क्यों जानलेवा बन रहा है ये इश्क?
असफल रिश्ते का अंत कभी भी किसी अपराध का औचित्य नहीं बन सकता I
हमारे सामुदायिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ नरेशा पुरोहित, (सलाहकार -राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम), इश्क़ अपराध के बढ़ते मामलों पर विस्तृत जानकारी के साथ !
भोपाल : ‘प्यार, दबाव या फिर दोहरी जिंदगी।आखिर क्यों लोग रिश्ते से निकलने के बजाय अपराध का रास्ता चुन लेते हैं?
महाराष्ट्र के पुणे में सामने आए केतन अग्रवाल मर्डर केस ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। आरोप है कि 26 वर्षीय व्यवसायी केतन विशाल अग्रवाल की हत्या उनकी मंगेतर सिया गोयल ने अपने कथित प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर की ।
पुलिस ने दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 और 61(2) के तहत हत्या और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज कर उन्हें पुलिस हिरासत में भेज दिया
है।
यह पहला मामला नहीं है : इससे पहले राजा रघुवंशी हत्याकांड में सोनम नाम की महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति राजा रघुवंशी की हत्या कर दी थी। एक और मेरठ के चर्चित ‘नीले ड्रम हत्याकांड’ में मुस्कान रस्तोगी ने भी अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी थी I
कई लोगों के मन में यह सवाल है कि कई मामलो में जब रिश्ता विवाह पूर्व खत्म किया जा सकता था, तो अपराध का रास्ता क्यों चुना गया? क्या ऐसे मामलों के पीछे सिर्फ प्रेम संबंध होते हैं, या फिर सामाजिक दबाव, छिपे हुए रिश्ते और दोहरी जिंदगी जीने का मानसिक बोझ भी अहम भूमिका निभाता है?
आइए इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं : इस कहानी के 3 मुख्य किरदार हैं, केतन विशाल अग्रवाल (मंगेतर), सिया गोयल (आरोपी) और चेतन चौधरी (प्रेमी). केतन और सिया की शादी परिवार के मर्जी से हो रही थी, जिससे सिया खुश नहीं थी । सिया केतन से शादी नहीं करना चाहती थी, उसे चेतन चौधरी से प्यार था ।इसलिए वह केतन को रोड़ा मानती थी. दोनों ने मिलकर उसे रास्ते से हटाने का फैसला किया ।
केतन अग्रवाल मामले के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या शादी से इनकार करना या रिश्ता खत्म करना इतना मुश्किल था कि किसी की जान ले ली जाए? इस पर मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे मामलों की जड़ में अक्सर प्यार नहीं, बल्कि अस्वीकार किए जाने का डर, सामाजिक दबाव, असुरक्षा और सच सामने आने का भय Vlog है । जब भी किसी प्रेम संबंध, विवाह या कथित अफेयर से जुड़ा कोई सनसनीखेज अपराध सामने आता है, तो एक सवाल बार-बार उठता है, क्या अलग होना इतना मुश्किल था कि किसी ने अपराध का रास्ता चुन लिया? आखिर ऐसा क्या होता है कि एक व्यक्ति सच बोलने, रिश्ता खत्म करने या नई शुरुआत करने के बजाय हिंसा या अपराध की ओर बढ़ जाता है? ऐसे मामलों को केवल “प्यार” या “नफरत” के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे कई बार भावनात्मक दबाव, सामाजिक डर, दोहरी जिंदगी, नियंत्रण की इच्छा और भविष्य का डर जैसी जटिल मानसिक स्थितियां काम कर रही होती हैं।
भारतीय समाज में रिश्तों को लेकर सामाजिक अपेक्षाएं काफी मजबूत हैं. कई लोगों को लगता है कि रिश्ता टूटना, सगाई खत्म होना या विवाह में दरार आना उनकी सामाजिक छवि को नुकसान पहुंचाएगा। यह डर कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि व्यक्ति तार्किक सोच खोने लगता है। जब कोई व्यक्ति खुद को भावनात्मक रूप से कोने में घिरा हुआ महसूस करता है, तो वह समस्याओं का समाधान खोजने
के बजाय उनसे बचने की कोशिश करने लगता है। यही मानसिकता कई बार खतरनाक फैसलों की जमीन तैयार कर सकती है. कुछ लोगों में सोचने का तरीका अत्यधिक चरम होता है। वे परिस्थितियों को केवल दो विकल्पों में देखते हैं, या तो सब कुछ उनके अनुसार हो या फिर सब कुछ खत्म हो जाए. ऐसी मानसिकता में व्यक्ति रिश्ते के अंत, अस्वीकार किए जाने या भविष्य बदलने की संभावना को स्वीकार नहीं कर पाता । हम इसे “ऑल ऑर नथिंग थिंकिंग” कहते हैं. इस मानसिकता में व्यक्ति वैकल्पिक रास्तों को देखने की क्षमता खो सकता है और भावनाओं के प्रभाव में गलत निर्णय ले सकता है । कुछ रिश्तों में व्यक्ति अपने साथी को अपनी पहचान, खुशी या भविष्य का एकमात्र आधार मानने लगता है I जब उसे लगता है कि यह रिश्ता खत्म हो सकता है, तो उसके भीतर असुरक्षा, ईर्ष्या या नियंत्रण की भावना बढ़ सकती है। हालांकि अधिकांश लोग ऐसी परिस्थितियों में भी अपराध नहीं करते, लेकिन जिन लोगों में पहले से आवेग नियंत्रण की समस्या, व्यक्तित्व संबंधी कठिनाइयां या भावनात्मक अस्थिरता होती है, उनमें जोखिम बढ़ सकता है ।
कई लोग एक साथ दो अलग-अलग रिश्तों या पहचान के साथ जीवन जी रहे होते हैं l शुरुआत में उन्हें लगता है कि वे दोनों स्थितियों को संभाल लेंगे, लेकिन समय के साथ झूठ और छिपाव का बोझ बढ़ने लगता है. जब सच्चाई सामने आने का खतरा बढ़ता है, तो कुछ लोग खुद को ऐसे मोड़ पर पाते हैं जहां उन्हें लगता है कि उनके पास कोई आसान रास्ता नहीं बचा है I दोहरी जिंदगी जीने वाले व्यक्ति अक्सर अपनी बनाई हुई दुनिया को टूटने से बचाने के लिए गलत फैसले लेने लगते हैं। उन्हें डर होता है कि सच सामने आया तो परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक सुरक्षा या भविष्य की योजनाएं सब कुछ खत्म हो सकता है।
प्यार अपराध की वजह बन सकता है? प्यार कभी अपराध की वजह नहीं बनता, अपराध की जड़ में आमतौर पर प्यार नहीं, बल्कि स्वार्थ, नियंत्रण, डर, गुस्सा, असुरक्षा या परिणामों से बचने की कोशिश जैसी भावनाएं होती हैं I जब कोई व्यक्ति दूसरे इंसान को एक स्वतंत्र व्यक्ति की जगह अपनी समस्या या बाधा के रूप में देखने लगता है, तब स्थिति खतरनाक हो सकती है । रिश्तों में संकट आना सामान्य बात है लेकिन जब कोई व्यक्ति सच का सामना करने, संवाद करने या अलग होने के बजाय झूठ और छिपाव का सहारा लेता है, तो मानसिक दबाव लगातार बढ़ता जाता है। अधिकांश लोग ऐसे दबावों से स्वस्थ तरीके से निकल जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में निर्णय लेने की क्षमता भावनाओं और डर के कारण प्रभावित हो सकती है। इसलिए रिश्तों में ईमानदार संवाद, भावनात्मक सहायता और जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग बेहद महत्वपूर्ण है।
हर रिश्ता सफल नहीं होता और हर प्रेम कहानी मंजिल तक नहीं पहुंचती। लेकिन रिश्ते का अंत कभी भी किसी अपराध का औचित्य नहीं बन सकता I
विशेषज्ञ मानते हैं कि सच स्वीकार करना, सम्मानजनक तरीके से अलग होना और मानसिक स्वास्थ्य सहायता लेना हमेशा बेहतर विकल्प है I आखिरकार, एक कठिन बातचीत जिंदगी बदल सकती है, जबकि एक गलत फैसला कई जिंदगियां बर्बाद कर सकता है।
*डॉ नरेश पुरोहित:MD, DNB, DIH, MHA, MRCP(UK), (सलाहकार – राष्ट्रीय प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम )
एक एंडियोमोलॉज, राष्ट्रीय संक्रमण रोग रोकथाम प्रोग्राम के सलाहकार हैं। वे हॉस्पिटल मैनेजमेंट एसोसिएशन के तथा किडनी केयर स्टडी एसोसिएशन के मुख्य निरीक्षक भी हैं |