वैज्ञानिक निष्कर्ष : जीवन के लिए औषधि है- ‘धार्मिक आस्था’

मियामी (U.S.A.): अक्सर हम देखते है कि धर्म और ईश्वर में आस्था रखने वाले लाखों लोग धार्मिक संगठनों और पूजा स्थलों की ओर आकर्षित होते हैं। अब इसका वैज्ञानिक कारण भी स्पष्ट हुआ है। मियामी यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर और शोधकर्ता माइकेल मैक्कलो के शोध निष्कर्षों के अनुसार धार्मिक आस्था वाकई आपका काफी भला करती है। उनके निष्कर्षो ने इंसान की सेहत पर धार्मिक आस्था के असर को लेकर असमंजस को दूर किया है।

प्रोफेसर मैक्कलो ने प्रयोग के तौर पर अपनी यूनिवर्सिटी के कोरल गैबल्स कैंपस में अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले सैकडों लोगों की क्षमाशीलता और अहसान मानने की प्रवृत्ति को गौर से नोट किया और इसे उनकी सामान्य सेहत, अवसाद की स्थितियों और नशे की लत से जोड़कर देखा। इस दौरान वे सबसे एक सवाल लगातार करते रहे कि क्या आप ईश्वर में विश्वास रखते हैं, और हां, तो कितना? मैक्कलो के शोध से पता चला है कि चाहे वे किसी भी धर्म के हों, आस्तिक लोग पढ़ने-लिखने में आगे, दीघार्यु, सफल वैवाहिक जीवन के स्वामी और आम नास्तिक लोगों के बजाय ज्यादा खुश मिजाज होते हैं।

इस विषय पर मैक्कलो 12 बार से ज्यादा अध्ययन रिपोर्ट तैयार कर चुके हैं। इनमें साइकोलाजिकल बुलेटिन’ में प्रकाशित रिपोर्ट भी शामिल है। इसमें कहा गया है कि अगर आप धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं, तो इस मामले में आप धार्मिक होकर सफल हो सकते हैं। इसी तरह जर्नल आफ ड्रग इश्यूज में उन्होंने लिखा कि शराबखोरी के शिकार मोहल्ले में धार्मिक पूजा स्थल खोल देने का चमत्कार असर देखने में आया। ऐसा इसलिए कि धार्मिक आस्था रखने वाले लोगों में आत्मनियंत्रण की क्षमता औरों के मुकाबले ज्यादा होती है।

प्रोफेसर मैक्कलो का मानना है कि धर्म तो इस तस्वीर का एक पहलू भर है। इसके साथ ही व्यक्ति की नस्ल, उम्र और वर्ग का भी उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर काफी असर पड़ता है। उसके जीवन की गुणवत्ता पर इनका खासा असर पड़ता है। मैक्कलो की राय में धार्मिक कर्मकांड जसे कि होली, कम्यूनियन, रविवार की प्रार्थना, भजन संध्या, सत्संग, रात्रि जगरण, भंडारा वगैरह का भी जबर्दस्त सकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता है। हालांकि उनके द्वारा किए गए निष्कर्ष हर धर्म के अनुयायियों पर लागू होते हैं।

पूजा और प्रार्थना की ताकत : प्रो. मैक्कलो का कहना है कि प्रार्थना और पूजा में गजब की शक्ति होती है। भले ही आप इसलिए धार्मिक होते हैं कि अपने परिवार को मायूस नहीं करना चाहते, या फिर किसी वजह से स्वयं को दोषी महसूस करते हों। वे यह भी कहते हैं कि जीवन में काफी देर से धार्मिक बनने या धर्म बदलने वाले लोग इसका सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं। मैक्कलो की राय में अपने से विराट किसी शक्ति में आस्था रखने से आत्मनियंत्रण और ज्यादा मजबूत हो जाता है।

उन्होंने अनूठे प्रयोग करके इसे सिद्ध किया है। मसलन, कुछ लोगों से उन्होंने पूछा कि वे आज 50 डालर लेना ज्यादा पसंद करेंगे, या एक महीने बाद 65 डालर? इसके जवाब में ज्यादातर आस्थावान लोगों ने बड़ी रकम पाने के लिए एक महीने इंतजार का सब्र दिखाया। उनका कहना है कि धार्मिक प्रवृत्ति के लोग कानून की अवहेलना कम करते हैं और नशे की लत के कम शिकार होते हैं। उन्होंने करीब सवा लाख लोगों पर किए सर्वेक्षण से नतीजा निकाला कि धार्मिक लोगों का जीवनकाल, अन्य के मुकाबले 29 फीसद लंबा होता है।

जर्नल आॅफ क्लिनिकल एंड सोशल साइक्लोजी में प्रकाशित मैक्कलो के अध्ययन में 64 केस स्टडीज को शामिल किया गया था। इसमें धर्म के साथ हाइपर-टेंशन और ह्रदयाघात जैसे सेहत के मुद्दों का रिश्ता केंद्रबिंदु में रखा गया था। पता चला कि अन्य लोगों की बजाय रोज पूजा-पाठ और सत्संग करने वाले ज्यादातर लोगों को ऐसी कोई समस्या नहीं थी। यही नहीं, धार्मिक लोगों में मानसिक और शारीरिक कष्ट सहने की क्षमता भी अपेक्षाकृत ज्यादा पाई गई। वहीं यूरोलोजिस्ट डा मैन्युअन प्रैडन का कहना था कि ईश्वर में यकीन करने वाले उनके ज्यादातर मरीज किसी भी तकलीफ को झेलने में ज्यादा परेशान नजर नहीं आए।

वे हर स्थिति में दृढ़ रहे, और डगमगाए नहीं। इसी तरह अहसान मानने का माद्दा भी आस्तिक समुदाय में ज्यादा देखने को मिलता है। मैक्कलो का मानना है कि आस्था से जीवन में अन्य लोगों के मुकाबले 25 फीसद खुशियों का इजाफा हो जाता है।

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