हर साल करोड़ों भारतीय महंगे होते उपचार के कारण आर्थिक रूप से बर्बादी के कगार पर पहुंच जाते हैं
हमारे सामुदायिक स्वास्थ्य विषेषज्ञ *डॉ नरेश पुरोहित (सलाहकार, राष्ट्रीय हॉस्पिटल प्रबंधन एसोसिएशन), भारत में महंगे इलाज़ की समस्या से जूझती गरीब जनता के विषय पर चर्चा करते हुए
नई दिल्ली : स्वास्थ्य क्षेत्र में स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है जिसके चलते हर साल करोड़ों भारतीय महंगे होते उपचार के कारण आर्थिक रूप से बर्बादी के कगार पर पहुंच जाते हैं।
“एगोनी ऑफ हेल्थ केयर इन इंडिया” शीर्षक से हाल ही में तैयार कि गई अपनी शोध अध्ययन रिपोर्ट के आधा र पर भारतीय चिकित्सा अकादमी फॉर प्रिवेंटिव हेल्थ के कार्यकारी सदस्य डॉ. नरेश पुरो

हित ने यहां बताया कि सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं, आधारभूत संरचना, चिकित्सकों, दवाइयों, कुशल और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, कमरे और दूसरी सुविधाओं की कमी है। इन्हीं अभावों के कारण देश में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र को विस्तार करने का मौका मिल गया, जिसका गरीब लोगों से कोई वास्ता नहीं जबकि स्वास्थ्य सेवा किसी भी देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति का एक महत्त्वपूर्ण मापदंड है, क्योंकि बिना स्वस्थ समाज के किसी भी देश का आर्थिक, औद्योगिक और सांस्कृतिक विकास संभव नहीं है।
इस विषय पर चिंता जाहिर करते हुए फेडरेशन ऑफ हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेटर्स के प्रमुख अन्वेषक, डॉ. पुरोहित ने बताया कि देश में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने की वजह से आबादी का बड़ा हिस्सा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। जनमानस को बेहतर इलाज के लिए भटकना पड़ता है। देश में अस्पतालों और चिकित्सकों की उपलब्धता जनसंख्या घनत्व के हिसाब से बहुत कम है।
प्रख्यात चिकित्सक एवं शोधार्थी ने बताया कि असली भारत गांव में बसता है, मगर गांव के लोगों की सेहत की देखभाल करने वाले चिकित्सा केंद्र आज भी बदतर ही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सा विशेषज्ञों का टोटा है।
उन्होंने चेताया कि शहर और गांव के बीच एक ऐसी खाई बन गई है कि इसके नतीजे भविष्य में काफी भयावह हो सकते हैं। भले ही देश में तरक्की के कितनी भी दावे किए जाएं, पर गांवों में करीब 60 से 70 फीसद चिकित्सा विशेषज्ञों की कमी होना अपने आप में कई
सवाल पैदा करता है।
एसोसिएशन ऑफ स्टडीज फॉर हेल्थकेयर के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर ने कहा कि एक रपट के अनुसार अस्पतालों के भारी-भरकम बिल भरने की वजह से भारत में हर साल करीब छह करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। ऐसे लोग उपचार के लिए कर्ज लेते हैं।
इसका प्रमुख कारण सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं तक आम लोगों की पहुंच नहीं होना है।
उन्होने आगे कहा कि निस्संदेह सरकार हर साल स्वास्थ्य सेवाओं पर करोड़ों रुपए का बजट पेश करती है, लेकिन आज भी देश की स्वास्थ्य सेवाएं सवालों के घेरे में हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाल स्थिति किसी से छिपी नहीं है।
उन्होंने जानकारी दी कि कनाडा, डेनमार्क, स्वीडन, नार्वे, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में दुनिया की सबसे अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं दी जा रही हैं। मगर भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में बिना ज्यादा पैसे खर्च किए, अच्छी स्वाथ्य सेवाएं नहीं मिल पाती हैं। जाहिर है, आबादी लगातार बढ़ने के बावजूद आधारभूत ढांचे में सुधार पर जितना ध्यान देना चाहिए, उतना नहीं दिया गया। यह विडंबना तब है, जब देश में इन समस्याओं से निपटने हेतु सभी जरूरी कार्यक्रम और नीतियां मौजूद हैं, लेकिन इन्हें ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है। हालांकि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के क्रियान्वयन के बावजूद भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवता मे कोई परिवर्तन नही आया।
उन्होने फिक्की के एक हालिया सर्वे के हवाले से बताया कि 65 फीसद भारतीय बीमार होने पर महंगे इलाज के कारण कर्ज में फंस जाते हैं। इनमें से तीन फीसद तो ऐसे हैं, जो बीमारी पर खर्च की वजह से गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। इतना ही नहीं, बीमारी पर होने वाला 61 फीसद खर्च जेब से दिया जाता है। यानी इसके लिए न तो कोई बीमा होता है और न कोई दूसरी योजना। वहीं हमारा देश हृदय, गुर्दा और श्वास रोगों का घर बनता जा रहा है। मधुमेह के लिए तो उसे विश्व की राजधानी ही कहा जाने लगा है।
उन्होंन कहा कि ‘नेशनल हेल्थ सर्वे’ में यह बात सामने आई है कि 15 से 49 वर्ष के पुरुषों में दिल की बीमारी मौत का प्रमुख कारण बन रही है।
उन्होंने आश्चर्य प्रकट किया कि भारत अपनी कुल जीडीपी का करीब दो फीसद हिस्सा भी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च नहीं करता, जो 141 करोड़ आबादी वाले देश के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। यह ठीक है कि आयुष्मान भारत योजना जैसे सरकारी कार्यक्रमों ने करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की है। फिर भी, स्वास्थ्य क्षेत्र में अभी कई समस्याएं हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकार का खर्च सकल घरेलू उत्पाद के 1.84 फीसद तक पहुंच गया है। उन्होंने दावा किया कि यह धीरे-धीरे 2.5 फीसद के
लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। साफ है, दूसरे विकासशील देशों की बराबरी के लिए हमें काफी कुछ करना होगा। स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च का वैश्विक स्तर छह फीसद माना गया है। छह फीसद का आंकड़ा भारत कब हासिल करेगा, इसका कोई अनुमान नहीं है।
उन्होने रिपोर्टे में रेखांकित करते हुए बताया है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए किसी एकीकृत कार्ययोजना की सख्त जरूरत है। यह ठीक है कि आयुष्मान योजना के अंतर्गत पांच लाख रुपए तक का इलाज मुफ्त उपलब्ध है किंतु
स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट में जितनी उपलब्धता होनी चाहिए, उतनी अभी नहीं हो पाई है। फिर भी, बीते कुछ वर्षों में भारत ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रगति की है।
उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं तक सबकी आसान पहुंच हो और कम खर्च में इलाज हो सके।
*डॉ नरेश पुरोहित- एमडी, डीएनबी , डीआई एच , एमएचए, एमआरसीपी (यूके) एक महामारी रोग
विशेषज्ञ हैं। वे भारत के राष्ट्रीय संक्रामक रोग नियंत्रण कार्यक्रम के सलाहकार हैं। मध्य प्रदेश एवं दूसरे प्रदेशों की सरकारी संस्थाओं में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम , राष्ट्रीय पर्यावरण एवं वायु प्रदूषण के संस्थान के सलाहकार हैं। एसोसिएशन ऑफ किडनी केयर स्ट्डीज एवं हॉस्पिटल प्रबंधन एसोसिएशन के भी सलाहकार हैं।