मैंने तीन सदियाँ देखी हैं; ‘पहला वित्तीय घोटाला फिरोज गांधी ने उजागर किया था’: त्रिलोक दीप
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय त्रिलोक दीप (संडे मेल के भूतपूर्व कार्यकारी संपादक) भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-4)
जस्टिस एम सी छागला 1963 से 1966 तक देश के शिक्षामंत्री रहे । मैं पहली बार 1964 में उनसे दिल्ली के नार्थ ब्लाक में उनके ऑफ़िस में मिला था । तब मैं लोकसभा सचिवालय में काम करता था और छागला साहब का इंटरव्यू मैंने ल
खनऊ से निकलने वाली पत्रिका ‘ज्ञान भारती’ के लिए लिया था । जस्टिस छागला की शिक्षा नीति के बारे में मैं अपनी किसी किश्त में लिख चुका हूं । यहां तो मैं मुंदड़ा मामले में उनकी अहम भूमिका में बारे में लिखना चाहता था ।उसी इंटरव्यू के दौरान ही मैंने उनसे इस मामले पर चर्चा की थी । जब मैंने उनसे पूछा कि मुंदड़ा मामले की सुनवाई के दौरान आप पर सरकार की ओर से किसी ने दबाव बनाने की कोशिश नहीं की, मेरे इस प्रश्न पर वह मुस्कुराए और बोले, ‘यह तो राजनीतिकों की फितरत होती है लेकिन उन्हें यह भी मालूम था कि मैं किस धातु का बना हुआ हूं । इसके अलावा सभी लोग जानते थे कि कानूनन हम पुख्ता ज़मीन पर खड़े हैं और इसमें सूराख करने की कोई गुंजाइश नहीं है,खास तौर पर मेरे रहते ।’
क्योंकि शिक्षामंत्री के रूप में मैं एम सी छागला से मिला था, जिन्होंने तीन प्रधानमंत्रियों पंडित जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के साथ काम किया था, इसलिए देश की शिक्षा प्रणाली पर उनसे टिप्पणी लेनी तो बनती थी, छागला अपने स्वभाव के मुताबिक बहुत साफगो थे, बोले, “आज शिक्षा की हालत यह है कि वहां अप्रशिक्षत टीचर हैं, बच्चों के पास नई किताबें नहीं, खेलने के लिए ढंग के ग्राउंड नहीं, झोंपड़ियों में हमारे स्कूल चल रहे हैं क्या ऐसी शिक्षा प्रणाली से हम आधुनिक शिक्षित पीढ़ियां तैयार करना चाहते हैं ।इस पर तुर्रा यह कि जब कभी देश में आर्थिक संकट की स्थिति पैदा होती है तो पहला शिकार शिक्षा मंत्रालय का बजट होता है,ऐसा क्यों यह मेरी समझ के बाहर है ।यह पूछे जाने पर कि आप तो निर्विकार और निर्भीक न्यायविद रहे हैं यहां शिक्षा मंत्रालय में ऐसी क्या मजबूरी है तो उनका बहुत ही सटीक उत्तर था कि ‘न्यायपालिका और कार्यपालिका की पद्धति में यही तो अंतर है । मुख्य न्यायधीश के तौर पर तो मैं बादशाह था और शिक्षा मंत्रालय का तो मैं पूरी तरह से मुखिया भी नहीं, दूसरों के रहमोकरम पर निर्भर रहना पड़ता है ।”
आपसे पहले अबुल कलाम आजाद और हुमायूं कबीर भी शिक्षामंत्री रह चुके हैं,क्या उन्होंने इस दशा-दिशा के बारे में प्रधानमंत्री को अवगत नहीं क
राया इस पर छागला साहब का कहना था कि मैं दूसरों के बारे में तो नहीं जानता, मैंने अलबत्ता पंडित नेहरू से अपने मन की बात कह दी थी ।
12 सितम्बर, 1912 को फिरोज गांधी का जन्म मुंबई में एक पारसी परिवार में हुआ । उनके पिता जहांगीर क्लिक निक्सन नामक कंपनी में मरीन इंजीनियर थे, बाद में तरक्की करके वारंट इंजीनियर बन गये ।अपने मां बाप की पांच संतानों में फिरोज सबसे छोटे थे । फिरोज के पिता का जल्दी निधन हो गया जिसकी वजह से उनकी मां उन्हें लेकर इलाहाबाद उनकी मौसी के पास आ गयी जहां उन्होंने इवनिंग क्रिश्चियन कॉलेज प्रयागराज में पढ़ाई की । 1930 में अपने कॉलेज के बाहर धरना दे रहीं महिला प्रदर्शनकारियों के बीच फिरोज की मुलाकात कमला नेहरू और इंदिरा से हुई ।कमला नेहरू धूप की गर्मी बर्दाश्त न कर जब बेहोश हो गयीं तो फिरोज उनकी देखभाल में जुट गये ।उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और वह स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गये तब उनकी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र पंडित नेहरू का निवास आनंद भवन हुआ करता था।1930 में ही इलाहाबाद ज़िला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष लालबहादुर शास्त्री के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें फैज़ाबाद जेल में उन्नीस महीने तक नजरबंद रखा गया । रिहाई के बाद वह उत्तरप्रदेश में कृषि लगान-मुक्ति अभियान में शामिल हो गए और नेहरू जी के साथ मिलकर काम करते रहे ।1932 और 1933 में दो बार जेल गये ।नेहरू जी के साथ अभियान से जुड़ने की वजह से वह नेहरू परिवार के करीब
आ गये,खास करके कमला नेहरू के ।1934 में वह उनके साथ भोवाली टीबी सेनेटोरियम गए । जब वहां उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ तो अप्रैल,1935 में उन्हें स्विट्ज़रलैंड ले जाया गया । वहां भी कमला नेहरू की देखभाल के लिए फिरोज गांधी पहुंच गये लेकिन 28 फरवरी, 1936 को उनका निधन हो गया । तब फिरोज गांधी उनके पास थे । फिरोज गांधी को अपनी मां की सेवा करते देख इंदिरा उनके और करीब आ गयी, वैसे करीबी तो दोनों की 1933 में ही हो गयी थी ।1942 में हिंदू रीतिरिवाज के साथ दोनों की शादी हो गयी ।
शादी के छह महीने भी नहीं हुए थे कि अगस्त, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इस जोड़े को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया । एक साल की सज़ा के बाद इलाहाबाद की नैनी सेंट्रल जेल से जब रिहाई हुई तो उसके अगले पांच साल सुकून भरे रहे ।1944 में राजीव का जन्म हुआ और 1946 में संजय का ।
क्योंकि इतनी जद्दोजहद के बाद फिरोज गांधी अब जमने लगे थे, पारिवारिक और राजनीतिक दोनों तरह से,मैंने उनसे यह पूछा कि आपकी स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी के बारे में तो मैं जानता हूं लेकिन अक्सर यह सुनने में आता है कि आपने कमला नेहरू की बहुत सेवा की थी जिसकी वजह से इंदिरा जी की और आपकी नज़दीकियां बढ़ीं ।फिरोज हल्के से मुस्कुराते हुए बोले कि आपका प्रश्न है तो धुर निजी लेकिन फिर भी मैं आपको स्पष्ट उत्तर दूंगा ।शुरुआत करते हैं 1930 में मेरे कॉलेज के बाहर महिलाओं के धरने के दौरान कमला नेहरू का बेहोश हो जाना। क्योंकि मुंबई से इलाहाबाद आकर शुरू शुरू में रहता तो मैं अपनी मौसी के घर था लेकिन जब राजनीति में प्रवेश किया तो मेरा ठिकाना आनंद भवन में हो गया । इसलिए कमला नेहरू को मैं बेहोशी की हालत में आनंद भवन ले गया और उन्हें होश में लाने की कोशिश की । तब मैंने उन्हें परामर्श दिया कि आपका कृशकाय शरीर इस तरह के आंदोलनों और अभियानों में शिरकत करने की इज़ाजत नहीं था । उनके यहां पंडित नेहरू के अलावा कोई दूसरा पुरुष सदस्य था नहीं, इसलिए कमला जी की मैं ही देखभाल किया करता था ।बाद में मुझे पता चला कि वह टीबी मरीज़ हैं, अपनी परवाह किए बगैर मैं भवाली में भी उनके पास रहा और स्विट्ज़रलैंड में भी, उनकी आखिरी सांस तक ।यह इंसानियत का भी तकाजा था ।
लेकिन सुना तो यह भी जाता है कि आपने आनंद भवन रहते हुए ही इंदिरा जी को प्रोपोज़ कर दिया था! हां यह बात सच है । कमला जी इसके विरुद्ध नहीं थीं लेकिन उनका यह सुझाव था कि इसकी उम्र 18 बरस हो जाने दो। अगर कमला नेहरू जीवित होतीं तो हम दोनों को आशीर्वाद ज़रूर देतीं ।और पंडित जी! शुरू शुरू में उन्हें कुछ आपत्ति थी, बाद में इंदु ने उन्हें राज़ी कर लिया था ।आप खुद ही सोचिए कि
यदि पंडित जी को हमारे विवाह को लेकर एतराज होता तो क्या मुझे वह पहले अंतरिम संसद (1950-1952) का सदस्य बनाते, उनके द्वारा स्थापित ‘नेशनल हेरल्ड’ में क्या मैं प्रबंध निदेशक बन पाता, क्या वह मुझे 1952 और उसके बाद 1957 में राय बरेली से लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए टिकट देते । 1955 में जब मैंने कुछ धन्ना सेठों की वित्तीय अनियमितताओं का भंडाफोड़ किया तो उन्होंने ऐतराज किया था क्या। ……त्रिलोक दीप . …..….(अगले अंक में जारी)
