मैंने तीन सदियाँ देखी हैं; 'पहला वित्तीय घोटाला फिरोज गांधी ने उजागर किया था': त्रिलोक दीप - News On Radar India

मैंने तीन सदियाँ देखी हैं; ‘पहला वित्तीय घोटाला फिरोज गांधी ने उजागर किया था’: त्रिलोक दीप

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय त्रिलोक दीप (संडे मेल के भूतपूर्व कार्यकारी संपादक) भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-2)

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                  अगर आप  हरिदास मुंदड़ा कांड की बात कर रहे हैं तो उनके खिलाफ मेरे पास पुख्ता जानकारी थी जो मैंने लाइब्रेरी से एकत्र की थी। सेठ साहब ने जिन कागज़ों पर फ़्लैग लगाकर दिए थे उन्हें मैंने अपने भाषण में साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किए थे ।लाइब्रेरी से प्राप्त उसी सामग्री से मुझे पता चला कि इस समय जीवन बीमा कंपनियाँ कुकरमुत्ते की तरह देश भर में फैली हुई हैं । शेयर बाज़ार के सट्टेबाज छोटे व्यापारियों से सांठगांठ कर शेयरों के भाव बढ़ाते घटाते रहते हैं । इस बीच सरकार ने 245 फर्मों का राष्ट्रीयकरण कर जीवन बीमा निगम के तहत समेकित किया । यह कुछ वैसा ही कदम था जैसे सरदार वल्लभभाई पटेल ने देसी रियासतों का विलय स्वाधीन भारत में किया था ।19 जून,1956 को इन समेकित बीमा कंपनियों को भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) अधिनियम के अंतर्गत लाया गया ।

लेकिन यहां भी सब कुछ ठीक नहीं था, उसमें झोल था ।कोलकाता स्थित शेयर सट्टेबाज हरिदास मुंदड़ा ने नौकरशाही, शेयर बाजार के सट्टेबाजों और छोटे व्यापारियों की सांठगांठ से भारतीय जीवन बीमा निगम को कई कंपनियों क शेयर ऊँचे भाव पर बेचकर बड़ी रकम की ठगी की थी। फिरोज गांधी ने जीवन बीमा निगम के साथ किए गये वित्तीय घोटाले की गहन जांच पड़ताल करके पूरे मामले को लोकसभा में उजागर किया ।उन्होंने अपने पास रखे दस्तावेजों को पलटते हुए सरकार से पूछा कि क्या नवगठित एलआईसी ने 55 लाख जीवन बीमा पॉलिसीधारकों के प्रीमियम का इस्तेमाल कुख्यात सट्टेबाज हरिदास मुंदड़ा द्वारा नियंत्रित कंपनियों में बाज़ार भाव से ज़्यादा कीमत पर शेयर खरीदने के लिए किया है ।पहले तो सरकार की तरफ से टालमटोल की गयी और वित्तमंत्री टी टी कृष्णमाचारी (टीटीके), जो खुद भी उद्योगपति थे, कहा कि यह तथ्य नहीं है तो फिरोज गांधी ने एलआईसी को ‘संसद की संतान’ बताते हुए अपने साथ लाए दस्तावेजों का हवाला देते हुए अपने हाथों के कुछ दस्तावेज लहराते हुए कहा तो यह क्या है ।जब स्पीकर साहब ने उन दस्तावेजों को सदन के पटल पर रखने के लिए कहा तो फिरोज गांधी ने तुरंत उस पर अमल किया।उन्होंने कहा कि सरकार से तो यह उम्मीद की जाती है कि वह सार्वजनिक धन पर सतर्कता और नियन्त्रण रखेगी लेकिन यहां तो उसका दुरुपयोग हुआ है लिहाजा पॉलिसीधारकों की संतुष्टि के लिए इस मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए ।

फिरोज गांधी द्वारा सट्टेबाज हरिदास मुंदड़ा द्वारा भारतीय जीवन निगम के पॉलिसी-धारकों के प्रीमियम की अनियमितता की खबरें सार्वजनिक सुर्खियां बटोर रही थीं लिहाजा सरकार ने बिना देर किए मामले की जांच के लिए बंबई हाईकोर्ट के सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद करीम छागला को एक सदस्यीय समिति के तौर पर नियुक्त किया । जस्टिस छागला दस बरस तक बंबई हाईकोर्ट के मुख्य और धाकड़ न्यायाधीश रहे थे। उन्हें तीन बार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश का ऑफ़र मिला जिसे उन्होंने बड़ी विनम्रता से इसे स्वीकार करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की थी। एक मुलाकात में जब मैंने जस्टिस छागला से पूछा कि हाईकोर्ट का जस्टिस या चीफ़ जस्टिस सर्वोच्च न्यायालय जाने के लिए हमेशा लालियत रहते हैं तो आपके न जाने की क्या वजह थी,इस पर जस्टिस छागला का उत्तर था कि जिन दिनों मुझे सर्वोच्च न्यायालय का ऑफ़र मिला था उस समय बंबई हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट से अधिक शक्तिशाली हुआ करता था ।जस्टिस छागला से भी मुंदड़ा मामले को लेकर मेरी बात हुई थी, उसके बारे में आगे उल्लेख करूंगा फिरोज गांधी का भाषण सुनने के बाद ।

16 दिसंबर, 1957 को मुंदड़ा मामले पर लोकसभा में फिरोज गांधी का भाषण मैंने भी सुना था । उस दिन सदन खचाखच भरा हुआ था ।प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनका मंत्रिमंडल पूरी संख्या में उपस्थित था और विपक्ष के सांसद भी पूरी तादाद में थे । दर्शक दीर्घाओं में भी जगह नहीं थी ।यह उन दिनों की रवयात थी कि प्रमुख नेताओं को सुनने के लिए राज्यसभा के सांसद भी दर्शक दीर्घा में पहुंच जाया करते थे और डिप्लोमेटिक कोर के राजनयिक भी ।सभी के लिए अलग दीर्घायें थीं ।सदन में किस दिन कौन बोलेगा इसकी सूचना आम तौर पर समाचारपत्रों में होती थी । जब फिरोज गांधी बोलने के लिए खड़े हुए तो विपक्षी सांसदों ने अपनी मेजे थपथपा कर स्वागत किया जबकि उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी के सांसद मौन रहे । उस समय सदन में पूरी तरह से खामोशी छा गयी थी । अध्यक्ष के आसन पर एम. ए. अय्यंगर विराजमान थे । फिरोज गांधी की मेज़ पर फ़्लैगयुक्त बहुत सी किताबें,फ़ाइलें और अखबारों की कतरनें थीं लिहाजा उन्होंने सीधे सट्टेबाज हरिदास मुंदड़ा पर आने से पहले देश के औद्योगिक जगत में फैलने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते हुए कहा कि मैं पहले भी कुछ मामलों में सदन और सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट कर चुका हूं। मुझे खुशी है कि कुछ मामलों में सरकार की ओर से यथोचित कार्यवाही की गयी ।लेकिन मुंदड़ा मामला उनसे कुछ अलग है ।इसमें ‘बाड़ ही खा गयी खेत को’  –का मुहावरा सटीक बैठता है ।जी हां,मैं भारतीय जीवन निगम में हुई अनियमितताओं का ज़िक्र कर रहा हूं ।सरकार ने देश भर में फैली बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करके एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम उठाया था लेकिन शातिर सट्टेबाज हरिदास मूंदड़ा ने नौकरशाही की मदद से एलआईसी को ही चूना लगा दिया और वहां की निवेश समिति टापती ही रह गयी ।मूंदड़ा ने उन छह संकटग्रस्त कंपनियों के शेयरों का निवेश करवाया,जिनके बड़ी संख्या में शेयर मूंदड़ा के पास थे । वे कंपनियां थीं: रिचर्डसन क्रुडास, जेसप्स एण्ड कंपनी, ओस्लर लैंप्स, ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन आदि ।यह निवेश सरकारी दबाव में किया गया था और एलआईसी की निवेश समिति को दरकिनार कर दिया गया था ।उसे इस फैसले के बारे में डील हो जाने के बाद ही बताया गया ।इस घटना में एलआईसी ने ज़्यादातर पैसा खो दिया । सरकार ने जस्टिस एम सी छागला की एक-सदस्यीय जांच समिति पहले ही नियुक्त कर दी गयी बावजूद इसके फिरोज गांधी अपने विस्तृत विचार सदन के समक्ष रखना चाहते थे ।फिरोज गांधी यह भाषण मुझे भी सुनने को मिला जो खासा लंबा था तमाम तरह के तथ्यों, उद्धरणों और उदाहरणों से भरपूर ।मैंने तब महसूस किया कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ओर के सांसद बड़े मनोयोग से फिरोज गांधी का भाषण सुन रहे थे । पंडित नेहरू को तो मैंने कुछ नोट करते भी देखा था ।

फिरोज गांधी का लोकसभा में दिए गए उनके भाषण का ज़िक्र करते हुए जब मैंने उनसे पूछा कि अपनी ही पार्टी की सरकार को आपने कटघरे में खड़ा कर दिया तो उनका उत्तर था कि मैंने भ्रष्टाचार विरोधी एक आंदोलन चला रखा है उसकी जद में जो कोई भी आएगा उसकी खैर नहीं ।मेरे यह पूछने पर कि इस मुद्दे पर जितना विस्तृत अध्ययन आपने किया है उससे लगता तो नहीं कि सरकार  के पास कोई बीच का रास्ता बचा है इस पर फिरोज गांधी का कहना था कि अगर यह मुद्दा भविष्य की नज़ीर बनता है तो उससे देश का ही फायदा है ।आपको लगता नहीं कि सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्य द्वारा सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर आपने प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की फजीयत की है, उनकी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई है और उन्हें शर्मसार किया है ।आप कांग्रेस के सांसद होने के साथ साथ पंडित जी के दामाद भी हैं! मेरे इस सवाल का फिरोज गांधी ने बड़ी बेबाकी से जवाब देते हुए कहा कि ‘कतई नहीं ।मैंने तो अलबत्ता उनकी मदद की है । मुंदड़ा कांड के उजागर हो जाने से उन्हें यह पता चल गया है कि उनकी सरकार में कितने ‘जयचंद’ हैं । इसके अलावा जो लोग किसी Trilok Deep न किसी घोटाले की रूपरेखा बना रहे होंगे वह चौकस हो जाएंगे क्योंकि ऐसे लोगों को मालूम है कि भ्रष्टाचारियों पर मेरी निगाहें लगी रहती हैं । मुझे पूरा विश्वास है कि छागला समिति की जांच समिति मेरी दलीलों की ताईद करेगी । क्या सरदार हुकम सिंह से ‘तुरंत’ मिलने की वजह भी मुंदड़ा घोटाले पर बहस थी ।फिरोज गांधी ने बेहिचक इसे स्वीकार किया ।उन्होंने कहा कि मैं सरदार साहब से पूछना चाहता था कि जब मेरा मुद्दा बहस के लिए आएगा तब स्पीकर के आसन पर कौन विराजमान होगा ।सरदार साहब ने बताया था कि इसकी पूर्वसूचना नहीं होती । खैर जो भी पीठासीन अधिकारी होगा,स्वागत है लेकिन सरदार साहब के प्रति मेरी निजी श्रद्धा और आस्था है । .……त्रिलोक दीप .                                                                  …..….(अगले अंक में जारी)

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