शिमला समझौते के चश्मदीद गवाह थे पीलू मोदी- त्रिलोक दीप - News On Radar India

शिमला समझौते के चश्मदीद गवाह थे पीलू मोदी- त्रिलोक दीप

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं लोकसभा सचिवालय कार्यानुभव वाले 90 वर्षीय श्री त्रिलोक दीप भारत विभाजन के अनुभव, देश विदेश की यात्राओं और दिनमान पत्रिका के संपादन सहित सात दशकों की पत्रकारिता पूंजी हमारे पाठकों के साथ बांटते हुए…! (भाग-1)

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             भारत और पाकिस्तान  के बीच अभी तक चार प्रमुख युद्ध हुए हैं. 1947-48 में जम्मू-कश्मीर के विलय और
कबाइली घुसपैठ के कारण हुआ, दूसरा 1965 में पाकिस्तान के ‘ऑपरेशन ज़िब्राल्टर और कश्मीर पर कब्ज़े के प्रयास से शुरू हुआ और जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते के साथ यह समाप्त हुआ. 1971 का तीसरा युद्ध पूर्वी पाकिस्तान (मौजूदा बंगलादेश) के संकट और मुक्ति संग्राम के कारण लड़ा गया था जिसमें पाकिस्तान की हार हुई और उसने अपने 93 हज़ार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया. बंगलादेश का एक नए राष्ट्र के रूप में अभ्युदय हुआ. इस युद्ध में जीत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरी दुनिया को यह संदेश दे दिया कि भारत को कमज़ोर समझने की कोई भूल न करे. मुक्तिवाहिनी भारतीय सैनिकों की मदद से ही बंगलादेश के निर्माण में कामयाब हुई. आज बंगलादेश के हुक्मरानों के रवैये को आप क्या कहेंगे! आज का मेरा आलेख 1971 के युद्ध और शिमला समझौते पर आधारित है. 1999 का चौथा युद्ध करगिल और द्रास सेक्टर में पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा घुसपैठ के कारण हुआ. भारत ने अपनी चौकियों को वापस छीना और यह भारत की निर्णायक जीत के साथ समाप्त हुआ.

इन सभी युद्धों से किसी न किसी रूप से मेरा सरोकार रहा है. कुछ से युद्ध के दौरान तो कुछ से युद्ध के बाद. 1947-48 के युद्ध के समय तो हम लोग रावलपिंडी से निकलकर कर अपने पुनर्वास की व्यवस्था में जुटे थे लेकिन बाद में मैंने भारत के कश्मीर के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग दो तिहाई हिस्से (कश्मीर घाटी, जम्मू और लद्दाख) को देखा जबकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, गिलगित और बालतिस्तान के मुज़फ़्फ़राबाद को भी पूरी तरह से देखा है. अपने कश्मीर का मैंने वह क्षेत्र देखा जहां तक पाकिस्तानी कबाइली घुस आए थे जिन्हें भारतीय सैनिकों ने पीछे खदेड़ दिया था.1990 में पाकिस्तान के अपने दौरे के दौरान मैंने पाक अधिकृत कश्मीर का प्रमुख नगर मुज़फ़्फ़राबाद देखा जहां कोई भी कश्मीरी भाषी नहीं था, सभी लोग पंजाबी बोलते हैं.वहां के लोग अलबत्ता यह कह रहे थे कि अगर महाराजा कर्णसिंह फिर से सदर-ए-रियासत बन जाएं तो वह अपने छोड़े हुए देश में वापसी कर सकते हैं.भारत लौटने पर जब मैंने डॉ कर्णसिंह से वहां के लोगों की भावनाओं का उल्लेख किया तो वह हंस पड़े. बोले, सदर-ए-रियासत का पद तो मैं कब का त्याग चुका हूं. बहरहाल, आजकल कश्मीर अधिकृत क्षेत्र में पाकिस्तान सरकार की नीतियों के प्रति लोगों के विरोध के स्वर बहुत मुखर हो रहे हैं. उनके विद्रोही तेवरों को कुचलने की सरकार की तरफ से तमाम कोशिशें हो रही हैं. बहुत से लोगों के मारे जाने की भी खबरें हैं.

दूसरा और तीसरा युद्ध मैंने देखा, कवर किया और दोनों देशों के बीच अमन होने के बाद भी पाकिस्तान गया. वहां मैंने झाड़ियों से ढकी इचोगिल नहर भी देखी जिसे 1965 में पारकर भारतीय सेना लाहौर में प्रवेश कर गयी थी. लाहौर का बाटा का वह शोरूम भी देखा जहां तक हिंदुस्तानी फौज पहुंच गयी थी. वहां से मुश्किल से आठ किलोमीटर दूर ही मेन लाहौर रह गया था. इससे पहले कि हिंदुस्तानी फौज लाहौर में प्रवेश करती, युद्धविराम का ऐलान हो गया था. मैंने ताशकंद का वह स्थान भी देखा है जहां सोवियत संघ के प्रधानमंत्री अलैक्सी कोसीगिन की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच शांति समझौता हुआ था. शास्त्रीय जी की याद में वहां हिंदी पढ़ाने के लिए एक स्कूल था और उनकी अर्द्ध प्रतिमा भी. सबसे पहले मैं द्रास और करगिल 1969 में गया था जहां करगिल में पाकिस्तानी सैनिकों को सीमा की गश्त लगाते हुए देखा और चांगला चुशूल में चीनी सैनिकों को भी. 1999 की जंग खत्म होने के बाद भी गया था.

यही स्थिति 1971 के युद्ध की थी. युद्ध भी कवर किया. पाकिस्तानी जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाज़ी को आत्मसमर्पण कराने वाले जनरल जगजीतसिंह अरोड़ा से भी कई बार मिला और अमृतसर में जन्मे पंजाबी पारसी फील्ड मार्शल सैम मानेकशा से भी. और मैं मिला सांसद पीलू मोदी से कई बार जो भारत और पाकिस्तान के बीच हुए शिमला समझौते के चश्मदीद गवाह थे. पीलू मोदी से इस विषय पर मेरी लंबी मुलाकातें हुईं. वह कहते थे कि जितना वक़्त मैंने और ज़ुल्फी (पाकिस्तान  के राष्ट्रपति ज़ुल्फिकर अली भुट्टो को वह ऐसा ही संबोधित करते थे) ने एक साथ गुज़ारा उतना उसने इंदिरा गांधी से समझौता वार्ता में भी नहीं गुज़ारा होगा.

शिमला समझौते के ऐलान के बाद पीलू मोदी जब दिल्ली लौटे तो उनसे मिलने के लिए पत्रकारों की लाइन लग गयी. वह यह कहकर कि मुझे कुछ विश्राम करना है या और कोई बहाना बनाकर पत्रकारों को टरका दिया करते थे. हमारे संपादक रघुवीर सहाय ने भी किसी सहयोगी को पीलू मोदी से मिलने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी, शायद उन्होंने स्वयं भी प्रयास किया था. जब मेरे सहयोगी अपने प्रयासों में असफल रहे तो एक दिन सुबह ऑफिस में घुसते ही संपादक जी मेरे टेबल पर आकर बोले कि आप मेरे कक्ष में तुरंत आ जाएं. अब संपादक का आदेश मैं कैसे टाल सकता था. उनके पीछे पीछे ही उनके कक्ष में पहुंच गया. मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोले किआपने ‘दिनमान’ के लिए बहुत सी एक्सक्लुसिव स्टोरीज की हैं जो बहुत चर्चित रही हैं. मेरी सलाह है कि आप पीलू मोदी से मिलकर शिमला समझौते, उसकी पृष्ठभूमि और ज़ुल्फिकर अली भुट्टो से उनकी दोस्ती आदि पर एक बढ़िया सी और विस्तृत कवर स्टोरी बनाएं. मैंने मुस्कुराते हुए उनसे पूछ लिया कि क्या यह काम इतना आसान है. अभी कल ही तो वह शिमला से लौटे हैं, सुस्ता रहे होंगे. मुझ से भला वह क्योंकर मिलेंगे. लेकिन रघुवीर जी ने पूरे विश्वास से इस बात पर ज़ोर देकर कहा कि ‘वह आपसे ही मिलेंगे सबसे पहले, किसी दूसरे पत्रकार से नहीं’. न जाने मेरे संपादक को मुझ पर इतना भरोसा क्यों था.

संपादक के कक्ष से जब मैं बाहर निकला तो मेरी सहयोगी बनाम मित्र श्रीमती शुक्ला रुद्र ने पूछा, ‘क्या हुआ. सहाय जी बड़ी हड़बड़ी में आपको बुलाकर ले गए थे.’ मैंने उन्हें सारी बात बता दी. वह मुस्कुराईं और बोलीं ‘मुझे भी आप पर भरोसा है. चलिए पीलू मोदी के यहां जल्दी से फोन लगाइये और काम पर जुट जाइये.’ मेरे पास उनका फोन नंबर कहां है, डायरेक्टरी से देखना पड़ेगा. उन दिनों फोन नंबर तलाशने के लिए फोन डायरेक्टरी हुआ करती थी.अब वह ज़ोर से हंसीं और बोलीं, ‘आप जल्दी से निकालिए अपनी डायरी और फोन मिलाइए. आप मुझसे कुछ छुपा नहीं सकते.’ क्योंकि मैं पीलू मोदी को थोड़ा बहुत पहले से जानता था, इसकी जानकारी श्रीमती शुक्ला रुद्र को थी. उन दिनों मोबइल फोन तो होते नहीं थे. टेलीफोन एक्सचेंज की सहायता लेनी पड़ती थी. कई जगह जीरो सुविधा होती थी यानी जीरो घुमाने से डायल टोन मिल जाती थी. ‘दिनमान’ में भी ऐसा एक फोन था जिससे मैंने पीलू मोदी का फोन मिलाया. फोन उनके निजी सचिव कनु ने उठाया और पीलू मोदी को बज़र देकर पूछा कि दीप जी का फोन है! उधर से स्वीकृति मिलने पर कनु ने कहा कि लीजिए साहब से बात कीजिए. लैंडलाइन में ऐसी ही व्यवस्था होती थी. मुख्य फोन अमूमन निजी सचिव के पास रहा करता था जो भीतर घंटी देकर आगंतुक के बारे में साहब से पूछा करता था. उधर से आवाज़ आयी, ‘बोलो दीप, क्या बात है!’ मैंने कह कि मुझे मिलना है आपसे, आज ही. ठीक है शाम को आ जाओ.’ मैंने पूछा, ‘चाय पर या..’ पीलू मोदी ने कहा कि ‘आज चाय, पर फिर कभी जब पूरी तरह से थकान उतर जाएगी तो’. मैं करीब पांच बजे उनके लोदी एस्टेट आवास पर पहुंच गया. देखा एक बड़े से सोफे में धंसे बैठे थे. बैठे बैठे ही अपना हाथ आगे बढ़ाया. वह इतने मोटे थे कि उनके लिए सोफे से उठना आसान नहीं था. बोले, आज कोई नयी बात करनी है क्या! मैंने कहा कि ‘जी शिमला समझौता और ज़ुल्फिकर अली भुट्टो से आपकी दोस्ती की बाबत.’ वह बोले, ‘तुम्हें मालूम है कि इस विषय पर मैंने किसी पत्रकार से बात नहीं की है, तुम्हारे संपादक से भी नहीं.’ मैंने पीलू मोदी से कहा कि ‘मैं कोई नहीं हूं, यह आप बखूबी जानते हैं.’

खैर, वह मुझसे बातचीत करने के लिए राज़ी हो गए और बोले, कहां से शुरू करोगे. मैंने कहा कि दून स्कूल से लेकर बंबई (वर्तमान मुंबई) और बर्कले तक आपकी और ज़ुल्फिकर अली भुट्टो की दोस्ती के पार्श्व में जो आज तक पुख्ता है, उस बाबत. उस बारे में भी आपके अदन जाते हुए आठ साल बाद सुबह तीन बजे भुट्टो से कराची एयरपोर्ट के वीवीआईपी लाउंज में आप दोनों की मुलाक़ात से लेकर ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया’ में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के बारे में आपके इंटरव्यू तक.मैंने वह इंटरव्यू भी पढ़ रखा है और भुट्टो के जवाब से भी मैं परिचित हूं. लेकिन आज सिर्फ शिमला समझौते पर ही बात करूँगा. शिमला पहुंचने के लिए आपको किन किन दुश्वारियों से होकर गुज़रना पड़ा.

पीलू मोदी हंसे और बोले, तुम्हें अदन और कराची में भुट्टो से मिलने की खबर कहां से मिली! मैंने कहा कि आपसे. आपने ही तो एक बार बताया था कि अदन में बैंक ऑफ़ इंडिया की बिल्डिंग की डिज़ाइन का मुझे ज़िम्मा सौंपा गया है जिसके सिलसिले में मुझे कई बार अदन जाना पड़ेगा वाया कराची. अदन का उन दिनों बहुत महत्त्व था. वहां के सभी मुकद्दमों की सुनवाई बंबई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.सी. चागला किया करते थे. इसीलिए जस्टिस चागला ने सुप्रीम कोर्ट जाने का ऑफर ठुकरा दिया था. पीलू मोदी ने कहा कि अभी हम अतीत की ज़्यादा बातचीत नहीं करेंगे. बस इतना जान लो कि मैं देहरादून के दून स्कूल में पांच साल गुज़ारने के बाद जब मुंबई लौटा तो मुझे सभी कुछ बहुत नीरस और असहज लग रहा था और मैं एकाकीपन महसूस कर परेशान हो रहा था. कुछ समय के बाद हम लोग दिल्ली गए. मेरे माता पिता अपने सपनों का एक घर बनाना चाहते थे. इसके लिए एक आर्किटेक्ट (वास्तुकार) को बुलाया गया. उसने कुछ डिज़ाइन दिखाए जो मेरी माँ को नहीं रुचे. लेकिन मुझे इस का फ़ायदा यह हो गया कि मेरी रुचि आर्किटेक्ट बनने के प्रति हो गयी. लिहाज़ा मैंने मुंबई में जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में एडमिशन ले लिया. यहीं मेरी मुलाक़ात एक बार फिर ज़ुल्फिकार से हो गयी. अब हम लोगों के दिन की शुरुआत सुबह 7.30 बजे बैडमिंटन और स्क्वायश से होती. उसके बाद हम लोग करीब एक बजे तक तैराकी करते. घर आकर लंच करते. ज़ुल्फी भी अमूमन मेरे साथ होता. उसके बाद फिर निकल जाते,सिनेमा देखते और शाम को पूल के किनारे वक़्त गुज़ारते और डिनर हम लोग साथ साथ ही करते. उसके बाद टहलने के लिए निकल जाते और आधी रात के करीब अपने अपने घर जाते. हम दोनों के घर आसपास ही थे.

हमारी दोस्ती की कहानी बहुत लंबी है जो मैं तुम्हें बाद में विस्तार से बताऊंगा.मैंने तुम्हें कुछ झलकियां दिखा दी हैं. 1971 के युद्ध के बाद अब जब भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सामान्य करने की दिशा में बातचीत करने पर सहमति बनी तो मैंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि मैं दिल्ली में अपने घर भुट्टो और अपने कुछ पुराने साथियों के साथ एक पार्टी करना चाहता हूं, कृपया इसकी अनुमति प्रदान करें. क्योंकि इंदिरा गांधी का विदेश जाने का कार्यक्रम था इसलिए मैंने दो हफ्ते पहले ही अपना अनुरोध दर्ज करा दिया. इस पत्र की एक प्रति मैंने विदेशमंत्री सरदार स्वर्ण सिंह को भी भेज दी. जब पंद्रह दिनों तक कहीं से कोई जवाब नहीं आया तो मैंने सरदार स्वर्णसिंह को फोन किया. उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं के बीच शांति वार्ता शिमला में होने वाली है वहां ऐसे मिलन की कोई गुंजाइश नहीं. खैर, क्या मैं अपने दोस्त से मिलने के लिए शिमला आ सकता हूं. स्वर्णसिंह का उत्तर था कि इस आशय का अनुरोध पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो की ओर से आना चाहिए. मैंने कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं है.

अभी मैं ऊहापोह की स्थिति में था कि मेरे मित्र गौतम खन्ना ने फोन करके बताया कि राय बहादुर मोहन सिंह ओबेराय अगले दिन सुबह शिमला जा रहे हैं, क्या वीना और मैं भी उनके साथ चल सकते हैं! मैंने बिना हिचक के अपनी सहमति दे दी और हम लोग अगले दिन दोपहर
Trilok Deep3.30 बजे शिमला पहुंच गए. जब सरदार स्वर्णसिंह से मेरा संपर्क नहीं हो पाया तो मैंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के सैन्य सचिव को अपने शिमला पहुंचने की खबर दे दी. मेरा संदेश मिलते ही भुट्टो ने अपने एक सुरक्षा अधिकारी के साथ मुझे लेने के लिए कार भेज दी. मैं और वीना उनसे मिलने के लिए हिमाचल भवन पहुंच गए. वहां हम करीब ढाई घंटे रहे और अपने पुराने दिनों को याद किया और एक दूसरे के परिवार की भी कुशलक्षेम पूछी और जानी. यह बात 28 जून, 1972 की है. क्योंकि शिखर वार्ता का कोई अतापता नहीं था इसलिए अगले दिन हम लोग सुबह 11 बजे से 3.30 बजे तक एक साथ रहे पुरानी मधुर यादों में खोये हुए.                       .. त्रिलोक दीप .                                                                                                              ….. …..….(अगले अंक में जारी)

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