना/पढ़ना भूल गए हैं उनके लिए उसे दोबारा बता देता हूं । मैंने 1956 से 1965 तक लोक सभा सचिवालय में काम किया। करीब दस बरस-मोटा मोटी पहली लोकसभा से तीसरी लोकसभा तक । शुरू शुरू में मैं जिस सेक्शन में काम करता था उसका नाम है प्राइवेट मेंबर्स बिल्स ऐंड रेसुलूशंस ब्रांच अर्थात् पीएमबी।इसका काम था गैरसरकारी सदस्यों यानी सांसदों से प्राप्त विधेयकों और संकल्पों की भाषा और तथ्यों की जांच पड़ताल कर उन्हें सदन में बहस के योग्य बनाना ।
हर शुक्रवार दो से पांच बजे तक गैरसरकारी सांसदों के विधेयकों और संकल्पों पर बहस का दिन होता था ।एक हफ्ता विधेयकों पर बहस
होती थी और एक सप्ताह संकल्पों पर ।सांसद आम तौर पर अपने विधेयक और संकल्प ग्राउंड फ्लोर पर स्थित पार्लियामेंटरी नोटिस ऑफ़िस (पीएनओ) में छोड़ जाया करते थे जहां से वे हमारी ब्रांच में आ जाते ।कभी कभी सांसद हमारी ब्रांच में स्वयं भी आ जाया करते थे और हम लोगों से गपशप भी मारते थे ।बहुत खुला माहौल होता था उन दिनों ।
एक हफ्ते की कार्यसूची में छह विधेयक और छह ही संकल्प रखे जाते थे । कभी कभी तो एक ही विधेयक या संकल्प पर बहस हो पाया करती थी ।इन विधेयकों और संकल्पों की बहस के लिए समय आवंटित करने के लिए एक समिति थी ।नाम था कमेटी ऑफ़ प्राइवेट मेंबर्स बिल्स ऐंड रिसुलूशंस और उसके अध्यक्ष होते थे लोकसभा के उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर)।उन दिनों डिप्टी स्पीकर थे सरदार हुकम सिंह । इस समिति में 25 सदस्य होते थे । कमेटी की बैठक आम तौर पर शाम चार बजे होती थी ।जब कोरम पूरा हो जाता तो मैं सरदार हुकम सिंह को सदन से लेने के लिए चला जाता।
एक दिन मैं उन्हें एस्कार्ट करके उनके कक्ष की ओर ले जा रहा था कि कहीं से आवाज़ आयी ‘सरदार साहब’। सरदार हुकम सिंह को सांसद ऐसे ही संबोधित किया करते थे ।उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो एक सांसद तेज कदमों से उनके पास आये । सरदार साहब ने पूछा, ‘जी बतायें फ़िरोज़ गांधी जी!’ मुझे साथ देखकर पहले वह कुछ सकुचाये, फिर बोले,’ मुझे आप से बहुत ज़रूरी मिलना है आज ही।’ सरदार साहब ने बड़े सहज भाव से कहा कि इस मीटिंग के बाद आ जायें ।फिर मेरी तरफ मुड़ कर बोले,’कितना वक़्त लगेगा!’मैंने बताया कि ज़्यादा से ज़्यादा आध घंटा ।सरदार साहब ने मेरा परिचय फिरोज गांधी से कराते हुए कहा कि ‘यह नौजवान त्रिलोक दीप है, यहीं काम करता है और मेरे यात्रा संस्मरणों का अंग्रेज़ी से हिंदी और पंजाबी में अनुवाद करके छपवाता है ।मीटिंग खत्म होने के बाद यह आपको बता जाएगा ।’
फिरोज गांधी से यह मेरी पहली मुलाकात थी जो बज़रिया सरदार हुकम सिंह के हुई थी ।मीटिंग खत्म होने के बाद मैंने फिरोज गांधी
को बता दिया कि ‘सरदार साहब आपका इंतज़ार कर रहे हैं ।’
केंद्रीय कक्ष में एक कोना था जहां फिरोज गांधी,असम की महारानी मंजुला देवी तथा अन्य दो-तीन लोग बैठकर बातचीत किया करते थे ।इसे फिरोज गांधी कार्नर के नाम से जाना जाता था । यह कोना कॉफ़ी और चाय काउंटर से दूर था । सेंट्रल हाल के धुर कार्नर में था जहां हर कोई आने जाने से झिझकता था}
प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का दामाद होने के कारण फिरोज गांधी से सांसद बहुत ज़रूरी काम होने पर ही मिलते थे हालांकि फिरोज ने ऐसा कोई हौवा नहीं बना रखा था। फिरोज कार्नर आउटर लॉबी के नज़दीक था ताकि कोरम या डीविजन की घंटी उन्हें साफ सुनाई दे सके। लाइब्रेरी भी उनके कार्नर से ज़्यादा दूर नहीं थी । इसके अलावा यह कार्नर पंडित नेहरू की निगाह से भी दूर था । पंडित नेहरू दिन में दो-चार बार सेंट्रल हाल से गुजरते हुए राज्यसभा जाया करते थे ।
अब क्योंकि फिरोज गांधी से मेरा परिचय हो चुका था, वह भी सरदार हुकम सिंह के सौजन्य से, इसलिए एक दिन मैंने उनके कार्नर के पास जाने की हिम्मत की । मुझे देखकर वह स्वयं ही उठकर आ गये और बोले,’कोई खास बात!’
मैंने कहा कि आपसे एक लंबी बात करनी है उसके लिए आपको कब सुविधा होगी ।’किस विषय पर ।’उनका अगला सवाल था, आपकी संसदीय कार्यप्रणाली पर ।फिरोज कुशाग्र बुद्धि के थे,समझ गए मेरे मकसद को । एक-दो दिन में आपको बताता हूं ।आप मुझसे संपर्क रखियेगा
। फिरोज गांधी के निधन से तीन दिन पहले सेंट्रल हाल में उन्हीं के कार्नर में सुबह दस बजे बात हुई ।उनकी चौकड़ी तो ग्यारह बजे के बाद जमती थी ।
शिष्टाचार के नाते मैंने उनसे कांग्रेस पार्टी की उस हाई टी पार्टी का ज़िक्र किया जिसमें वह सांसदों से घिरे हुए थे । अचानक जब उनकी पीठ पर किसी ने हाथ मारा तो उस हाथ मारने वाले की तरफ देखकर मुस्कुरा दिए थे और फिर उनके साथ हो लिए थे । पीठ पर हाथ इंदिरा गांधी ने मारा था ।बाद में दोनों काफी देर तक एक साथ रहे । मैंने फिरोज गांधी को जब आंखों देखा यह दृश्य बयाना तो बोले, ‘आपने कहां से देख किया ‘। मैंने बताया कि तीसरी मंज़िल से। भई,वह मेरी बीवी है । मेरे दो बेटों की माँ है । वह पंडित जी के कामों में व्यस्त रहती हैं । हम लोग ऐसे ही कुछ समारोहों और आयोजनों में मिल लेते हैं । ये हम दोनों के बीच अंडरस्टैंडिंग है।आप असली मुद्दे पर आयें ।यकीनन आप मुझसे ‘इंदु’ और मेरे बीच के रिश्तों को लेकर बात करने के लिए नहीं आये होंगे ।
मैं भी अब अपने मुद्दे पर आ गया ।पूछा कि आजकल आप देश में व्याप्त भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में खासे मुखर हैं जिसकी वजह से कई धनी व्यक्तियों की पोल पट्टी खोल रहे हैं । सत्तापक्ष का सदस्य होने की भी आप परवाह नहीं करते ।कभी कभी तो आपको कांग्रेस का ‘विरोधी स्वर’ भी कहा जाता है ।अपनी खोजी शैली की वजह से किन्हीं धनी व्यक्तियों को आप जेल भी भिजवा चुके हैं ।आजकल कुछ धनी और रसूखदार ऐसे व्यक्ति भी हैं जो आपके राडार पर हैं जिनके तार सत्ता से जुड़े बताये जाते हैं ।आजकल वह आपके निशाने पर हैं ।
फिरोज गांधी बड़े साफगो इंसान थे ।उन्होंने कहा कि मैं बेवजह और बिना पुख्ता दस्तावेजों के किसी पर आरोप नहीं लगाता ।अपने विषय का लाइब्रेरी में बैठकर गहन अध्ययन करता हूं ।आप तो यहां काम करते हैं न,पूछ लीजिए पृथ्वीनाथ शकधर और सेठ साहब से ।मेरे चाहे मैटर पर वे फ़्लैग लगाकर देते हैं और उस मैटीरियल को मैं स्वयं सदन में ले जाता हूं । पृथ्वीनाथ शकधर यहां के संयुक्त सचिव (बाद में महासचिव) श्यामलाल शकधर के भाई हैं लेकिन उन्होंने अपनी काबिलियत से यहां के सांसदों के दिलों में अपना स्थान बना रखा है ।कई बार तो पंडित जी के साथ साथ मैंने उन्हें पुरानी डिबेटस की फ़ाइलें खोजते भी देखा है । .……त्रिलोक दीप .
…..….(अगले अंक में जारी)
