राजा महेंद्र प्रताप जिन्होंने काबुल में निर्वासित भारत सरकार के राष्ट्रपति के तौर पर तिरंगा फहराया
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (अंतिम भाग)
जापान सुभाषबाबू की मदद करने के लिए तैयार था । नेता जी वहां से सिंगापुर पहुंच गये जहां उन्होंने 11
अक्टूबर,1943 को स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार गठित की जिसके वह स्वयं ही राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने ।आज़ाद हिंद फौज के प्रधान सेनापति भी वही थे ।जापानी सेना ने अंग्रेज़ों की फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबंदियों को भर्ती किया। महिलाओं के लिए झांसी की रानी की रेजिमेंट भी बनायी गयी| नेता जी ने अपने भाषणों में भारतीय लोगों को आज़ाद हिंद फौज में भर्ती के होने और आर्थिक मदद देने का आवाहन किया: संदेश के साथ कि ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिंद फौज ने जापानी सेना के सहयोग से हमला कर अंग्रेज़ों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत कर अपनी अंतरिम सरकार स्थापित कर दी । सुभाषबाबू ने इन द्वीपों को नाम दिया ‘शहीद द्वीप’ और ‘स्वराज द्वीप’। इसके बाद दोनों फौजों ने इम्फाल और कोहिमा पर भी हमला कर दिया । यहां अंग्रेज़ों की रणनीति हावी रही जिससेदोनों सेनाओं को पीछे हटना पड़ा। इस युद्ध में दोनों तरफ से काफी बड़ी संख्या में सैनिक मारे गये ।
जब आज़ाद हिंद फौज पीछे हट रही थी तब जापानी सेना ने नेता जी के भाग जाने की व्यवस्था की लेकिन उन्होंने महिलाओं की झांसी की रानी रेजिमेंट के साथ सैकड़ों मील चलते रहना पसंद किया।6 जुलाई, 1944 को आज़ाद हिंद रेडियो पर सुभाषचंद्र बोस ने अपने एक भाषण में
गांधी जी को जापान से सहयता के कारणों के साथ ही आज़ाद हिंद फौज के उद्देश्य के बारे मेँ भी बताया । इस भाषण के अंत में नेता जी ने गांधी जी को ‘राष्ट्रपिता’ कहा और तभी गांधी ने सुभाष बाबू को ‘नेता जी’। ऐसे ही नेता जी ने पहले पहल ‘जय हिंद ‘ का नारा दिया था । राजा महेंद्र प्रताप ने मुझे यह जानकारी भी दी थी कि शुरू शुरू में नेताजी अफ़ग़ानिस्तान में आकर मेरे साथ आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहते थे लेकिन ऐन वक़्त पर उन्होंने अपना मन क्यों बदल लिया यह मेरी समझ से बाहर की बात है ।लगता है वह सोवियत संघ में भविष्य तलाशने के लिए बरास्ता मंचूरिया सोवियत संघ पहुंचना चाहते थे जो ब्रिटिश विरोधी हो गया था ।
इधर भारत में अंग्रेज़ शासकों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी । जापानी सेना पूर्व में भारतीय सीमा में प्रवेश कर चुकी थी । लिहाज़ा ब्रिटिश सरकार की नज़र उन लोगों पर गयी जिनकी देशभक्ति और विश्वसनीयता पूर्णता: प्रमाणित होती हो । ऐसे लोगों की फौज के पीछे शत्रु को
प्रतिरोध देने की ज़रूरत थी । सच्चिदनंद वात्स्यायन अज्ञेय को भी बुलावा आया यह जानते हुए भी कि यह ब्रिटिश सरकार के बागी रह चुके हैं और इनकी देशभक्ति संदेह से परे है । इन्होंने जैन्किंस जैसे अधिकारी को लाहौर जेल में थप्पड़ मारा था लेकिन जनता में प्रतिरोधी शक्ति के निर्माण में इनमें अद्भुत क्षमता है । तकनीकी तौर पर वह फौज में थे लेकिन मोर्चे पर लड़ने के लिए नहीं बल्कि जनमानस में जापानियों की ‘जीत’ से होने वाले खतरे से आगाह करने के लिये । उन्हें पूरी तरह से फौजी अनुशासन में रहना होता था ।अंग्रेज़ हैं तो चतुर रणनीतिकार। उन्होंने जापानी फौज का मुकाबला करने के लिए केवल गोरे सैनिकों को ही चुना, हिन्दुस्तानियों को अलग रखा गया शायद यह सोचकर कि कहीं ये आज़ाद हिंद फौज से न मिल जायें ।खैर, अंग्रेज़ी सेना ने जापानी सेना की मदद से आगे बढ़ रही आज़ाद हिंद फौज को कोहिमा से आगे नहीं बढ़ने दिया और वह उलटे पांव भाग खड़ी हुई ।
महेंद्र प्रताप अपने नाम के साथ राजा क्यों लिखते हैं इसका विशेष कारण है ।उनका जन्म 1 दिसंबर, 1886 को एक जाट परिवार में हुआ जो मुरसान रियासत के शासक थे । यह रियासत आज के उत्तरप्रदेश के हाथरस जिले में थी । वह राजा घनश्याम सिंह के तीसरे बेटे थे ।1902 में उनकी शादी बलबीर कौर से हुई जो जींद रियासत के कायस्थ परिवार की थीं । इनके पूर्वजों ने भी अंग्रेज़ों के साथ युद्ध किए थे ।अंग्रेज़ों से अजादी की सीख तो उन्हें अपने पूर्वजों से ही मिली । वह 1915 से 1946 तक विदेशों में रहकर ही आज़ादी की लौ जलाते रहे ।उन्होंने विश्व मैत्री संघ की स्थापना भी की ।खुली सोच वाले राजा महेंद्र प्रताप जाति ,धर्म, रंग, देश आदि को नहीं मानते थे ।वह शिक्षा को बहुत महत्व देते थे
।1909 में वृंदावन में अपने बेटे प्रेम के नाम पर उन्होंने प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की जो तकनीकी शिक्षा के लिए भारत का पहला केंद्र था और उसका उद्घाटन किया था मदन मोहन मालवीय ने । इसके संचालन के लिए एक ट्रस्ट बनायी गयी जिसे पांच गांव, वृंदावन का राजमहल और चल संपत्ति का दान दिया गया। इतना ही नहीं 1911 में उन्होंने वृन्दावन में ही 80 एकड़ में फैले एक फल उद्यान को आर्य प्रतिनिधि सभा,उत्तरप्रदेश को दान में दे दिया जिसमें आर्य समाज गुरुकुल है और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी ।इस महान दानवीर की स्मृति में 2021 को उत्तरप्रदेश सरकार ने अलीगढ़ में एक विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा की थी ।उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी नहीं है । जिन दिनों वह लोकसभा के सदस्य थे उनसे मिलने वाले जिज्ञासुओं की खासी भीड़ रहती थी क्योंकि वह अपने आप में एक संस्था थे और किंवदंती बन गये थे । प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के अतिरिक्त सभी पार्टियों के सांसद और मंत्री भी उनसे मिला करते थे । यहां तक कि इंदिरा गांधी भी विशेष तौर पर उनसे मिलने के लिए आयीं थीं संसद भवन में । तब वह लोक सभा की सदस्य नहीं थीं । भारत लौटकर वर्धा में राजा महेंद्र प्रताप ने महात्मा गांधी से मुलाकात भी की जिन्होंने उन्हें पुन: समाज सेवा में जुड़ने का परामर्श दिया था । इसी सलाह में उनका लोकसभा का चुनाव लड़ना भी निहित था । इस महान दानवीर और स्वधीनता सेनानी का 26 अप्रैल, 1979 को 92 साल की उम्र में नि
धन हो गया ।भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया । राजा महेंद्र प्रताप से मेरी यह लंबी बातचीत चिर स्मारणनीय रहेगी. वैसे जब तक वह लोकसभा के सदस्य रहे, सत्र के दिनों में उनसे सप्ताह में दो तीन बार मिलना हो ही जाता था कभी उनके किसी विधेयक या संकल्प को लेकर या उनके अनुभवों को सुनने के लिये. उन्होंने मुझे कभी निराश नहीं किया और न ही बार बार मिलने पर वह कभी झुनझुनाये. राजा महेंद्र प्रताप की मधुर स्मृति में मेरा सादर नमन. —-त्रिलोक दीप .
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