हरियाणा: VIP नंबर रजिस्ट्रेशन घोटाले में परिवहन विभाग के तीन कर्मचारी गिरफ्तार, 45,31,621 रुपए की ठगी

हरियाणा: परिवहन विभाग, चंडीगढ़ में वाहनों के वीआईपी नंबर पंजीकरण घोटाले के मामले में यूटी पुलिस ने तीन कर्मचारियों को गिरफ्तार किया है। इस घोटाले में वर्ष 2013 में आरोपी ने 37 वाहनों का पंजीकरण कराकर 45,31,621 रुपये की सरकारी खजाने से ठगी की थी. गिरफ्तार आरोपियों की पहचान शिव कुमार निवासी मोहाली, विनय ढल निवासी सलारा मोहल्ला रोहतक, राजिंदर सिंह निवासी अर्बन हाउस सेक्टर-70 गुरुग्राम के रूप में हुई है.
24 जनवरी 2017 को मुख्यमंत्री फ्लाइंग स्क्वायड की डीएसपी पूर्णिमा सिंह की शिकायत पर थाना-17 में आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. मामला सामने आने के बाद आरोपी द्वारा पूरी राशि भी सरकारी खजाने में जमा करा दी गई।
इससे पहले मामले के आरोपियों को चंडीगढ़ सत्र न्यायाधीश की अदालत से अग्रिम जमानत मिली थी. पुलिस की ओर से बताया गया कि चंडीगढ़ के सेक्टर 19 निवासी रवींद्र सिंह ने सबसे पहले वर्ष 2014 में पुलिस महानिरीक्षक व हरियाणा के मुख्यमंत्री फ्लाइंग स्क्वॉड को शिकायत की थी.
कई कर्मचारियों की मिलीभगत से घोटाला: शिकायत में बताया गया कि हरियाणा परिवहन आयुक्त कार्यालय में वीआइपी नंबरों के पंजीयन शुल्क में करोड़ों रुपये की ठगी हो रही है. हरियाणा सरकार की अधिसूचना के अनुसार, 001 से 0100 तक के नए वाहनों के पंजीकरण नंबर अतिरिक्त पंजीकरण शुल्क के साथ जारी किए गए हैं। लेकिन यह पैसा सरकारी खजाने में जमा नहीं हुआ। कम्प्यूटरीकृत पंजीकरण 1 मार्च 2013 से शुरू किया गया था। अक्टूबर 2013 तक कुल 2400 वाहनों का कंप्यूटर के माध्यम से पंजीकरण किया गया था।
इनमें से 37 वाहनों की फर्जी रसीदें वाहन मालिकों से पैसे लेकर जारी की गईं, लेकिन सरकारी खजाने में जमा नहीं कराई गईं और आरोपियों ने आपस में मिलीभगत कर रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी कर दिए. इन 37 वाहनों के पंजीकरण शुल्क की कुल राशि 45,31,621 रुपये पाई गई। विनय कुमार ढल उस समय हरियाणा परिवहन विभाग, चंडीगढ़ में सहायक के पद पर तैनात थे। जांच में पाया गया कि विनय कुमार ढल ने शिव कुमार (कंप्यूटर ऑपरेटर) और राजिंदर कुमार (कैशियर) के साथ मिलीभगत कर उपरोक्त राशि का गबन किया।
ऑडिट में उजागर हुआ मामला: पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में खुलासा हुआ कि आरोपियों ने आपस में साजिश कर वाहनों के वीआइपी रजिस्ट्रेशन नंबर जारी करने के एवज में मोटी रकम ले ली, लेकिन उतनी राशि सरकारी खजाने में जमा नहीं की. उसने खुलासा किया कि कैशियर राजिंदर सिंह भी उसकी मदद करता है और रकम को आपस में बराबर बांट लिया गया। मामला तब सामने आया जब विभाग में ऑडिट कराया गया।
Comments are closed.