ग्रहण काल – मंत्र जप, दान और पुरश्चरण तुल्य पुण्य का दिव्य अवसर
विशेष लेख – आचार्य रोहित शास्त्री.
नई दिल्ली: 🌒 ग्रहण काल – मंत्र जप, दान और पुरश्चरण तुल्य पुण्य का दिव्य अवसर |
🗓️ 3 मार्च 2026 – पूर्ण चंद्र ग्रहण
3 मार्च 2026 (मंगलवार) को पूर्ण चंद्र ग्रहण है।
भारतीय समय (IST) के अनुसार:
🔹 ग्रहण स्पर्श (आरंभ): लगभग दोपहर 3:20 बजे
🔹 ग्रहण समाप्ति: लगभग शाम 6:47 बजे
🔹 कुल अवधि: लगभग 3 घंटे 27 मिनट
⏳ सूतक काल
चंद्र ग्रहण का सूतक 9 घंटे पूर्व प्रारंभ माना जाता है।
अतः सूतक प्रातः लगभग 6:20 बजे से प्रारंभ होकर ग्रहण समाप्ति तक रहेगा।
🌘 ग्रहण का आध्यात्मिक महत्व
ग्रहण केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि सनातन परंपरा में इसे अत्यंत शक्तिशाली साधना काल माना गया है। इस समय प्रकृति की सूक्ष्म ऊर्जा परिवर्तित होती है और मन शीघ्र एकाग्र होता है।
इसी कारण शास्त्रों में ग्रहण काल को जप, ध्यान और दान का श्रेष्ठ अवसर कहा गया है।
📜 शास्त्रीय प्रमाण – कोटिगुण फल
Padma Purana में कहा गया है:
“ग्रहणे जपदानादि कोटिगुणं भवेत्।”
अर्थात ग्रहण के समय किया गया जप और दान कोटि गुना फल देता है।
Skanda Purana तथा अन्य धर्मग्रंथों में भी ग्रहण को अत्यंत पुण्यकारी और सिद्धिदायक समय बताया गया है।
🔱 पुरश्चरण क्या है?
पुरश्चरण का अर्थ है — किसी मंत्र को निर्धारित संख्या में जप कर उसे सिद्ध करना।
शास्त्रीय सूत्र:
मंत्र के अक्षरों की संख्या × 1,00,000 जप = पुरश्चरण संख्या
उदाहरण:
गायत्री मंत्र में 24 अक्षर माने जाते हैं।
अतः पारंपरिक पुरश्चरण: 24 लाख जप।
पुरश्चरण केवल जप नहीं है — इसमें संयम, नियम, हवन, तर्पण और दान भी सम्मिलित होते हैं।
🌟 ग्रहण में जप और पुरश्चरण का संबंध
अब मुख्य प्रश्न यह है कि ग्रहण में जप करने से पुरश्चरण का क्या संबंध है?
शास्त्रों में ग्रहण काल के जप को “कोटिगुण फलदायी” कहा गया है।
अर्थात इस समय जप का प्रभाव सामान्य समय से अत्यंत तीव्र होता है।
इसी कारण परंपरा में कहा गया है कि —
यदि साधक ग्रहण काल में श्रद्धा, नियम और एकाग्रता से जप करता है, तो उसे सामान्य जप की अपेक्षा अत्यधिक फल प्राप्त होता है।
अनेक साधना परंपराओं में ग्रहण काल को “पुरश्चरण तुल्य फलदायक अवसर” माना गया है, क्योंकि इस समय अल्पकालीन जप भी अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
अर्थ यह नहीं कि पूर्ण पुरश्चरण की विधि स्वतः पूर्ण हो जाती है, बल्कि यह कि ग्रहण में किया गया जप अत्यधिक तीव्र फल प्रदान करता है और साधना की प्रगति को शीघ्र बनाता है।
🌟 ग्रहण में दान का महत्व
ग्रहण समाप्ति के पश्चात स्नान कर श्रद्धापूर्वक दान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है और ग्रह शांति मिलती है।
🪔 ग्रह शांति हेतु सामान्य दान
☀ सूर्य – गेहूँ, गुड़, लाल वस्त्र
🌙 चन्द्र – चावल, दूध
🔴 मंगल – मसूर दाल, तांबा
🟢 बुध – मूंग दाल
🟡 गुरु – पीली दाल, हल्दी
⚪ शुक्र – मिश्री, सफेद वस्त्र
⚫ शनि – तिल, सरसों का तेल
🌫 राहु – नारियल
🌪 केतु – कंबल, काला तिल
🔔 ग्रहण में करने योग्य मंत्र
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
गायत्री मंत्र (पूर्ण)
ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
🕉 क्या करें?
✔ सूतक से पहले भोजन कर लें
✔ ग्रहण काल में जप-ध्यान करें
✔ ग्रहण समाप्ति पर स्नान करें
✔ दान करें
🌼 विशेष संदेश
ग्रहण भय का समय नहीं, बल्कि साधना का स्वर्णिम अवसर है।
जो साधक इस काल में श्रद्धा और संयम से जप करता है, वह अपनी साधना को तीव्र गति प्रदान करता है।
यही वह समय है जब अल्प प्रयास भी गहन आध्यात्मिक फल दे सकता है।
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आचार्य रोहित शास्त्री.
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📱 Instagram: @astro.rohitshastri
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