मूलाधार से आत्मचेतना तक की यात्रा है गणेश उत्सव - News On Radar India

मूलाधार से आत्मचेतना तक की यात्रा है गणेश उत्सव

हमारे सामुदायिक स्वास्थ्य विषेषज्ञ **डॉ नरेश पुरोहित, (प्रसिद्ध चिकित्साविद एवं वरिष्ठ लेखक) वार्षिक गणेश चतुर्थी उत्सव के संदेश के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए

115

नई दिल्ली/भोपाल:  गणेश उत्सव के पावन पर्व पर हम भगवान श्री गणेश की तरह-तरह से वंदना करते हैं। लेकिन क्या केवल बाहरी पूजा से ही गणेश जी प्रसन्न हो जाएंगे?
शायद नहीं। सच्ची गणेश उपासना तब होगी, जब हम उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में भगवान गणेश को मूलाधार चक्र का अधिष्ठाता  माना गया है। मूलाधार शरीर का आधार है। यह हमें स्थिरता, सुरक्षा, धैर्य और जीवन में संतुलन प्रदान करने वाला केंद्र माना जाता है। इसका अर्थ बहुत सरल है, जिस तरह किसी भवन के मजबूत होने के लिए उसकी नींव मजबूत होना जरूरी है, उसी तरह अच्छे जीवन के लिए हमारे विचार, संस्कार और चरित्र की नींव मजबूत होना आवश्यक है।
श्री गणेश का स्वरूप भी हमें जीवन के अनेक रहस्य समझाता है। उनका बड़ा मस्तक हमें बड़ा सोचने की सीख देता है। बड़े कान कहते हैं कि अधिक सुनो और कम बोलो। छोटी आंखें एकाग्रता का संदेश देती हैं। लंबी सूंड परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने और छोटी से छोटी बात को समझने की क्षमता का प्रतीक है। उनका विशाल उदर हमें जीवन की अच्छी-बुरी परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक स्वीकार करने की सीख देता है।
*श्री गणेश जी के साथ रहने वाला छोटा-सा मूषक भी बहुत बड़ा संदेश देता है। मनुष्य की इच्छाएं भी मूषक की तरह लगातार दौड़ती रहती हैं। यदि इच्छाओं पर नियंत्रण न हो तो वे हमें इधर-उधर भटकाती रहती हैं। गणेश जी का मूषक पर विराजमान होना मानो यह बताता है कि इच्छाएं हमारे ऊपर शासन न करें, बल्कि हमारा विवेक उन पर शासन करे।
आज का आधुनिक जीवन सुविधाओं से भर गया है, लेकिन मन की स्थिरता कम होती जा रही है। हमारे पास जानकारी बहुत है, लेकिन विवेक कम होता जा रहा है। बोलने वाले बहुत हैं, सुनने वाले कम। इच्छाएं बढ़ रही हैं और संतोष घट रहा है। ऐसे समय में गणेश जी की उपासना हमें अपने भीतर लौटने का अवसर देती है।
गणेश उत्सव केवल दस दिनों तक प्रतिमा के सामने दीप जलाने का पर्व नहीं होना चाहिए। यह अपने भीतर के अंधकार को हटाने का संकल्प भी बने। हम अपने भीतर की जिद को थोड़ा कम करें, क्रोध पर थोड़ा नियंत्रण रखें, दूसरों की बात सुनें, माता-पिता और बुजुर्गों  का सम्मान करें, बच्चों को संस्कार दें और अपने आचरण में ईमानदारी लाएं।
विघ्नहर्ता गणेश से केवल अपने रास्ते के विघ्न हटाने की प्रार्थना न करें, बल्कि यह भी प्रार्थना करें कि हमारे भीतर ऐसे विचार ही पैदा न हों जो किसी दूसरे के जीवन में विघ्न बन जाएं। यही गणेश जी की सच्ची वंदना होगी।
इस गणेश उत्सव पर घर-घर प्रतिमा आए, दीप जले, आरती हो और उत्सव मनाया जाए,लेकिन साथ ही हमारे भीतर भी बुद्धि, विवेक, पवित्रता, धैर्य, संयम और संस्कार का गणेश जागे।
क्योंकि गणेश जी को प्रसन्न करने का सबसे सुंदर मार्ग बाहर से अधिक अपने भीतर गणेशत्व को जगाना है।

गणपति बप्पा मोरया  !!!

*(मुंबई का प्रसिद्ध  सिद्धि विनायक मंदिर, नवंबर 19, 1801 में श्री  लक्ष्मण विट्टू  और  दियूबाई पाटिल द्वारा बनाया गया था, दादर, प्रभादेवी इलाके में स्थित मंदिर में वर्ष भर करोड़ों भक्त दर्शन करने आते हैं,  एवं प्रति वर्ष     रु. 10-15 करोड़ और आभूषणों आदि का दान करते हैं).


**डॉ नरेश पुरोहित- एमडी, डीएनबी , डीआई एच , एमएचए, एमआरसीपी (यूके) एक महामारी रोग विशेषज्ञ हैं। वे भारत के राष्ट्रीय संक्रामक रोग नियंत्रण कार्यक्रम के सलाहकार हैं। मध्य प्रदेश एवं दूसरे प्रदेशों की सरकारी संस्थाओं में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम , राष्ट्रीय पर्यावरण एवं वायु प्रदूषण के संस्थान के सलाहकार हैं। एसोसिएशन ऑफ किडनी केयर स्ट्डीज एवं हॉस्पिटल प्रबंधन एसोसिएशन के भी सलाहकार हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

Join WhatsApp Group