राजस्थान के धोरों के बीच मौजूद है ‘ज्ञान का भंडार’ एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी भादरिया में
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री त्रिलोक दीप का अविभाजित गुजरात एवं रावलपिंडी से लोकसभा सचिवालय होते हुए जोधपुर एवं राजस्थान का सफरनामा…(अंतिम भाग)
अमेरिका जाने के मुझे दो अवसर मिले 1979 और 1983 में. 1979 में मैं अमेरिकी सरकार का मेहमान था एक माह के लिए जबकि 1983 की मेरी निजी यात्रा थी.राजधानी वाशिंगटन में स्थित लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस (कांग्रेस पुस्तकालय)को दुनिया के सबसे बड़े
पुस्तकालयों में से एक माना जाता है. 24 अप्रैल, 1800 में स्थापित इस पुस्तकालय के कार्यों की देखभाल कांग्रेस का लाइब्रेरियन करता है जिसके अधीन तीन हज़ार से अधिक कर्मचारी काम करते हैं. एक अनुमान के अनुसार यहां पर 175 मिलियन वस्तुएं हैं. यहां पर 470 से अधिक भाषाओं में शोध की सामग्री शामिल है. यह लाइब्रेरी तीन भवनों में विभाजित है. इसमें करोड़ों पुस्तकें, नक्शे, पाण्डुलिपियाँ, ऐतिहासिक तस्वी
रें और फ़िल्में संग्रहित हैं. इस लाइब्रेरी में पुस्तकों का वर्गीकरण है जैसे भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य को वर्ग ‘पी’ (भाषा और साहित्य) के अंतर्गत सबक्लास ‘पीके’ में ऱखा गया है. ‘पीके’ 1931-2212 में हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी भाषायें और साहित्य आता है. हिंदी भाषा की पुस्तकें पीके 1931-1970 के बीच आती हैं जबकि उर्दू 1971-1979.5 के अंतर्गत. यह वर्गीकरण प्रणाली बड़ी अकादमिक और अनुसंधान पुस्तकालयों में दक्षिण एशियाई भाषा संग्रह को व्यवस्थित करने के लिए उपयोग में लायी जाती है. मैंने इस वर्गीकरण व्यवस्था का प्रदर्शन देखने के लिए पहले ‘दिनमान’ के पुराने अंक देखने की मांग की गयी, कुछ समय में हाजिर हो गए. ऐसे ही अज्ञेय की पुस्तकें भीं देखने को मिल गयीं. मुझे यह बताया गया कि वर्गीकरण व्यवस्था से पाठकों और कर्मचारियों के लिए पुस्तकों व दस्तावेजों को जल्दी और सटीक रूप से ढूंढा जा सकता है. इससे समय की बचत भीं होती है और बिना किसी कठिनाई के ज़रूरत की जानकारी भीं प्राप्त की जा सकती है. दिल्ली स्थित अमेरिकन लाइब्रेरी में भीं ऐसी ही वर्गीकरण की व्य
वस्था है. उस लाइब्रेरी में हर भाषा के जानकार मिल जाएंगे. मुझे हिंदी और पंजाबी जानने और बोलने वाला व्यक्ति मिल गया जिसने मेरी हर क्वेरी का निराकरण किया.
मुझे इस बात पर नाज़ है कि राजस्थान के धुर गांवों-ढाणी तक जाने के मुझे कई अवसर मिले हैं । 1968 में मुझे पहली बार खादी ग्रामोद्योग के सौजन्य से एक हफ्ते के लिए कार से राजस्थान के मारवाड़ और मेवाड़ देखने का अवसर मिला जबकि 1992 में पैलेस ऑन व्हील्स से मारवाड़ और मेवाड़ के अतिरिक्त सवाई माधोपुर और भरतपुर भी देखने को मिले, हालांकि ‘दिनमान’ में रहते हुए ये दोनों क्षेत्र
पहले मैं देख चुका था।लेकिन सही मायने में राजस्थान मंथन मैंने डालमिया सेवा ट्रस्ट से जुड़ने के बाद किया – 1997 से 2017 तक। इसी दौर में मुझे कई बार भादरिया गांव और शक्तिपीठ के दर्शन करने के अवसर मिले और भादरिया महाराज के भी.
राजस्थान के इस थार मरुस्थल की भीषण गर्मी में कदम कदम पर जहां परेशानियां मुंह बाय खड़ी रहती हैं वहां यह भूमिगत वातानुकूलित पुस्तकालय सुकून प्रदान करता है । थार मरुस्थल भारत और पाकिस्तान के दो लाख किलोमीटर में फैला हुआ है । इसमें करीब 62 प्रतिशत क्षेत्र राजस्थान में पड़ता है । इसकी जद में जोधपुर, जैसलमेर,बाड़मेर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, बीकानेर आदि इलाके आते हैं जबकि पाकिस्तान का सिंध और कुछ पश्चिमी पंजाब के हिस्से । बीच बीच में नखलिस्तान देखने को मिल जाते हैं जैसे भादरिया गांव और वहां स्थित शक्तिपीठ भादरिया राय मंदिर, गौशाला और भूमिगत लाइब्रेरी ।आजकल एक तर
फ थार मरुस्थल से तेल और गैस की खोज हो रही है तो कुछ लोग इस्राइल से शिक्षा प्राप्त कर अपनी बालू वाली ज़मीन को ज़रखेज बनाने के काम में जुटे हुए हैं । बावजूद इनके भादरिया लाइब्रेरी के प्रति आकर्षण लगतार बढता जा रहा है । सुना तो यह भी जाता है कि कुछ विदेशी बौद्धिक, विद्वान, जिज्ञासु और ज्ञान पिपासु भी इस पुस्तकालय का लाभ उठा रहे हैं । कहा भी जाता है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए जिज्ञासु के मार्ग में आने वाले अवरोध,व्यवधान और अड़चनें उसके लक्ष्य प्राप्ति के आड़े नहीं आ सकतीं। अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं में शामिल होने वाले लोगों के लिए धोरों में मौजूद यह ज्ञान भंडार किसी अमूल्य निधि से कम नहीं. — त्रिलोक दीप
*(pics credit-pigtail.ruralindiaonline.org, and People’s Archives of Rural India)
