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विपक्ष का यह कैसा पक्ष; वाक्युद्ध से वॉकआउट तक!

जनता की समस्याओं से कुछ सरोकार है तो निराकरण के सुझाव दें, देश में भी और देश की संसद में भी!

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नई दिल्ली (चंडीगढ़):  जब दुनियां भर में युद्ध हो रहा हो और पड़ोस में आग लगी हो तो घर के सभी सदस्यों को अपने बचाव और सुरक्षा की ओर प्राथमिकता से विचार विमर्श और एकजुट हो कर कार्य करना चाहिए। आपस में एक दूसरे पर आक्रमण छोड़ कर घर की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए।
हमारे यहां के नेता, जो जनता के प्रतिनिधि पहले हैं, वोह जनता की सुरक्षा जरूरतों को भूल कर अपनी तूती बखारने में ही खुश होने लगें तो किसी को कुछ नहीं मिलने वाला, न ही जनता का  भला  और न ही जनता का विश्वास।                                                                                                                      पश्चिमी एशिया में इज़राइल,अमेरिका और ईरान युद्ध ने दुनियां की अर्थ व्यवस्था को जिस तरह झकझोर दिया है, उसका असर भारत पर भी पड़ेगा इसमें कोई संदेह नहीं है तो क्या उसकी आग के यहां पहुंचने का इंतजार करना उचित है? और तब तक नेताओं का एक दूसरे की कमियां निकालना और निंदा करने से कुछ हासिल होगा, यह कोई बुद्धिमता पूर्ण आचरण नहीं हैं।

संसद के बजट सत्र के प्रथम भाग में बहुत समय व्यर्थ गया, जिसमें राष्ट्रपति महोदया का भाषण और उस पर चर्चा, धन्यवाद प्रस्ताव में भी पक्ष विपक्ष उचित विमर्श नहीं कर पाया। लोकसभा में गरमा- गर्म बहस के बीच महिला सदस्यों द्वारा सरकार और प्रधानमंत्री पर आक्रमण की आशंका के कारण प्रधानमंत्री मोदी का लोकसभा में उपस्थित न हो पाना भी एक स्वस्थ परंपरा नहीं है।
इस पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा प्रधानमंत्री को दी गई सलाह उचित थी। इससे एक अप्रत्याशित एवं अलोकतांत्रिक घटना का टलना समझें।  इस तरह की घटना हो जाए तो इसमें किसी का भी सम्मान नहीं बढ़ता, न विपक्ष का न सत्तापक्ष का। स्पीकर ओम बिरला तो सदन की मर्यादाओं की रक्षा कर रहे थे।

विपक्ष द्वारा इस प्रकार की घटनाओं को रोकने का दायित्व है, विपक्ष को भी समझना चाहिए कि सदन चर्चाओं के लिए, देश की समस्याओं को सुलझाने के लिए है, न कि आपसी  धींगामुष्टि  का प्रदर्शन करने के लिए। अपने कार्य का समझदारी से निर्वाहन करने के लिए  माननीय स्पीकर के खिलाफ अविश्वास व्यक्त करना कोई उचित कार्य नहीं है।

विपक्ष ने इस तरह के प्रस्ताव का नोटिस दे दिया और सोमवार, 9 मार्च को इस पर लोकसभा में बहस का समय नियुक्त हो गया तो विपक्ष को यह पेश करना चाहिए था या अपने निश्चित कदम को वापिस लेना चाहिए था। वॉकआउट से तो कुछ हल नहीं निकला और सदन का पूरा दिन जिस पर जनता के करोड़ों  रु. खर्च होते हैं, व्यर्थ गंवाने से कुछ हल होगा या जनता खुश होगी, ऐसा सोचना कहां की बुद्धिमत्ता है?

पश्चिम एशिया के युद्ध और घटनाक्रम का अभी तक भारत पर क्या कुछ कम असर हुआ है, 70 हज़ार देशवासी इन मुल्कों से वापिस आ गए हैं और भी वापिस आ रहे हैं। लगभग एक करोड़ नौजवान जो पश्चिम एशिया में अपने भविष्य से आश्वस्त थे वो अब वापिस आ गए तो उनकी भी जिम्मेदारी देश की सरकार, विपक्ष के नेताओं, राज्य सरकारों पर पड़ने वाली है, जो अत्यंत ज्वलनशील मुद्दे हैं और अविलंब हल मांगेंगे।
क्या विपक्ष और देश -प्रदेशों की यह जिम्मेदारी नहीं की उन्हें उचित स्थाई या अस्थाई रोजगार की व्यवस्था करें और केंद्र को सुझाव दें?

पिछले 3 वर्षों से पश्चिम एशिया, रूस-यूक्रेन युद्धों से वैसे भी बहुत से देशों की विदेश नीतियां और अर्थ व्यवस्थाएं  चरमरा गई हैं, भारत पर भी असर हुआ है लेकिन बड़ी आर्थिक शक्ति होने के कारण और कुशल आर्थिक नीतियों के कारण कम असर हुआ है। आर्थिक प्रगति भी धीमी हुई है, सरकार को नए नए फार्मूले और अवसर ढूंढने पड़ रहे हैं। विपक्ष की अनावश्यक धींगामुष्टि से देश की प्रगति रुक सकती है। यह विपक्ष को समझना चाहिए कि हमेशा यही सरकार नहीं रहेगी, कल को उन्हें भी यह जिम्मेवारी संभालनी पड़ेगी।                                              उन्हें एक सुदृढ़ अर्थ व्यवस्था मिले तो उन्हें भी अपनी नीतियां लागू करना आसान होगा और देश उचित तरक्की कर पाएगा।

देश एक सतत् शाश्वत मातृभूमि है, भारत को समृद्ध करना और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करना सबका दायित्व है। सरकार और विपक्ष समय- स्थिति अनुसार एकजुट हो कर ऐसा सोचें और कार्य करें।                                                                     —– संपादक.

*(चित्र पीआईबी एवं आर्काइव से).

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