शिमला समझौते के चश्मदीद गवाह थे पीलू मोदी ! - News On Radar India

शिमला समझौते के चश्मदीद गवाह थे पीलू मोदी !

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-2)

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                खैर, वह मुझसे   बातचीत करने के लिए राज़ी हो गए और बोले, कहां से शुरू करोगे. मैंने कहा कि दून स्कूल से लेकर बंबई (वर्तमान मुंबई) और बर्कले तक आपकी और ज़ुल्फिकर अली भुट्टो की दोस्ती के पार्श्व में जो आज तक पुख्ता है, उस बाबत. उस बारे में भी आपके अदन जाते हुए आठ साल बाद सुबह तीन बजे भुट्टो से कराची एयरपोर्ट के वीवीआईपी लाउंज में आप दोनों की मुलाक़ात से लेकर ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया’ में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के बारे में आपके इंटरव्यू तक.मैंने वह इंटरव्यू भी पढ़ रखा है और भुट्टो के जवाब से भी मैं परिचित हूं. लेकिन आज सिर्फ शिमला समझौते पर ही बात करूँगा. शिमला पहुंचने के लिए आपको किन किन दुश्वारियों से होकर गुज़रना पड़ा.

पीलू मोदी हंसे और बोले, तुम्हें अदन और कराची में भुट्टो से मिलने की खबर कहां से मिली! मैंने कहा कि आपसे. आपने ही तो एक बार बताया था कि अदन में बैंक ऑफ़ इंडिया की बिल्डिंग की डिज़ाइन का मुझे ज़िम्मा सौंपा गया है जिसके सिलसिले में मुझे कई बार अदन जाना पड़ेगा वाया कराची. अदन का उन दिनों बहुत महत्त्व था. वहां के सभी मुकद्दमों की सुनवाई बंबई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.सी. चागला किया करते थे. इसीलिए जस्टिस चागला ने सुप्रीम कोर्ट जाने का ऑफर ठुकरा दिया था. पीलू मोदी ने कहा कि अभी हम अतीत की ज़्यादा बातचीत नहीं करेंगे. बस इतना जान लो कि मैं देहरादून के दून स्कूल में पांच साल गुज़ारने के बाद जब मुंबई लौटा तो मुझे सभी कुछ बहुत नीरस और असहज लग रहा था और मैं एकाकीपन महसूस कर परेशान हो रहा था. कुछ समय के बाद हम लोग दिल्ली गए. मेरे माता पिता अपने सपनों का एक घर बनाना चाहते थे. इसके लिए एक आर्किटेक्ट (वास्तुकार) को बुलाया गया. उसने कुछ डिज़ाइन दिखाए जो मेरी माँ को नहीं रुचे. लेकिन मुझे इस का फ़ायदा यह हो गया कि मेरी रुचि आर्किटेक्ट बनने के प्रति हो गयी. लिहाज़ा मैंने मुंबई में जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में एडमिशन ले लिया. यहीं  मेरी मुलाक़ात एक बार फिर ज़ुल्फिकार से हो गयी. अब हम लोगों के दिन की शुरुआत सुबह 7.30 बजे बैडमिंटन और स्क्वायश से होती. उसके बाद हम लोग करीब एक बजे तक तैराकी करते. घर आकर लंच करते. ज़ुल्फी भी अमूमन मेरे साथ होता. उसके बाद फिर निकल जाते, सिनेमा देखते और शाम  पूल के किनारे वक़्त गुज़ारते और डिनर हम लोग साथ साथ ही करते. उसके बाद टहलने के लिए निकल जाते और आधी रात के करीब अपने अपने घर जाते. हम दोनों के घर आसपास     ही थे.

हमारी दोस्ती की कहानी बहुत लंबी है जो मैं तुम्हें बाद में विस्तार से बताऊंगा.मैंने तुम्हें कुछ झलकियां दिखा दी हैं. 1971 के युद्ध के बाद अब जब भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सामान्य करने की दिशा में बातचीत करने पर सहमति बनी तो मैंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि मैं दिल्ली में अपने घर भुट्टो और अपने कुछ पुराने साथियों के साथ एक पार्टी करना चाहता हूं, कृपया इसकी अनुमति प्रदान करें. क्योंकि इंदिरा गांधी का विदेश जाने का कार्यक्रम था इसलिए मैंने दो हफ्ते पहले ही अपना अनुरोध दर्ज करा दिया. इस पत्र की एक प्रति मैंने विदेशमंत्री सरदार स्वर्ण सिंह को भी भेज दी. जब पंद्रह दिनों तक कहीं से कोई जवाब नहीं आया तो मैंने सरदार स्वर्णसिंह को फोन किया. उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं के बीच शांति वार्ता शिमला में होने वाली है वहां ऐसे मिलन की कोई गुंजाइश नहीं. खैर, क्या मैं अपने दोस्त से मिलने के लिए शिमला आ सकता हूं. स्वर्णसिंह का उत्तर था कि इस आशय का अनुरोध पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो की ओर से आना चाहिए. मैंने कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं है.

अभी मैं ऊहापोह की स्थिति में था कि मेरे मित्र गौतम खन्ना ने फोन करके बताया कि राय बहादुर मोहन सिंह ओबेराय अगले दिन सुबह शिमला जा रहे हैं, क्या वीना और मैं भी उनके साथ चल सकते हैं! मैंने बिना हिचक के अपनी सहमति दे दी और हम लोग अगले दिन दोपहर  3.30 बजे शिमला पहुंच गए. जब सरदार स्वर्णसिंह से मेरा संपर्क नहीं हो पाया तो मैंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के सैन्य सचिव को अपने शिमला पहुंचने की खबर दे दी. मेरा संदेश मिलते ही भुट्टो ने अपने एक सुरक्षा अधिकारी के साथ मुझे लेने के लिए कार भेज दी. मैं और वीना उनसे मिलने के लिए हिमाचल भवन पहुंच गए. वहां हम करीब ढाई घंटे रहे और अपने पुराने दिनों को याद किया और एक दूसरे के परिवार की भी कुशलक्षेम पूछी और जानी. यह बात 28 जून, 1972 की है. क्योंकि शिखर वार्ता का कोई अतापता नहीं था इसलिए अगले दिन हम लोग सुबह 11 बजे से 3.30 बजे तक एक साथ रहे पुरानी मधुर यादों में खोये हुए.

इस बीच शिमला में एकत्र देश-विदेश के करीब तीन सौ पत्रकारों में बेचैनी बढ़ रही थी. कुछ पत्रकारों ने मुझसे संभावित शिखर वार्ता के बारे में जब पूछा तो मैंने उन्हें बताया कि मैं यहां शिमला में अपने पुराने दोस्त से मिलने के लिए आया हूं. क्योंकि पत्रकारों ने भुट्टो और हमारी साढ़े छह घंटे की निजी मुलाक़ात देख ली थी उन्हें शायद यह गलतफहमी हो गयी थी कि मैं दोनों नेताओं के बीच होने वाली शिखर वार्ता से परिचित हूं. जब तीसरे दिन भी शिखर वार्ता होने के कोई आसार नहीं दीखे तो स्वतंत्र पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते मैंने एक प्रेस कांफ्रेंस की और दोनों देशों के बीच शिखर वार्ता की पहल का स्वागत किया. मैंने आशा व्यक्त की कि ‘इस शिखर वार्ता से दोनों देशों के बीच शांति और मैत्री के मज़बूत और स्थायी संबंध स्थापित होंगे. अब यही एकमात्र रास्ता है दक्षिण एशिया को बड़ी शक्ति की राजनीति से दूर रखने का.’
क्योंकि भारत-पाकिस्तान के बीच गहरे संदेह और शंकाएं हैं मुझे नहीं लगता कि नौकरशाह इस पर पार पा सकते हैं. लिहाज़ा इस पर श्रीमती इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को एक बंद कमरे में अकेले में बैठकर सभी तरह के पुराने शक शुबहों पर खुले मन से बात करनी चाहिए ताकि ये संशय हमेशा के लिए समाप्त हो जाएं.

उस दिन राष्ट्रपति ने हमें डिनर पर आमंत्रित किया जहां हम लोगों ने शुद्ध विश्राम और मस्ती के मूड में तीन घंटे बिताये. भुट्टो की बेटी बेनज़ीर भी उस डिनर में शामिल थी. चौथे दिन मैं बीमार हो गया और बिस्तर पर ही पड़ा रहा. मुझे पता चला कि दोनों नेताओं के बीच बातचीत शुरू हो गयी है जिसके चलते भुट्टो और उनका प्रतिनिधिमंडल सारे दिन मसरूफ रहा. एकबारगी मुझे ऐसा लगा कि शिखर वार्ता असफल हो गयी है और इस बातचीत में कुछ भी हासिल नहीं हुआ. परम्परा के अनुसार आखिरी दिन राष्ट्रपति भुट्टो ने श्रीमती गांधी के सम्मान में विदाई रात्रि भोज दिया जिसमें गैरसरकारी लोगों में मुझे और वीना को भी आमंत्रित किया गया.

डिनर खत्म होते होते श्रीमती गांधी और भुट्टो अचानक उठे और समाधान की दिशा में एक और प्रयास करने का निर्णय किया. लिहाज़ा माहौल में एक अलग तरह की ऊर्जा कौँध गयी. दोनों ओर के अधिकारियों के चेहरों में उम्मीद की किरण तिरेर गयी. भुट्टो के लोग रिसेप्शन रूम तथा श्रीमती गांधी के बिलियर्ड रूम में जमा हो गए. इस बीच प्रेस तक भी यह खबर पहुंच गयी थी. वह लोग भी कभी रिसेप्शन रूम में जाते तो कभी बिलियर्ड रूम में. अचानक बिलियर्ड रूम का दरवाज़ा खुला. देखा जगजीवन राम बिलियर्ड टेबल पर बैठे हैं, श्रीमती गांधी झुक कर उनसे Trilok Deepकुछ कह रही हैं, शायद संधि के प्रारूप के बारे में, यशवंतराव चव्हाण और फ़हरुद्दीन अली अहमद जैसे वरिष्ठ मंत्रियों के साथ नौकरशाहों की टीम ने भी उस टेबल को घेर लिया. कैसा असाधारण दृश्य था वह. काश किसी फोटोग्राफर ने वह ऐतिहासिक फोटो ले ली होती.आखिरकार 10.45 बजे अंतिम प्रारूप तैयार  हो गया.   .. त्रिलोक दीप .                                              ….. …..….(अगले अंक में जारी)

*(pics credit-rashtrapatibhavan.gov.in, nbtindia.gov.in, schoolofdehradun.com  & our archives)

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