आपदा का अलार्म देगा सैटेलाइट! रिमोट सेंसिंग और GIS कैसे बचाएंगे जान-माल, जानिए सबकुछ
देहरादून — उत्तरकाशी के धराली गांव में हाल में आई आपदा के बाद उत्तराखंड में यह बहस तेज हो गई है कि क्या पहाड़ों में आपदा का पूर्वानुमान पहले से लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों की राय में, रिमोट सेंसिंग और GIS (भौगोलिक सूचना प्रणाली) तकनीक की मदद से ऐसी आपदाओं को पहले से भांपना अब संभव है।
राज्य सरकार ने इन तकनीकों से जुड़ी प्रयोगशालाओं को और अधिक सक्रिय करने के निर्देश दिए हैं। इन प्रयोगशालाओं में सैटेलाइट, सेंसर और कंप्यूटर आधारित विश्लेषण के जरिए ज़मीन, जलवायु और वातावरण में हो रहे बदलावों की निगरानी की जाती है।
क्या है रिमोट सेंसिंग?
रिमोट सेंसिंग का अर्थ है — किसी स्थान से दूर रहकर उस स्थान की जानकारी प्राप्त करना। यह तकनीक सूर्य की रोशनी और धरती से परावर्तित होने वाली ऊर्जा (विकिरण) पर आधारित होती है। जब सूर्य की किरणें धरती पर पड़ती हैं, तो वे विभिन्न सतहों से अलग-अलग प्रकार से परावर्तित होती हैं।
अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट इन परावर्तनों को रिकॉर्ड करते हैं और वैज्ञानिक इन आंकड़ों का विश्लेषण कर यह समझते हैं कि किसी क्षेत्र में नमी, बादलों की संरचना या ज़मीन की गतिविधियों में क्या असामान्य हो रहा है।
GIS कैसे करता है काम?
GIS यानी Geographic Information System, एक कंप्यूटर तकनीक है जो विभिन्न स्रोतों जैसे सैटेलाइट तस्वीरें, सेंसर डेटा और फील्ड सर्वे से प्राप्त जानकारियों को मिलाकर एक समेकित नक्शा और विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
यदि किसी क्षेत्र में बारिश के बाद नमी अत्यधिक बढ़ जाती है, तो GIS यह आंकलन करता है कि उस क्षेत्र में भूस्खलन की कितनी संभावना है। इसी तरह बादलों का तेज़ जमाव होने पर यह तकनीक संभावित बाढ़ की चेतावनी भी दे सकती है।
विशेषज्ञों की राय
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. अजय पॉल का कहना है कि यह तकनीक पहाड़ी क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो सकती है। उन्होंने बताया कि इसरो ने हाल ही में एक सैटेलाइट लॉन्च किया है जो पहाड़ों में बादल बनने की स्थिति पर तुरंत अलर्ट देगा। इससे यह भी पता चलेगा कि किन गांवों पर इसका सीधा असर हो सकता है।
GIS के फायदे
राज्य आपदा प्रबंधन सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष विनय रूहेला के अनुसार, GIS तकनीक न केवल आपदा का पूर्वानुमान लगाने में मदद करती है, बल्कि आपदा के बाद हुए नुकसान का मूल्यांकन करने में भी अहम भूमिका निभाती है।
यह तकनीक घटना से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना करके यह बताती है कि कहां कितना नुकसान हुआ है और किन क्षेत्रों को प्राथमिकता से राहत की जरूरत है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड जैसे भूकंपीय और संवेदनशील पहाड़ी राज्य में रिमोट सेंसिंग और GIS तकनीक आने वाले समय में आपदा प्रबंधन का मजबूत आधार बन सकती है। यह न सिर्फ जान-माल की रक्षा कर सकती है, बल्कि सरकार और प्रशासन को समय रहते निर्णय लेने में भी सक्षम बनाएगी।