बिना अनुमति छुट्टी पर गया कांस्टेबल बर्खास्त
काले जादू से इलाज के लिए गया था छुट्टी पर, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
हरियाणा पुलिस के कांस्टेबल अरशद को नौकरी से बर्खास्त करने के खिलाफ दायर की गई याचिका पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने
सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अनुशासनहीनता और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार की पुलिस विभाग में कोई जगह नहीं है। कांस्टेबल अरशद को काले जादू से इलाज कराने के लिए बिना अनुमति छुट्टी पर जाना महंगा पड़ गया।
मेवात निवासी अरशद 2012 में हरियाणा पुलिस में भर्ती हुआ था। लेकिन बीते 12 वर्षों में उसने अनुशासन का पालन करने में घोर लापरवाही दिखाई। अरशद की फाइल में ड्यूटी से 42 बार अनुपस्थित रहने का रिकॉर्ड दर्ज है। इसके चलते उसे विभाग की ओर से कई चेतावनियां, वेतनवृद्धि पर रोक और चार बार बड़ी सज़ाएं भी दी गईं। हालांकि इसके बावजूद अरशद ने अपने व्यवहार में सुधार नहीं किया। आखिरी बार जब वह बिना किसी पूर्व सूचना के ड्यूटी से गायब हुआ, तो उसने विभाग को यह कारण बताया कि वह काले जादू और तांत्रिक प्रभावों से ग्रस्त है और उसका इलाज एक फकीर से करवा रहा था।
यह तर्क न तो विभाग को समझ आया और न ही न्यायालय को। अदालत ने कहा कि यदि कोई पुलिसकर्मी मानसिक या शारीरिक समस्या से जूझ रहा है तो उसे विभाग के माध्यम से वैध इलाज लेना चाहिए था, न कि मनमर्जी से छुट्टी लेकर किसी गैर वैज्ञानिक पद्धति से इलाज कराना। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि पुलिस जैसी संवेदनशील और अनुशासन-आधारित सेवा में लगातार गैरहाजिर रहना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास के साथ भी विश्वासघात है। ऐसे में अरशद की बर्खास्तगी को अनुचित नहीं ठहराया जा सकता।
अरशद के परिजन और गांव के कुछ लोग इस फैसले से आहत जरूर हैं। उनका कहना है कि वह एक अच्छे दिल का इंसान था, लेकिन समय-समय पर कुछ निजी परेशानियों से गुजर रहा था। वहीं, कुछ ग्रामीणों ने माना कि अरशद को अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता नहीं थी और उसने अंधविश्वास के चलते यह कदम उठाया। पुलिस विभाग ने इस फैसले को एक उदाहरण के रूप में लिया है और अन्य कर्मचारियों को अनुशासन और सेवा के प्रति निष्ठा बनाए रखने की सख्त हिदायत दी है।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की नौकरी से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि किस हद तक अंधविश्वास और लापरवाही हमारे सरकारी तंत्र में घुसपैठ कर चुके हैं। साथ ही, यह भी स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका और प्रशासन अब ऐसी लापरवाहियों के प्रति और अधिक सख्त हो चले हैं।
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