शिमला समझौते के चश्मदीद गवाह थे पीलू मोदी !
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (अंतिम भाग)
शिमला समझौते के बारे में विस्तृत जानकारी देने के बाद पीलू मोदी ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में बताया, “1946 में मैं अमेरिका की केलिफोर्निंया यूनिवर्सिटी के बर्कले में आर्किटेक्ट की डिग्री के लिए भर्ती हो गया. यहां भी ज़ुल्फी मेरे साथ था मेरा रूममेट. वह राजनीतिशास्त्र में पढ़ाई कर रहा था. आप कह सकते हैं कि ज़ुल्फी का और मेरा बचपन और कुछ हद तक जवानी के दिन एकसाथ गुज़रे. दोस्ती हम लोगों की पक्की थी लेकिन विचार अलग अलग. वह 30 बरस की उम्र में पाकिस्तान का मंत्री बन गया. पहले कॉमर्स और बाद में विदेश मंत्री जनरल अयूब खान की सरकार में”. पीलू मोदी की बर्कले में वस्तुकला की अपनी साथी लवीना कोलगन से
पहले दोस्ती हुई और बाद में शादी. वह लवीना से वीना हो गयी.
पीलू मोदी (14 नवंबर, 1926–29 जनवरी,1983) ने भारत लौटकर चंडीगढ़ के कैपिटल प्रोजेक्ट में चार्ल्स कारबुसियर के साथ काम किया. 1953 में पीलू मोदी ने चर्चगेट के स्टेडियम में मोदी और कोलगन की स्थापना की. उन्हें पहला काम मरीन लाइन्स में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी के वरिष्ठ कर्मचारियों के लिए फ्लैट डिज़ाइन करने के लिए मिला लेकिन उसको शुरू करने के लिए छह महीने तक इंतज़ार करना पड़ा. उनमें एयरकंडीशनिंग का काम ब्लू स्टार को सौंपा गया. पीलू मोदी द्वारा डिज़ाइन की गयी इमारतों में टेलीकॉम कार्यालय, भारत बिजली, मुकंद आयरन एंड स्टील, सैंडोज़, वोल्टाज़, डाइनर्स क्लब और बिज़नेस सर्विस सेंटर के मुख्यालय शामिल हैं. क्योंकि पीलू मोदी बहुत ही जिज्ञासु, व्यवहारिक और नए नए विचारों को आज़माने के लिए उत्सुक रहते हैं उन्होंने दिल्ली में स्थित भारत की पहली बहुमंज़िला प्रीकास्ट इमारत ओबेराय भवन का डिज़ाइन तैयार किया. यह एक मजेदार परियोजना थी. बीमों को बैलगाड़ियों के बीच लटकाकर साइट पर पहुँचाया गया, जिनपर लालटेन की रोशनी पड़ रही थी.
पीलू मोदी बताते हैं कि उन्होंने 1960 में राजनीति में उतरने का मन बनाया और वह स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गए जिसका गठन चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने किया था. उनके समर्थक उस समय कांग्रेस शासन के कट्टर विरोधी थे जब सार्वजनिक चर्चा समाजवाद के इर्दगिर्द घूमती थी. उन्होंने नेहरूवादी विचारधारा को नकार दिया. पारसी धर्म को मानने वाले पीलू मोदी भारत में उदारवादी व मुक्त आर्थिक नीतियों के समर्थक थे. वह देश की सरकार को समाजवादी राह पर चलकर पतन की ओर जा रहा कदम मानते थे. क्या राजनीति में आने में आपके पिता सर होमी मोदी (23 सितम्बर,1881-9 मार्च,1969) की भी कोई भूमिका थी. वह इस लिए कि वह राजनीति में बहुत सक्रिय थे. वह चौदह वर्षों
तक भारतीय विधानसभा के सदस्य रहे (1929-1943) तथा संविधान सभा के भी सदस्य (1948-1949) रहे और उत्तरप्रदेश के पहले राज्यपाल (1949-1952) थे तथा उनका राजनीतिक क्षेत्रों में बहुत सम्मान था. मैं उनसे 1964 में मिला था. तब मैं लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह के निजी सचिव के तौर पर काम कर रहा था.पीलू मोदी ने बताया कि उनके पिता की तो नहीं मीनू मसानी ने अलबत्ता उन्हें परामर्श दिया था. वह भी स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से थे और राजकोट से चुनाव लड़ते और जीतते थे. पीलू मोदी ने अलबत्ता मुझसे एक सवाल पूछा कि आप तो मेरे पिता जी से मिल चुके हैं, क्या उन्होंने मेरे राजनीति में आने के बारे में ज़िक्र किया था. मैंने पीलू मोदी को बताया कि मन से वह चाहते थे कि आप राजनीति में आएं.
1967 में पीलू मोदी गोधरा से लोकसभा के लिए निर्वाचित होकर एक उत्साही सांसद बने. उन्होंने एक महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने पर ज़ोर दिया. इसके फलस्वरूप 1972 का वास्तुकार अधिनियम बना जिसके कारण उनके पेशे को मान्यता दी गयी और इसे नियमों और विनियमों के साथ सुरक्षित किया. इससे पहले वस्तुकारों और इंजीनियरों को एक ही समूह में रखा गया था.पीलू मोदी ने सार्वजनिक जीवन और डिज़ाइन करियर को समान उत्साह के साथ संतुलित किया. भवन योजनाओं को बनाने की उनकी शैली विशिष्ट थी. एक बार उन्होंने बताया कि वह सदा लीक से हटकर काम करते हैं इसलिए सराहे जाते हैं. राजनीति में आने पर भी उन्होंने अपनी उदार और स्वतंत्र सोच को बरकरार रखा.पीलू मोदी ने जिस बेबाकी से मुझसे बातचीत की थी मैंने ‘दिनमान’ में वैसी ही शैली में लिखा था. मेरे संपादक रघुवीर सहाय को भी पीलू मोदी से मेरी यह बातचीत अच्छी और प्रीतिकर लगी.
मैंने पीलू मोदी को जब ‘दिनमान’ की प्रति भेंट की तो उसे देखकर बहुत खुश हुए और बोले ‘मैं किसी से पढ़वाकर तुमसे संपर्क करूंगा.’ एक दिन उन्होंने देर शाम मुझे मिलने के लिए बुलाया. तब हम दोनों ही थे. खूब बातचीत हुई, इंटरव्यू के बारे में भी और उनकी स्वतंत्र पार्टी तथा ज़ुल्फिकार अली भुट्टो से उनकी ‘यारी’ के बारे में खुलकर और बेसाख्ता. इस पर मैंने पीलू मोदी को भुट्टो से उनकी दोस्ती को लेकर एक किताब लिखने की सलाह दी. दोनों की दोस्ती इतनी पक्की थी कि न तो दोनों देशों के बीच के विवाद और तनाव उसे प्रभावित कर सके और न ही दोनों की अलग अलग राजनीतिक विचारधाराएं ही. पीलू मोदी के यहां अब मेरा निर्बाध आना जाना शुरू हो गया. उनकी एक पत्रिका निकलती थी ‘मार्च ऑफ़ द नेशन’. वह उन्होंने नियमित तौर पर मुझे भेजनी शरू कर दी.
मेरी तरह पीलू मोदी के कुछ और मित्रों और शुभचिंतकों ने उन्हें ज़ुल्फिकार अली भुट्टो से उनकी गहरी दोस्ती, जो हर क्षेत्र, समय और दौर में खरी उतरी थी,पर किताब लिखने की सलाह दी थी. उन्होंने इस पर गंभीरता से विचार कर एक दिन मुझे फोन करके जानकारी दी कि उन्होंने भुट्टो के साथ उनकी दोस्ती पर किताब लिखनी शुरू कर दी है. काफ़ी कुछ लिख चुका हूं. छपने पर तुम्हें फोन करके बुलाऊंगा. का
फ़ी दिनों के बाद उनके निजी सचिव कनु का फोन आया कि शाम को साहब आपका इंतज़ार करेंगे. मैं जब उनके लोदी एस्टेट निवास पर पहुंचा तो मुझे बहुत प्यार से मिले और बोले कि तुम्हारे इंटरव्यू ने मुझे बहुत मशहूर कर दिया. थैंक यू. मैंने कहा कि उसमें थैंक यू वगैरह कुछ नहीं, आपने मुझे खुला वक़्त दिया, उसी का यह नतीजा है. इतने में अपने पास रखी एक पुस्तक मुझे भेंट करते हुए कहा की यह तुम जैसे शुभचिंतकों के इसरार का परिणाम है कि ‘ज़ुल्फी माई फ्रेंड’ लिखी गयी. उन्होंने बड़े प्रेम से अपने दस्तखतों के साथ 17 मई, 1973 को पहले संस्करण की वह पुस्तक मुझे गले लगाकर भेंट की इस ताकीद के साथ कि जब कभी भी मुझसे मिलने की तुम्हारी इच्छा हो तो बेरोकटोक यहां आ सकते हो. यह थे पीलू मोदी ….. त्रिलोक दीप .
