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सावित्री जिनकी बुद्धिमत्ता ने यमराज को भी किया पराजित !

सती सावित्री: भारतीय परंपरा में सती सावित्री, सीता, कुंती, द्रौपदी, तारा आदि को प्रातः स्मरणीय नारियों के रुप में वंदनीय माना जाता रहा है। इन सभी स्त्रियों में एक विशेष बात ये थी कि ये अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाली रही थीं।

सती ने अपने पिता के विरोध में उन शिव से विवाह किया था ,जिनसे वो प्रेम करती थीं। सती का शिव से विवाह एक विद्रोह से कम नहीं था। सती ने आत्मदाह भी किया तो अपने प्रेम के लिए । वो अपने पति शिव की निंदा सह नहीं सकती थीं। जब उनके पिता दक्ष के उनके पति शिव को अपमानित किया तो भी सती अपने पिता से लड़ पड़ीं और उन्होंने यज्ञकुंड में आत्मदाह कर लिया।

सावित्री और सत्यवान की कथा को भी आमतौर पर एक अबला नारी के पतिव्रत्य धर्म की जीत के रुप में दिखाया जाता रहा है । लेकिन महाभारत के वन पर्व की कथा को ध्यान से पढ़ने से हमें ये पता चलता है कि किस प्रकार सावित्री ने अपनी बुद्धिमत्ता और वाक् चातुर्य से अपने मृत पति सत्यवान को पुनः जीवित करने में सफलता प्राप्त की थी।

मूल कथा यही है कि सावित्री अपनी इच्छा से अपने वर के रुप में सत्यवान का चुनाव करती हैं। सत्यवान के पिता अश्वपति अंधे थे और उन्हें अपने राज्य से च्युत होकर वन में रहना पड़ रहा था। ये सब जानते हुए भी सावित्री ने सत्यवान से अपनी इच्छा से विवाह किया था।

सावित्री को ब्रह्मा की पत्नी सावित्री का ही अवतार माना जाता है। वो इतनी तेजस्वी थीं कि उनके तेज को धारण करने में कोई भी पुरुष सक्षम नहीं था। लेकिन सावित्री ने विवाह के लिए सत्यवान जैसे तपस्वी और तेजस्वी पुरुष का चुनाव किया।

सत्यवान के बारे में ये भविष्यवाणी थी कि वो अल्पायु होंगे और एक खास तिथि को उनकी मृत्यु हो जाएगी । वो दिन जब आया तो सावित्री ने दिन भर उपवास किया औऱ अपने पति के साथ लकड़ी लाने के लिए जंगल चली गईं। सत्यवान को सिर में तेज दर्द हुआ और वो मृत हो गए।

सावित्री ने देखा कि सत्यवान के पास एक दिव्य पुरुष खड़ा है । सावित्री ने उस दिव्य पुरुष का परिचय पूछा तो उस दिव्य पुरुष ने अपना नाम यमराज बताया ।

यमराज ने कहा कि वो सत्यवान की आत्मा को ले जाने के लिए आए हैं। सावित्री भी यमराज के पीछे- पीछे चल पड़ीं। यमराज ने सावित्री से कहा कि वो वापस लौट जाएँ क्योंकि अभी सावित्री का जीवन बाकी है । सावित्री कहा कि जहाँ उनके पति हैं, वहीं उनका होना धर्म हैः-

यत्र में नीयते भर्ता स्वयं वा यत्र गच्छति।
मया च तत्र गन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ।।
महाभारत , वन पर्व अध्याय 297, श्लोक 21

अर्थः- “जहाँ मेरे पति ले जाये जाते हैं अथवा स्वयं ये जहाँ जा रहे हैं , वहीं मुझे भी जाना चाहिए, यही सनातन धर्म है ।“
इसके बाद सावित्री अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करते हुए यमराज को निरुत्तर करती हैं

सावित्री उवाच–
प्राहुः साप्तपदं मैत्रं बुधास्तत्वार्थदर्शिनः ।
मित्रतां च पुरस्कृत्य किंचित् वक्ष्यामि तच्छृणु।।
महाभारत, वन पर्व अध्याय 297, श्लोक 23

अर्थः- सावित्री बोलीं- “ तत्वार्थदर्शी विद्वान ऐसा कहते हैं कि सात कदम साथ चलने से मैत्री संबंध स्थापित हो जाता है , इसी मित्रता को सामने रख कर मैं आपसे कुछ निवेदन करुंगी उसे सुनिए।“

इसके बाद सावित्री यमराज के सामने अपने धर्म ज्ञान का परिचय देती हैं जिससे यमराज संतुष्ट हो जाते हैं और सावित्री से एक वरदान मांगने के लिए कहते हैं-

यम उवाच –
निर्वत तुष्टोSस्मि तवानया गिरा
स्वराक्षरव्यंजन हुतुयुक्तया ।
वरं वृणीष्वेह विनास्य जीवितं
ददानि ते सर्वमनिंदिते वरम्।।
महाभारत, वन पर्व , अध्याय 297, श्लोक 26

अर्थः-यमराज बोले- “अनिंदिते ! तू लौट जा । स्वर, अक्षर , व्यंजन एवं युक्तियों से युक्त तेरी इन बातों से मैं बहुत प्रसन्न हूँ । तू यहाँ मुझसे कोई वर मांग ले । सत्यवान के जीवन के सिवा मैं और सब कुछ तुझे दे सकता हूँ।“

सावित्री ने यमराज को पहली बार निरुत्तर करने के बाद उनसे स्वयं के लिए नहीं बल्कि अपने अंधे श्वसुर द्युमत्सेन के लिए वरदान के रुप में आँखो की ज्योति माँग ली ।

इसके बाद यमराज से सावित्री को लौट जाने के लिए कहा ,लेकिन सावित्री ने लौटने से इंकार कर दिया और फिर एक और युक्ति लगा कर यमराज को एक और वर देने के लिए विवश कर दिया ।

सावित्री उवाच-
सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं
ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते।
न चाफलं सत्पुरुषेण संगतं
ततः सतां सन्निवसेत समागमे।।
महाभारत, वन पर्व , अध्याय 297 , श्लोक 30

अर्थः सावित्री ने कहा – “ सत्पुरुषों का एक बार समागम भी अत्यंत अभिष्ठ होता है । उनके साथ मित्रता हो जाना उससे भी बढ़कर बताया गया है। साधु पुरुष का संग कभी निष्फल नहीं होता । अतः सदा सत्पुरुषों के समीप ही रहना चाहिए।“

पहले सावित्री ने यमराज को मित्र बनाया , इसके बाद सावित्री ने यमराज को सत्पुरुष कह कर उन्हें प्रसन्न कर लिया । यमराज एक बार फिर से वरदान देने के लिए विवश हो गए। एक बार फिर सावित्री ने अपने लिये वरदान नहीं मांगा बल्कि अपने श्वसुर द्युमत्सेन को उनका राज्य प्राप्त करने का वरदान यमराज से मांग लिया। यमराज एक बार फिर विवश थे । उन्होंने सावित्री के श्वसुर का राज्य वापस करने का वरदान दे दिया ।
यमराज ने एक बार फिर सावित्री से लौट जाने का आग्रह किया । लेकिन सावित्री ने फिर अपने वाक् चातुर्य के द्वारा यमराज को एक और वरदान देने के लिए मजबूर कर दिया –

सावित्री उवाच-
प्रजास्त्वयैता नियमेन संयता
नियम्य चैनानयसे निकामया ।
ततो यमत्वं तव देव विश्रुतं
निबोध चेमां गिरमीरितां मया ।।
महाभारत, वन पर्व , अध्याय 297 , श्लोक 34

अर्थः- सावित्री बोलीं- “देव! इस सारी प्रजा को आप नियम से संयम में रखते हैं और उसका नियमन करके आगे अपनी इच्छा से विभिन्न लोकों में ले जाते हैं। इसलिए आपका ‘यम’ नाम सर्वत्र विख्यात है । मैं जो बात कहती हूँ उसे आप सुनिये।“

एवं प्रायश्च लोकोSयं मनुष्याः शक्तिपेशलाः ।
सन्तस्त्वेवाप्यमित्रेषु दयां प्राप्तेषु कुर्वते ।।
महाभारत, वन पर्व, अध्याय 297, श्लोक 36

अर्थः- सावित्री बोलीं- “प्रायः इस संसार के लोग अल्पायु होते हैं। मनुष्यों की शक्तिहीनता तो प्रसिद्ध ही है । आप जैसे संत महात्मा तो अपनी शरण में आए हुए शत्रुओं पर भी दया करते हैं। ( फिर आप हम जैसे दीन मनुष्यों पर दया क्यों नहीं करेंगे?)।”

पहले वरदान के पूर्व सावित्री ने यमराज को अपना मित्र बनाया । दूसरे वरदान के पूर्व उन्हें सत्पुरुष कह कर उन्हें प्रसन्न कर लिया ( क्योंकि लोग यमराज को भयंकर मानते हैं , लेकिन सावित्री ने उन्हें सत्पुरुष कह कर उनकी प्रशंसा की थी) । तीसरे वरदान के पूर्व सावित्री ने उन्हें दयावान संत का दर्जा दे दिया । अब यमराज के पास कोई चारा नहीं रहा , उन्होंने फिर से सावित्री से एक और वरदान मांगने के लिए कहा ।

सावित्री ने एक बार फिर अपने लिए कुछ नहीं मांगा। सावित्री ने इस बार अपने पिता अश्वपति के लिए सौ पुत्रों का पिता होने का वरदान मांगा। प्रसन्न यमराज ने सावित्री को वो तीसरा वरदान भी दे दिया , लेकिन अभी तक यमराज सत्यवान को फिर से जीवित करने के लिए तैयार नहीं थे ।

यमराज ने एक बार फिर सावित्री को लौट जाने के लिए कहा । सावित्री ने आखिरी युक्ति ऐसी निकाली जिसका कोई जवाब यमराज के पास भी नहीं था-

सावित्री उवाच-
विवस्वतस्त्वं तनयः प्रतापवां-
स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे बुधैः ।
समेन धर्मेण चरन्ति ताः प्रजा-
स्ततस्तवेहेश्वर धर्मराजता।।
महाभारत, वन पर्व , अध्याय 297, श्लोक 41

अर्थः- सावित्री बोलीं- “देवेश्वर! आप विवस्वान( सूर्य) के प्रतापी पुत्र हैं, इसलिए विद्वान पुरुष आपको वैवस्वत कहते हैं। आप समस्त प्रजा के साथ समतापूर्वक धर्मानुसार आचरण करते हैं , इसलिए आप धर्मराज कहे जाते हैं।“

आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु यः ।
तस्मात् सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणयमिच्छति।। 42।।

अर्थः सावित्री बोलीं- “मनुष्य को अपने आप पर भी उतना विश्वास नहीं होता है जितना संतो पर होता है । इसलिए ये सब लोग संतों से विशेष प्रेम करना चाहते हैं।“

सौह्दात सर्वभूतानां विश्वासो नाम जायते।
तस्मात् सत्सु विशेषेण विश्वासं कुरुते जनः ।। 43।।

अर्थः-सावित्री बोलीं- सौहार्द से ही समस्त प्राणियों का एक दूसरे के प्रति विश्वास उत्पन्न होता है। संतो में सौहार्द होने के कारण ही सब लोग उन पर अधिक विश्वास करते हैं।“

सावित्री ने यमराज को ‘संत’ कह कर उनका ‘सौहार्द’ प्राप्त करने का प्रयास किया। यमराज जो अब तक सावित्री से ‘मित्रता’ के बंधन में बंध चुके थे, ‘सत्पुरुष’ बना कर सावित्री उनके साथ सत्संग का लाभ उठा कर वरदान प्राप्त कर चुकी थी । यमराज को दयालु बता कर तीसरा वरदान भी दया स्वरुप प्राप्त कर चुकी थी। अब सावित्री ने ‘सौहार्द और परस्पर विश्वास का संबंध’ यमराज से स्थापित कर लिया।

यमराज इस सौहार्द और विश्वास के संबंध से कुछ इस तरह घिरे कि उन्होंने सावित्री से एक और वरदान मांगने के लिए कह ही दिया, लेकिन यमराज अभी भी सत्यवान को जीवित करने के अतिरिक्त ही कोई वरदान देने के लिए तैयार थेः-

यम उवाच-
उदाह्रतं ते वचनं यदंगने
शुभे न ताद्दक्त्वद्दते श्रुतं मया।
अनेन तुष्टोSस्मि विनास्य जीवितं
वरं चतुर्थं वरयस्व गच्छ च।। 44।।

अर्थः- यमराज बोले- “कल्याणि! तूने जैसी बात कही है , वैसी मैंने तेरे सिवा किसी दूसरे के मुख से नहीं सुनी है। शुभे! तेरी इस बात से मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तू सत्यवान के जीवन के सिवा कोई और चौथा वर मांग ले और यहाँ से लौट जा ।“

सावित्री ने यमराज के वरदान मांगने के आदेश पर ऐसी युक्ति लगाई जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती । सावित्री ने सीधे – सीधे सत्यवान का जीवन नहीं मांगा बल्कि एक ऐसा वरदान मांगा जिसके बाद यमराज के पास सत्यवान को जीवित करने के अलावा और कोई रास्ता बच ही नहीं गया –

सावित्री उवाच-
ममात्मजं सत्यवतस्तथौरसं
भवेदुभाभ्यामिह यत् कुलोद्वहम्।
शतं सुतानां बलवीर्यशालिना-
मिदं चतुर्थे वरयामि ते वरम्।।
महाभारत, वन पर्व , अध्याय 297 , श्लोक 45

अर्थः- सावित्री बोलीं – “मेरे और सत्यवान् – दोनों के संयोग से कुल की वृद्धि करने वाले , बल और पराक्रम से सुशोभित सौ औरस पुत्र हों। यह मैं आपसे चौथा वर मांगती हूँ।“

इस वरदान में सावित्री ने ये स्पष्ट कर दिया कि उनके औरस पुत्र सत्यवान से ही हों। अब ये स्पष्ट नहीं था कि सत्यवान शरीर धारण करके पुत्र उत्पन्न करेंगे या फिर अशरीरी रुप में यमराज के चमत्कार के द्वारा सावित्री को सत्यवान से पुत्रों की प्राप्ति होगी?

यमराज उवाच-
शतं सुतानां बलवीर्यशालिनां
भविष्यति प्रीतिकरं तवाबले।
परिश्रमस्ते न भवेन्नृपात्मजे
निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ।। 46।।
महाभारत, वन पर्व, अध्याय 297,श्लोक 46

अर्थः- यमराज बोले- “अबले ! तुझे बल और पराक्रम से संपन्न सौ पुत्र प्राप्त होंगे, जो तेरी प्रसन्नता को बढ़ाने वाले होंगे। राजकुमारी! अब तू लौट जा , जिससे तुझे थकावट न हो। तू रास्ते से बहुत दूर चली आई है।“

यमराज इतनी देर में सावित्री की बुद्धि , धर्मज्ञान और उनके गुणों से इतने प्रभावित हो चुके थे कि उन्हें याद ही नहीं रहा कि बिना पति के संयोग से औरस पुत्रों की प्राप्ति संभव ही नहीं है। यमराज ने बिना विचार किए ही सावित्री के ज्ञान से वशीभूत होकर यह वरदान दे दिया।

सावित्री ने यमराज को इस भूल की तरफ ध्यान दिलाते हुए कहा कि –

सावित्री उवाच-
न तेSपवर्गः सुकृताद् विनाकृत –
स्तथा यथान्येषु वरेषु मानद ।
वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं
यथा मृता ह्रवेमहं पतिं विना।।
महाभारत, वन पर्व, अध्याय 297, श्लोक 52

अर्थः- सावित्री ने कहा- “मानद ! आपने मुझे जो पुत्र प्राप्ति की वरदान दिया है , वह पुण्यमय दांपत्य संयोग के बिना सफल नहीं हो सकता । अन्य वरों की जैसी स्थिति है , वैसी इस अंतिम वरदान की नहीं है। इसलिए मैं पुनः यह वर मांगती हूँ कि ये सत्यवान जीवित हो जाएं, क्योंकि पति के बिना मैं मरी हुई के समान ही हूँ।“

यमराज के पास अब सत्यवान को जीवित करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा। यमराज ने सत्यवान को जीवित कर दिया और सावित्री ने अपने बुद्धि और कौशल से अपने पति को पुनः प्राप्त कर लिया।

सावित्री कितनी सक्षम स्त्री थीं यही वट सावित्री व्रत की कथा का सार है । सावित्री ही नहीं सीता जी भी इतनी सक्षम स्त्री थीं कि वो त्रिलोक विजयी रावण की लंका में अपह्त होने के बावजूद रावण के साथ जो संवाद स्थापित करती हैं उसमें उनकी निडरता और अपनी पति श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम ही स्थापित होता है।

द्रौपदी न केवल अपने पतियों के साथ वन गमन करती हैं बल्कि वो लगातार युधिष्ठिर और अन्य पांडवों को प्रोत्साहित करती रहती हैं। तारा अपने पति वालि को लगातार सही शिक्षा देने की कोशिश करती रहती हैं। यही सनातन धर्म में स्त्रियों की सम्मानित और सबल स्थिति की परंपरा रही है।

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