ट्रंप का टैरिफ वार भारत पर भारी
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ट्रंप का टैरिफ वार भारत पर भारी

भारत से आयात पर 25% शुल्क, PAK को राहत…

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नई दिल्ली अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक व्यापार जगत में हलचल मचा दी है। इस बार उन्होंने भारत समेत कई देशों पर भारी टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिससे भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों पर सीधा असर पड़ सकता है। ट्रंप ने भारत से होने वाले आयात पर 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ लागू करने का ऐलान किया है। उनके अनुसार यह फैसला “बराबरी के सिद्धांत” पर आधारित है, क्योंकि उनका मानना है कि भारत अमेरिका पर ज्यादा टैक्स लगाता है।

डोनाल्ड ट्रंप ने इस नए टैरिफ आदेश पर दस्तखत कर दिए हैं और ये आदेश सात दिनों के भीतर लागू हो जाएंगे। यह कदम उन देशों पर लागू होगा जो अमेरिका के साथ व्यापारिक रूप से “अनुचित व्यवहार” कर रहे हैं। इन देशों में भारत के साथ-साथ ताइवान, दक्षिण अफ्रीका और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं, जिन पर 10 से 41 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया गया है।

चौंकाने वाली बात यह रही कि ट्रंप ने पाकिस्तान को इस टैरिफ से पूरी तरह छूट दी है। उन्होंने इसे “रणनीतिक साझेदारी” बताते हुए कहा कि पाकिस्तान वर्तमान में अमेरिका का समर्थन कर रहा है, इसलिए उसे इस दायरे से बाहर रखा गया है। यह फैसला कई देशों के लिए हैरान करने वाला है, खासकर भारत के लिए, क्योंकि भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक और सामरिक रिश्ते लगातार गहराते दिखाई दे रहे थे।

भारत की ओर से अब तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस टैरिफ से भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहां से अमेरिका को बड़े पैमाने पर सामान निर्यात किया जाता है, जैसे टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स और आईटी सेवाएं।

इस फैसले के पीछे ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति को एक बार फिर जिम्मेदार माना जा रहा है। चुनावी माहौल में ट्रंप अपने घरेलू उद्योगों को मजबूती देने और विदेशों से आने वाले सस्ते सामान को रोकने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, यह कदम वैश्विक व्यापारिक संबंधों में अस्थिरता पैदा कर सकता है और पहले से ही मंदी की ओर बढ़ रही वैश्विक अर्थव्यवस्था को और चोट पहुंचा सकता है।

व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब अपने निर्यात रणनीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है और अमेरिका पर निर्भरता कम कर यूरोप, दक्षिण एशिया और अफ्रीका जैसे नए बाजारों की तलाश करनी चाहिए। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत सरकार इस फैसले पर क्या रुख अपनाती है और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों की दिशा अब किस ओर जाती है।

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